नई दिल्ली। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हाल ही में देशवासियों से आगामी एक वर्ष तक सोना न खरीदने की अपील की है। इस अपील का मूल उद्देश्य हालिया जंग के बीच देश की आर्थिक स्थिति को सुदृढ़ करना और बढ़ते व्यापार घाटे को नियंत्रित करना है। हालांकि इस घोषणा ने जहां एक ओर सर्राफा बाजार और शेयर मार्केट में हलचल पैदा कर दी है, वहीं दूसरी ओर इसने एक नई बहस को जन्म दिया है कि क्या भारतीय समाज, विशेषकर दक्षिण भारत सोने के प्रति अपने सदियों पुराने मोह को त्याग पाएगा?
40 फीसदी हिस्सा दक्षिण का
भारत के कुल घरेलू सोने का लगभग 40 फीसदी हिस्सा अकेले दक्षिण भारतीय राज्यों (तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश और तेलंगाना) के पास है। यह आंकड़ा केवल विलासिता का प्रतीक नहीं है बल्कि वहां की संस्कृति की जड़ों की गहराई को दर्शाता है। दक्षिण में सोना केवल आभूषण नहीं, बल्कि एक ‘स्त्रीधन’ और ‘आपातकालीन पूंजी’ है।
संस्कृति और आंकड़ों के आईने में देखें तो ‘वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल’ की एक रिपोर्ट चौंकाने वाले तथ्य प्रस्तुत करती है। केरल में एक दुल्हन औसतन 320 ग्राम सोना धारण करती है, जबकि तमिलनाडु और आंध्र प्रदेश में यह आंकड़ा 300 ग्राम के करीब है। यह सांस्कृतिक अनिवार्यता ही है जो दक्षिण भारत को सोने का सबसे बड़ा उपभोक्ता बनाती है।
भारतीय परिवारों में 25 हजार टन सोना
ग्रामीण और मध्यम वर्गीय दक्षिण भारतीय परिवारों के लिए बैंक, म्यूचुअल फंड या शेयर बाजार आज भी जटिल विषय हो सकते हैं, लेकिन ‘सोना’ उनकी समझ में आने वाली सबसे सरल बचत है। इसे ‘चलती-फिरती बचत’ माना जाता है, जिसे जरूरत पड़ने पर तुरंत ‘गोल्ड लोन’ में बदला जा सकता है। एक अनुमान के मुताबिक भारतीय परिवारों के पास करीब 25 हजार टन सोना है, जिसमें दक्षिण भारत की हिस्सेदारी राष्ट्रीय औसत से कहीं अधिक है। यह सोना महिलाओं की आर्थिक स्वायत्तता और सामाजिक सुरक्षा का कवच भी है।
बाजार की मजबूती और भौगोलिक लाभ
चेन्नई, कोच्चि, बेंगलुरु और हैदराबाद जैसे शहर आज वैश्विक स्तर पर सोने के व्यापारिक केंद्र बन चुके हैं। दक्षिण भारत में ज्वेलरी बाजार इतना संगठित और प्रतिस्पर्धी है कि ग्राहकों को बेहतरीन डिजाइन और मेकिंग चार्ज में रियायत मिलती है। साथ ही, बंदरगाहों के निकट होने के कारण लॉजिस्टिक्स और परिवहन लागत में आने वाली कमी भी यहां सोने की कीमतों और मांग को प्रभावित करती है।
राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था और आयात का दबाव
प्रधानमंत्री की अपील के पीछे ठोस आर्थिक कारण हैं। भारत अपनी सोने की जरूरत का अधिकांश हिस्सा आयात करता है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का स्वर्ण आयात 71.98 अरब डॉलर तक पहुंच गया है। स्विट्जरलैंड (40%) और यूएई (16%) जैसे देशों से होने वाला यह भारी आयात देश के विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव डालता है। यदि मांग में कमी आती है तो रुपया मजबूत होगा और व्यापार घाटा कम होगा।



