नई दिल्ली: सोचिए, आपका रोजमर्रा का कपड़ा सुखाने वाला ड्रायर न सिर्फ बिजली गटक रहा है, बल्कि हवा को भी जहरीला बना रहा है। नई रिसर्च ने चौंकाने वाला खुलासा किया है कि ये घरेलू मशीनें सूक्ष्म रेशों की भारी बौछार हवा में छोड़ रही हैं, जो पर्यावरण को चुपचाप निगल रही हैं। अमेरिका में तो हर साल इससे 3,543 मीट्रिक टन सूक्ष्म रेशे निकल रहे हैं, यानी लगभग 30 स्टैच्यू ऑफ लिबर्टी के वजन जितना। भारत जैसे देशों में जहां वॉशिंग मशीनों का इस्तेमाल तेजी से बढ़ रहा है, ड्रायर भी अब आम हो रहे हैं। ये रेशे न सिर्फ हवा साफ रखने की चुनौती बढ़ा रहे हैं, बल्कि हमारी सेहत पर भी सवाल खड़े कर रहे हैं।
रिसर्च का सरप्राइजिंग रिजल्ट: प्राकृतिक रेशे भी उतने ही खतरनाक
डेजर्ट रिसर्च इंस्टीट्यूट (DRI) और पर्यावरण संगठन कीप टाहो ब्लू के एक्सपर्ट्स ने मिलकर ये स्टडी की। उन्होंने लेक टाहो इलाके के छह लोकल वॉलंटियर्स को शामिल किया। इन लोगों ने तीन हफ्तों तक अपने ड्रायर के बाहर जालीदार जाल लगाया और हर लोड के बारे में ऐप पर डिटेल्स शेयर कीं। जैसे तौलिए, शर्ट्स या बेडशीट्स सुखाए जा रहे थे। कुल 76 लोड चेक किए गए, और जाल पर जमा रेशों का वजन व कंपोजिशन लैब में टेस्ट किया।
नतीजे हैरान करने वाले
कुल रेशों में 77 फीसदी प्राकृतिक (जैसे कॉटन, वूल) से आए, यानी 2,728 मीट्रिक टन, जबकि सिंथेटिक (पॉलिएस्टर, नायलॉन) सिर्फ 460 मीट्रिक टन। हमेशा सिंथेटिक को ही दोष देते रहे, लेकिन कॉटन जैसे नैचुरल फैब्रिक भी गर्मी और घर्षण से टूटकर अल्ट्रा-फाइन पार्टिकल्स बनाते हैं। समस्या ये है कि इनमें डाई, PFAS (वॉटर-रिपेलेंट केमिकल) और फॉर्मेल्डिहाइड जैसे टॉक्सिन्स चिपके रहते हैं, जो नैचुरल होने के बावजूद पर्यावरण को नुकसान पहुंचाते हैं।
वॉशर vs ड्रायर: कौन ज्यादा गंदा?
वॉशिंग मशीनें तो रेशों को पानी के साथ ड्रेन में धकेल देती हैं, लेकिन ड्रायर? वो तो गर्म हवा से इन्हें सीधे बाहर उड़ा देते हैं। ज्यादातर अमेरिकी होम्स में सिर्फ बेसिक लिंट फिल्टर होता है, जो मोटे धागों को पकड़ता है, लेकिन सूक्ष्म रेशों को नहीं। भारत में भी, बढ़ते अर्बन होम्स में इलेक्ट्रिक ड्रायर आ रहे हैं, और ये समस्या यहां भी फैल सकती है। रिसर्चर्स ने पाया कि ड्रायर की उम्र, मॉडल और कपड़ों की कंडीशन से एमिशन वैरी करता है, पुराने मशीन ज्यादा रेशे छोड़ते हैं।
सेहत पर चोट: छोटे रेशे, बड़े खतरे
ये सूक्ष्म रेशे हवा से फेफड़ों में घुस सकते हैं, और उनके साथ चिपके केमिकल्स ब्लडस्ट्रीम में मिल जाते हैं। PFAS प्रजनन क्षमता घटाते हैं, हार्मोनल बैलेंस बिगाड़ते हैं, और बच्चों के डेवलपमेंट को प्रभावित करते हैं।एनवायरनमेंटल टॉक्सिकोलॉजी जर्नल में पब्लिश्ड ये स्टडी बताती है कि ये रेशे मिट्टी, पानी और फूड चेन तक पहुंचकर इकोसिस्टम को डैमेज करते हैं। लंबे समय में, ये कैंसर, इम्यून सिस्टम वीकनेस और क्रॉनिक बीमारियों का सबब बन सकते हैं।
क्या करें? छोटे स्टेप्स से बड़ा बदलाव
- एयर ड्राई चुनें: धूप या छांव में कपड़े सुखाएं, ड्रायर यूज कम करें।
- बेहतर फिल्टर लगाएं: माइक्रोफाइबर कैचर वाले वेंट फिल्टर इंस्टॉल करें – ये 80-90% रेशे रोक सकते हैं।
- लो टेम्प मोड: ड्रायर में कम गर्मी पर चलाएं, कपड़े कम टूटेंगे।
- सस्टेनेबल चॉइस: लंबे चलने वाले, कम शेडिंग वाले फैब्रिक्स चुनें।



