कलपक्कम (तमिलनाडु): भारत ने स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में एक क्रांतिकारी और ऐतिहासिक कदम उठाते हुए दुनिया की पहली परमाणु ऊर्जा संचालित हाइड्रोजन उत्पादन सुविधा का उद्घाटन किया है। यह उपलब्धि न केवल भारत की बढ़ती वैज्ञानिक क्षमता को दर्शाती है, बल्कि भविष्य के ‘स्वच्छ ईंधन’ (Clean Fuel) की ग्लोबल डिमांड को पूरा करने के लिए एक नए मार्ग का निर्माण करती है।
तकनीक और कार्यप्रणाली: एक विस्तृत अवलोकन
1. पारंपरिक पद्धति (इलेक्ट्रोलिसिस) बनाम नई तकनीक
- पारंपरिक इलेक्ट्रोलिसिस: इसमें पानी के अणुओं (H2O) को हाइड्रोजन और ऑक्सीजन में तोड़ने के लिए भारी मात्रा में विद्युत ऊर्जा की आवश्यकता होती है। यदि यह बिजली जीवाश्म ईंधन (जैसे कोयला) से उत्पन्न होती है, तो हाइड्रोजन उत्पादन की प्रक्रिया ‘स्वच्छ’ नहीं रह जाती।
- नई ‘न्यूक्लियर-हीट’ तकनीक: यह संयंत्र कॉपर-क्लोरीन (Cu-Cl) थर्मोकेमिकल चक्र का उपयोग करता है। इसमें पानी को तोड़ने के लिए बिजली के बजाय परमाणु रिएक्टर (FBTR) से प्राप्त ‘प्रक्रिया ऊष्मा’ (Process Heat) का उपयोग किया जाता है।
2. कॉपर-क्लोरीन (Cu-Cl) थर्मोकेमिकल चक्र
यह प्रक्रिया भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC), मुंबई द्वारा स्वदेशी रूप से विकसित की गई है। इसके मुख्य लाभ निम्नलिखित हैं:
- कम तापमान: अन्य थर्मोकेमिकल प्रक्रियाओं की तुलना में, Cu-Cl चक्र अपेक्षाकृत कम तापमान पर काम करता है, जो इसे परमाणु रिएक्टरों के साथ एकीकृत करने के लिए अत्यधिक उपयुक्त बनाता है।
- उच्च दक्षता: इसकी थर्मोडायनामिक दक्षता अधिक है, जो इसे व्यावसायिक रूप से भविष्य में स्केलेबल बनाती है।
- बहु-चरणीय प्रक्रिया: यह एक बंद-लूप प्रणाली (Closed-loop system) है, जिसमें कॉपर और क्लोरीन के यौगिक विभिन्न चरणों में पानी के साथ प्रतिक्रिया करते हैं ताकि अंततः हाइड्रोजन गैस प्राप्त हो सके।
3. फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (FBTR) की भूमिका
कलपक्कम का FBTR इस संयंत्र के लिए ऊष्मा का स्रोत है।
- यह रिएक्टर अपनी प्रक्रिया के दौरान अतिरिक्त गर्मी उत्पन्न करता है, जो सामान्यतः बिजली उत्पादन के बाद व्यर्थ चली जाती है।
- अब, इस ‘वेस्ट हीट’ को हाइड्रोजन उत्पादन के लिए ‘मूल्यवान ऊर्जा’ में बदला जा रहा है।
- चूंकि परमाणु रिएक्टर 24×7 चलते हैं, इसलिए यह तकनीक सौर या पवन ऊर्जा की तरह मौसम पर निर्भर नहीं है और निरंतर हाइड्रोजन उत्पादन सुनिश्चित करती है।
परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) का दृष्टिकोण
परमाणु ऊर्जा विभाग के सचिव डॉ. अजित कुमार मोहंती ने इस उपलब्धि पर जोर देते हुए कहा कि परमाणु ऊर्जा में बिजली उत्पादन के साथ-साथ उच्च-तापमान प्रक्रिया ऊष्मा प्रदान करने की अनूठी क्षमता है। यह तकनीक भारत को निम्नलिखित दिशाओं में मदद करेगी:
- डिकार्बोनाइजेशन: यह औद्योगिक प्रक्रियाओं और परिवहन क्षेत्र में कार्बन उत्सर्जन को कम करने में मदद करेगा।
- आत्मनिर्भर भारत: हाइड्रोजन को भविष्य का प्रमुख ‘ऊर्जा वाहक’ माना जा रहा है। स्वदेशी तकनीक से इसका उत्पादन भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करेगा।
- व्यावसायिक भविष्य: वर्तमान में यह एक ‘टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर’ (प्रौद्योगिकी प्रदर्शक) है, लेकिन इसका सफल संचालन भविष्य में बड़े पैमाने पर वाणिज्यिक हाइड्रोजन उत्पादन का मार्ग प्रशस्त करेगा।
कॉपर-क्लोरीन थर्मोकेमिकल चक्र क्या है?
कॉपर-क्लोरीन (Cu-Cl) थर्मोकेमिकल चक्र, हाइड्रोजन उत्पादन की सबसे आशाजनक तकनीकों में से एक है। जैसा कि आपने उल्लेख किया, यह पारंपरिक इलेक्ट्रोलिसिस का एक अत्यधिक कुशल विकल्प है, विशेष रूप से तब जब इसे परमाणु रिएक्टरों के साथ एकीकृत किया जाता है।
यहाँ इस प्रक्रिया का विस्तृत विवरण दिया गया है:
कॉपर-क्लोरीन (Cu-Cl) चक्र की कार्यप्रणाली
यह चक्र एक “बंद-लूप” (Closed-loop) प्रणाली है, जिसका अर्थ है कि इसमें उपयोग किए जाने वाले रसायनों (कॉपर और क्लोरीन यौगिकों) को पूरी प्रक्रिया के दौरान पुनः प्राप्त कर लिया जाता है और वे उपभोग नहीं होते। अंततः, केवल पानी (H2O) इनपुट के रूप में उपयोग होता है और हाइड्रोजन (H2) तथा ऑक्सीजन (O2) आउटपुट के रूप में प्राप्त होते हैं।
यह प्रक्रिया आमतौर पर चार से पांच मुख्य चरणों में पूरी होती है:
- हाइड्रोलिसिस (Hydrolysis): कॉपर क्लोराइड (Cu2Cl2) और भाप (Steam) की प्रतिक्रिया होती है, जिससे कॉपर ऑक्सीक्लोराइड और हाइड्रोजन क्लोराइड गैस बनती है।
- हाइड्रोजन उत्पादन: इस चरण में हाइड्रोजन गैस को अलग किया जाता है।
- ऑक्सीजन उत्पादन: अन्य चरणों में रसायनों को गर्म करके ऑक्सीजन को मुक्त किया जाता है।
- पुनर्चक्रण (Recycling): अंत में, शुरुआती रसायनों (कॉपर क्लोराइड) को फिर से उत्पन्न किया जाता है ताकि चक्र को दोबारा शुरू किया जा सके।

यह तकनीक क्यों विशिष्ट है?
- कम तापीय आवश्यकता: अधिकांश थर्मोकेमिकल चक्रों को 800°C से 1000°C से ऊपर के तापमान की आवश्यकता होती है। इसके विपरीत, Cu-Cl चक्र 500°C से 550°C के बीच कुशलतापूर्वक काम कर सकता है। यह तापमान भारत के फास्ट ब्रीडर रिएक्टरों (FBTR) और भविष्य के उन्नत रिएक्टरों द्वारा आसानी से उपलब्ध कराया जा सकता है।
- ऊर्जा दक्षता: इलेक्ट्रोलिसिस में बिजली के माध्यम से पानी को तोड़ा जाता है, जिसमें ऊर्जा का बड़ा हिस्सा बिजली उत्पादन (थर्मल-टू-इलेक्ट्रिक कन्वर्जन) के दौरान ही नष्ट हो जाता है। Cu-Cl चक्र में सीधे रिएक्टर की गर्मी का उपयोग होने के कारण, यह प्रक्रिया अधिक ऊर्जा-कुशल (Energy Efficient) होती है।
- सतत प्रक्रिया: परमाणु रिएक्टर निरंतर चलते हैं, जिससे यह तकनीक 24/7 हाइड्रोजन उत्पादन के लिए एक विश्वसनीय आधार प्रदान करती है।
तकनीकी और आर्थिक महत्व
- संक्षारण (Corrosion) प्रबंधन: चूंकि इस प्रक्रिया में क्लोराइड का उपयोग होता है, इसलिए संयंत्र के उपकरणों के लिए विशेष सामग्री (Materials) की आवश्यकता होती है जो उच्च तापमान और अम्लीय वातावरण को झेल सकें। वर्तमान शोध का बड़ा हिस्सा इसी ‘मटेरियल इंजीनियरिंग’ पर केंद्रित है।
- लागत में कमी: बड़े पैमाने पर, यह प्रक्रिया इलेक्ट्रोलिसिस की तुलना में हाइड्रोजन की लागत को काफी कम कर सकती है, क्योंकि इसमें महंगी बिजली की खपत नहीं होती।
ऐतिहासिक पृष्ठभूमि: होमी भाभा का तीन-चरणीय कार्यक्रम
भारत का तीन-चरणीय परमाणु ऊर्जा कार्यक्रम (Three-Stage Nuclear Power Programme) न केवल एक तकनीकी योजना है, बल्कि यह देश की ऊर्जा संप्रभुता (Energy Sovereignty) की एक दूरदर्शी रणनीति है। डॉ. होमी जहांगीर भाभा ने इसे 1950 के दशक में तब तैयार किया था जब भारत के पास यूरेनियम के भंडार सीमित थे लेकिन थोरियम के विशाल भंडार थे।
इस कार्यक्रम को चरणबद्ध तरीके से नीचे विस्तार से समझाया गया है:
1. प्रथम चरण: प्रेशराइज्ड हैवी वॉटर रिएक्टर (PHWR)
इस चरण का उद्देश्य भारत में परमाणु ऊर्जा का बुनियादी ढांचा तैयार करना और परमाणु ईंधन चक्र में दक्षता हासिल करना था।
- ईंधन: प्राकृतिक यूरेनियम (Natural Uranium)।
- प्रक्रिया: PHWR में भारी पानी (D2O) का उपयोग मॉडरेटर के रूप में किया जाता है।
- उप-उत्पाद: इस प्रक्रिया के दौरान ‘प्लूटोनियम-239’ (Pu-239) उत्पन्न होता है, जो द्वितीय चरण के लिए आवश्यक ईंधन है।
- महत्व: इसने भारत को परमाणु रिएक्टरों के निर्माण और संचालन में आत्मनिर्भर बनाया। आज भारत के अधिकांश परिचालन रिएक्टर इसी चरण के अंतर्गत आते हैं।
2. द्वितीय चरण: फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (FBR)
यह भारत के परमाणु कार्यक्रम का सबसे महत्वपूर्ण ‘संवर्धन’ (Breeding) चरण है।
- ईंधन: प्रथम चरण से प्राप्त प्लूटोनियम-239 और प्राकृतिक यूरेनियम का मिश्रण (MOX ईंधन)।
- विशेषता (ब्रीडिंग): ये रिएक्टर ‘फास्ट न्यूट्रॉन्स’ का उपयोग करते हैं। इनकी अनूठी विशेषता यह है कि ये बिजली उत्पादन के साथ-साथ उपयोग किए गए ईंधन की तुलना में अधिक नया ईंधन (Plutonium-239) पैदा करते हैं।
- FBTR और PFBR: कलपक्कम स्थित फास्ट ब्रीडर टेस्ट रिएक्टर (FBTR) ने 1985 से इस तकनीक को सिद्ध किया है। हाल ही में अप्रैल 2026 में प्रोटोटाइप फास्ट ब्रीडर रिएक्टर (PFBR) का ‘क्रिटिकल’ होना भारत के लिए एक बड़ा मील का पत्थर है, क्योंकि यह व्यावसायिक पैमाने पर प्लूटोनियम उत्पादन और बिजली उत्पादन को जोड़ेगा।
- हाइड्रोजन का जुड़ाव: इसी चरण में उत्पन्न होने वाली अतिरिक्त गर्मी (Process Heat) का उपयोग हाइड्रोजन उत्पादन में किया जा रहा है, जैसा कि हाल ही में कलपक्कम में देखा गया है।
3. तृतीय चरण: उन्नत भारी जल रिएक्टर और थोरियम चक्र
यह चरण भारत को वैश्विक परमाणु ऊर्जा मानचित्र पर सबसे सुरक्षित और आत्मनिर्भर स्थान प्रदान करेगा।
- ईंधन: थोरियम-232 (Th-232) और यूरेनियम-233 (U-233)।
- प्रक्रिया: थोरियम स्वयं विखंडनीय (Fissile) नहीं है, लेकिन जब इसे द्वितीय चरण में उत्पादित U-233 के साथ उपयोग किया जाता है, तो यह ऊर्जा उत्पन्न करता है।
- दूरगामी लाभ: भारत के पास दुनिया का थोरियम का सबसे बड़ा भंडार (खासकर केरल के तटीय क्षेत्रों में) मौजूद है। इस चरण के सफल होने से भारत अगले कई सौ वर्षों के लिए ऊर्जा के मामले में पूरी तरह आत्मनिर्भर हो जाएगा।
तुलनात्मक विश्लेषण: परमाणु हाइड्रोजन बनाम वर्तमान ट्रेंड्स
परमाणु ऊर्जा का उपयोग करके हाइड्रोजन उत्पादन (Nuclear-Assisted Hydrogen Production) पारंपरिक ग्रीन हाइड्रोजन तकनीकों के सामने एक अत्यंत प्रभावी और व्यावहारिक विकल्प के रूप में उभर रहा है। डॉ. अनिल काकोदकर का दृष्टिकोण इस बात पर केंद्रित है कि कैसे हम ऊर्जा की ‘गुणवत्ता’ और ‘उपलब्धता’ का बेहतर प्रबंधन कर सकते हैं।
यहाँ परमाणु-आधारित हाइड्रोजन और वर्तमान प्रचलित ‘ग्रीन हाइड्रोजन’ (इलेक्ट्रोलिसिस) का विस्तृत तुलनात्मक विश्लेषण दिया गया है:
1. ऊर्जा की प्रकृति और निरंतरता (Base Load vs. Intermittency)
- ग्रीन हाइड्रोजन: यह पूरी तरह से अक्षय ऊर्जा (सौर/पवन) पर निर्भर है। समस्या यह है कि सौर और पवन ऊर्जा ‘अस्थिर’ (Intermittent) हैं—धूप हर समय नहीं होती और हवा की गति बदलती रहती है। इसके कारण हाइड्रोजन का उत्पादन रुक-रुक कर होता है, जिससे उत्पादन लागत बढ़ जाती है।
- परमाणु हाइड्रोजन: परमाणु रिएक्टर एक ‘बेस लोड’ (Base Load) स्रोत हैं। ये साल के 365 दिन, 24×7 निरंतर चलते हैं। इसका अर्थ है कि हाइड्रोजन संयंत्र को एक स्थिर और निरंतर ऊर्जा प्रवाह मिलता है, जिससे उत्पादन प्रक्रिया अधिक सुव्यवस्थित और विश्वसनीय हो जाती है।
2. ऊष्मागतिकी और दक्षता (Thermodynamic Efficiency)
- ग्रीन हाइड्रोजन की सीमा: इलेक्ट्रोलिसिस में प्रक्रिया क्रम इस प्रकार है: ऊष्मा (सौर/कोयला) → बिजली → रासायनिक ऊर्जा (हाइड्रोजन)। हर रूपांतरण चरण (विशेषकर बिजली बनाने में) ऊर्जा का बड़ा हिस्सा ऊष्मा के रूप में नष्ट हो जाता है (Carnot efficiency सीमाएं)।
- परमाणु का लाभ: परमाणु-आधारित ‘थर्मोकेमिकल’ विधियों में हम सीधे ‘प्रक्रिया ऊष्मा’ (Process Heat) का उपयोग करते हैं। यहाँ बिजली रूपांतरण का मध्यवर्ती चरण गायब हो जाता है। जब परमाणु रिएक्टर की उस गर्मी का उपयोग किया जाता है जो अन्यथा ठंडे पानी के स्रोतों में व्यर्थ बहा दी जाती थी, तो समग्र दक्षता (Efficiency) में नाटकीय वृद्धि होती है।
3. कार्बन फुटप्रिंट और पर्यावरणीय प्रभाव
- हालांकि अंतरराष्ट्रीय परिभाषाओं में अक्सर सौर/पवन को ही ‘ग्रीन’ माना जाता है, लेकिन परमाणु ऊर्जा का ‘लाइफ-साइकिल कार्बन फुटप्रिंट’ सौर ऊर्जा के बराबर या उससे भी कम है।
- डॉ. काकोदकर के तर्क के अनुसार, यदि हमारा लक्ष्य ‘नेट जीरो’ (Net Zero) है, तो परमाणु हाइड्रोजन एक ‘कार्बन-मुक्त’ (Carbon-Neutral) ईंधन है। यह जीवाश्म ईंधन पर आधारित ‘ग्रे हाइड्रोजन’ (Grey Hydrogen) का सबसे ठोस विकल्प है।
4. आर्थिक व्यवहार्यता (Economic Viability)
| कारक | ग्रीन हाइड्रोजन (अक्षय) | परमाणु हाइड्रोजन (थर्मोकेमिकल) |
| कैपेक्स (Capex) | कम लेकिन बार-बार रिप्लेसमेंट | अधिक (रिएक्टर निर्माण) |
| ऑपेक्स (Opex) | कम | बहुत कम (ईंधन सस्ता) |
| स्केलेबिलिटी | स्थान-विशिष्ट (सौर/पवन उपलब्धता) | व्यापक (रिएक्टर आधारित) |
5. रणनीतिक दृष्टिकोण
डॉ. अनिल काकोदकर और परमाणु ऊर्जा विभाग (DAE) का मानना है कि भारत जैसे विकासशील देश के लिए, जहाँ इस्पात (Steel) और उर्वरक (Fertilizer) उद्योगों को भारी मात्रा में हाइड्रोजन की आवश्यकता है, केवल सौर ऊर्जा पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं होगा।
- हाइब्रिड मॉडल: भविष्य का आदर्श मॉडल ‘हाइब्रिड’ होगा—जहाँ पीक आवर्स के दौरान सौर ऊर्जा का उपयोग होगा और रात के समय या औद्योगिक मांग के लिए परमाणु-आधारित निरंतर हाइड्रोजन उत्पादन का उपयोग किया जाएगा।
- औद्योगिक एकीकरण: परमाणु संयंत्रों के पास ‘हाइड्रोजन हब’ बनाना सबसे तर्कसंगत है, क्योंकि यह ट्रांसमिशन नुकसान (बिजली भेजने में होने वाली हानि) को पूरी तरह समाप्त कर देता है।
भविष्य की राह: बड़े पैमाने पर व्यावसायिक उत्पादन
वर्तमान में यह सुविधा एक ‘टेक्नोलॉजी डेमोंस्ट्रेटर’ (Technology Demonstrator) है, जिसकी उत्पादन क्षमता 150 लीटर प्रति घंटा (NL/h) है। भाभा परमाणु अनुसंधान केंद्र (BARC) ने इस तकनीक का विकास किया है।
अब डीएई की योजना इसे व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य बनाने की है। विभाग ने भविष्य के लिए 3,000 लीटर प्रति घंटा क्षमता का एक बड़ा संयंत्र स्थापित करने का लक्ष्य रखा है, जो संभवतः PFBR के पास ही बनेगा। यह बड़े पैमाने पर औद्योगिक उत्पादन की नींव रखेगा, जो भविष्य में स्टील निर्माण, उर्वरक संयंत्रों और भारी परिवहन में हाइड्रोजन के उपयोग को संभव बनाएगा।
इस प्रगति के बारे में आईजीसीएआर (IGCAR) के निदेशक श्रीकुमार जी. पिल्लई का कहना है कि यह सफलता FBTR कार्यक्रम के चार दशकों के अनुभव और तकनीकी उत्कृष्टता का परिणाम है।
निष्कर्ष
भारत का यह कदम ऊर्जा के क्षेत्र में एक नए युग की शुरुआत है। परमाणु ऊर्जा का उपयोग करके हाइड्रोजन का उत्पादन करना न केवल हमारे पर्यावरणीय लक्ष्यों को पूरा करने में मदद करेगा, बल्कि यह भारत को वैश्विक ऊर्जा बाजार में एक अग्रणी शक्ति के रूप में भी स्थापित करेगा। यह उपलब्धि साबित करती है कि विज्ञान और अनुसंधान के सही मेल से ऊर्जा संकट का स्थायी समाधान निकाला जा सकता है।




