नई दिल्ली: जलवायु परिवर्तन (Climate Change) की चुनौती से निपटने में पुराने और परिपक्व जंगल कितने अहम साबित हो सकते हैं, इस पर एक ताजा अध्ययन ने रोशनी डाली है। वैज्ञानिकों ने पाया कि ये जंगल वातावरण से CO2 को बड़ी मात्रा में सोखते हैं और बढ़ते CO2 स्तर के जवाब में अपनी विकास दर को तेज कर देते हैं। यह खोज उन पुरानी धारणाओं को चुनौती देती है, जो कहती थीं कि बूढ़े जंगलों में ऐसी प्रतिक्रिया देने की क्षमता नहीं होती। ब्रिटेन के बर्मिंघम विश्वविद्यालय के वन अनुसंधान संस्थान (BIFoR) के विशेषज्ञों ने 180 साल पुराने ओक के जंगलों पर शोध किया, जहां पेड़ों को सामान्य से 150 भाग प्रति मिलियन ज्यादा CO2 के संपर्क में रखा गया—यह करीब 40 प्रतिशत की बढ़ोतरी थी। सात सालों में, लकड़ी के उत्पादन में औसतन 9.8 प्रतिशत की वृद्धि देखी गई, जबकि पत्तियां या महीन जड़ें जैसी चीजें, जो जल्दी CO2 छोड़ती हैं, उनमें कोई खास बदलाव नहीं आया।
पुराने जंगलों को कार्बन भंडार के रूप में मजबूत समर्थन
यह अध्ययन ‘नेचर क्लाइमेट चेंज’ जर्नल में छपा है और पुराने जंगलों को लंबे समय तक कार्बन सिंक और प्राकृतिक जलवायु उपाय के तौर पर मजबूत बनाता है। शोधकर्ताओं ने फ्री-एयर CO2 एनरिचमेंट (FACE) नामक प्रयोग का सहारा लिया, जो भविष्य के वातावरण की नकल करता है। इंग्लैंड में 26 मीटर ऊंचे और 30 मीटर व्यास वाले ओक पेड़ों के तीन समूहों को ज्यादा CO2 दिया गया। प्रमुख शोधकर्ता प्रोफेसर रॉब मैकेंजी ने बताया, हमारे नतीजे इस सोच को झुठलाते हैं कि परिपक्व जंगल बढ़ते CO2 पर रिएक्ट नहीं कर सकते। लेकिन उनकी प्रतिक्रिया मिट्टी से मिलने वाले पोषक तत्वों पर निर्भर करती है।
FACE प्रयोग: भविष्य की झलक
FACE जैसे प्रयोग जंगलों, वातावरण और जलवायु के बीच के रिश्ते को समझने में मदद करते हैं। पहले के अध्ययनों में युवा पेड़ों पर CO2 बढ़ाने से उत्पादकता में इजाफा देखा गया था, लेकिन सवाल था कि क्या पुराने पेड़ भी वैसा ही करेंगे? BIFoR का यह प्रयोग 2017 से चल रहा है और लेजर स्कैनिंग से पेड़ों के व्यास को मापकर लकड़ी के द्रव्यमान का आकलन किया गया। शोधकर्ताओं ने कुल विकास दर—जिसे नेट प्राइमरी प्रोडक्टिविटी (NPP) कहते हैं—को पत्तियों, जड़ों, फूलों और यहां तक कि जड़ों से निकलने वाले ऑर्गेनिक कंपाउंड्स से जोड़कर देखा।
NPP में 10 प्रतिशत से ज्यादा की बढ़ोतरी
2021 और 2022 में, ज्यादा CO2 वाले क्षेत्रों में NPP सामान्य से 9.7 और 11.5 प्रतिशत ज्यादा रही। प्रति हेक्टेयर सालाना करीब 1.7 टन सूखा पदार्थ बढ़ा, जो ज्यादातर लकड़ी से आया। पत्तियों या जड़ों में कोई उल्लेखनीय बदलाव नहीं। शोध टीम के मुताबिक, यह वृद्धि आने वाले दशकों में पुराने जंगलों को जलवायु समाधान के रूप में मजबूत करती है। मैकेंजी ने कहा, हमारे 15 साल के प्रयोग के बीच में ये नतीजे दुनिया भर के नीति-निर्माताओं के लिए सोने जैसी जानकारी हैं, जो जलवायु की मुश्किलों से जूझ रहे हैं।
कार्बन सोखने की ताकत: उड़ान के उत्सर्जन जितनी
इस अतिरिक्त कार्बन स्टोरेज की तुलना करें तो प्रति हेक्टेयर सालाना यह लंदन से न्यूयॉर्क की एकतरफा कमर्शियल फ्लाइट से निकलने वाले CO2 का महज एक प्रतिशत है। लेकिन कुल मिलाकर, ये जंगल प्रति हेक्टेयर सालाना इतना कार्बन सोखते हैं जो उससे दस गुना ज्यादा होता है। यह आंकड़ा बताता है कि जीवाश्म ईंधन के उत्सर्जन को कम करने के लिए जंगलों के संरक्षण और प्रबंधन का कितना बड़ा स्केल चाहिए।
आगे की राह: संरक्षण पर जोर
वैज्ञानिकों का मानना है कि ऐसे प्रयोग नीतियों में विश्वास बढ़ाते हैं और पुराने जंगलों को बचाने की जरूरत पर जोर देते हैं। जलवायु परिवर्तन से लड़ाई में ये जंगल न सिर्फ CO2 सोखते हैं, बल्कि जैव विविधता और पारिस्थितिकी संतुलन भी बनाए रखते हैं। अगर हम इन्हें काटते रहे या नजरअंदाज करते रहे, तो बड़ा नुकसान हो सकता है। यह शोध हमें याद दिलाता है कि प्रकृति के पुराने खजाने कितने कीमती हैं और उन्हें बचाना कितना जरूरी।



