नई दिल्ली: दुनिया की आधी आबादी गरीबी के चक्रव्यूह में फंसी है, जबकि मुट्ठी भर अरबपति हर दिन करोड़ों डॉलर की संपत्ति जोड़ रहे हैं। लेकिन यह आर्थिक खाई सिर्फ पैसे की नहीं, बल्कि पर्यावरण की तबाही की भी जड़ है। वर्ल्ड इनइक्वलिटी लैब की ताजा ‘क्लाइमेट इनइक्वैलिटी रिपोर्ट 2025’ ने साफ-साफ बयान किया है कि धनाढ्य वर्ग न सिर्फ अपनी लग्जरी लाइफ से, बल्कि निवेशों से भी ग्रीनहाउस गैसों का बोझ बढ़ा रहा है। रिपोर्ट के प्रमुख लेखक लुकास चांसेल और कॉर्नेलिया मोरन का कहना है कि धन असमानता और जलवायु परिवर्तन एक-दूसरे को मजबूत बनाते हैं, एक का इलाज बिना दूसरे के मुश्किल है। यह रिपोर्ट वैश्विक स्तर पर जारी हुई है और संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) के साथ मिलकर तैयार की गई। इसमें पहली बार संपत्ति के स्वामित्व को उत्सर्जन की गणना में शामिल किया गया, जो पुरानी रिपोर्टों से बिल्कुल अलग नजरिया पेश करता है।
अमीरों का कार्बन फुटप्रिंट: उपभोग से कहीं ज्यादा निवेश का खेल
रिपोर्ट में दो तरह के उत्सर्जन पर नजर डाली गई, एक तो व्यक्तिगत उपभोग (जैसे प्राइवेट जेट या लग्जरी कारें), दूसरा निवेशों से जुड़ा (जैसे तेल-गैस कंपनियों में शेयर)। आंकड़े चौंकाने वाले हैं: दुनिया के टॉप 1% अमीर वैश्विक कंजम्प्शन-बेस्ड उत्सर्जन का 15% हिस्सा पैदा करते हैं। लेकिन जब बात प्राइवेट कैपिटल ओनरशिप की आती है, तो यह आंकड़ा 41% तक पहुंच जाता है। प्रति व्यक्ति आधार पर देखें तो टॉप 1% का उत्सर्जन बॉटम 50% आबादी से 75 गुना ज्यादा है। लेकिन निवेशों को जोड़ने पर यह अंतर 680 गुना हो जाता है! उदाहरण के लिए, फ्रांस, जर्मनी और अमेरिका जैसे देशों में टॉप 10% लोगों का कार्बन फुटप्रिंट सिर्फ उपभोग से 3-5 गुना ज्यादा निकला। चांसेल कहते हैं, “अमीरों के प्राइवेट जेट उत्सर्जन में छोटा योगदान देते हैं, लेकिन वे उसी जेट से किए गए बिजनेस डील्स फॉसिल फ्यूल इंडस्ट्री को फंड करते हैं, जो असली समस्या है।
औद्योगिक क्रांति से चली आ रही यह दौड़: गरीबों का नुकसान, अमीरों का फायदा
आर्थिक असमानता की जड़ें गहरी हैं। औद्योगिक क्रांति के बाद से यह खाई चौड़ी होती गई। आज दुनिया की 50% आबादी के पास कोई संपत्ति नहीं, जबकि 2024 में ही 204 नए अरबपति बने। ऑक्सफैम की रिपोर्ट के मुताबिक, टॉप 10 अरबपतियों की दौलत हर दिन 100 मिलियन डॉलर बढ़ी। एक दिलचस्प तुलना: अगर कोई व्यक्ति 3 लाख 15 हजार साल (मानव इतिहास) से रोज 1,000 डॉलर बचाता, तो भी किसी एक अरबपति की संपत्ति न पहुंच पाता। रिपोर्ट बताती है कि 71% औद्योगिक उत्सर्जन सिर्फ 100 कंपनियों के कारण हुआ। ये कंपनियां ज्यादातर फॉसिल फ्यूल पर टिकी हैं, और इनमें निवेश अमीरों के पोर्टफोलियो का बड़ा हिस्सा हैं। नतीजा? जलवायु नुकसान का बोझ गरीबों पर 2050 तक बॉटम 50% को आय का 74% नुकसान, जबकि टॉप 10% को महज 3%। यह ‘नया उपनिवेशवाद’ जैसा है, जहां अमीर दोहन करते रहते हैं।
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समाधान: निवेशों पर नकेल, न कि सिर्फ उपभोक्ताओं पर
रिपोर्ट पुरानी नीतियों पर सवाल उठाती है। फॉसिल फ्यूल पर टैक्स का बोझ आम आदमी पर पड़ता है, क्योंकि उनके पास विकल्प कम होते हैं। मोरन कहती हैं, “उपभोक्ता हमेशा बदलाव नहीं ला सकते, लेकिन निवेशक बदल सकते हैं। सुझाव हैं:
- नए फॉसिल फ्यूल निवेश पर वैश्विक प्रतिबंध।
- फाइनेंशियल असेट्स पर कार्बन-बेस्ड टैक्स, ताकि पैसे हाई-एमिशन इंडस्ट्री से हटें।
- लो-कार्बन इंफ्रास्ट्रक्चर में बड़े पब्लिक इन्वेस्टमेंट।
चांसेल जोड़ते हैं कि यह टैक्स सिस्टम को सही दिशा देगा। उत्पादकों को टारगेट करेगा, न कि गरीबों को। COP30 से पहले यह रिपोर्ट एक वेक-अप कॉल है। जलवायु संकट कोई प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानवीय लालच का नतीजा है। अगर अमीरों के निवेश पैटर्न न बदले, तो गरीबों का संघर्ष और लंबा खिंचेगा। समय है कि सरकारें, कॉर्पोरेट्स और हम सब मिलकर समानता की दिशा में कदम बढ़ाएं। क्योंकि धरती सबकी है, लेकिन तबाही का खामियाजा सबको भुगतना पड़ रहा है। क्या COP30 इस रिपोर्ट को सुनते हुए नई शुरुआत करेगा? दुनिया इंतजार कर रही है।



