क्या भारत के सबसे बड़े ‘सफाई-मित्र’ हमेशा के लिए खो जाएंगे?

एक साइलेंट महा-संकट, जिसने भारत के इकोसिस्टम को विनाश की कगार पर खड़ा कर दिया है — जानिए कैसे एक दर्द निवारक दवा ने करोड़ों गिद्धों को मौत की नींद सुला दिया और क्यों इनका बचना हमारे वजूद के लिए जरूरी है।

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नई दिल्ली: सुबह के ठीक छह बजे हैं। आसमान में हल्की धुंध छाई हुई है। करीब तीन दशक पहले तक, भारत के किसी भी शहर या गांव के बाहरी इलाके में इस वक्त आसमान की तरफ देखने पर एक आम नजारा दिखाई देता था सैकड़ों की तादाद में विशालकाय पक्षी बड़े-बड़े घेरे बनाकर हवा में तैरते रहते थे। जैसे ही जमीन पर किसी मृत मवेशी या जानवर का शव दिखाई देता, ये पक्षी बिजली की रफ्तार से नीचे आते और महज 20 से 30 मिनट के भीतर उस विशालकाय शव को पूरी तरह साफ करके कंकाल में बदल देते थे।

लेकिन आज, साल 2026 में, भारत का आसमान सूना है। वो विशालकाय पक्षी, जिन्हें हम गिद्ध (Vultures) कहते हैं, आज हमारे बीच से लगभग गायब हो चुके हैं। बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) और अंतरराष्ट्रीय वैज्ञानिकों के हालिया आंकड़े बताते हैं कि 1990 के दशक से लेकर अब तक भारत में गिद्धों की आबादी में 99% से लेकर 99.9% तक की ऐतिहासिक और भयावह गिरावट दर्ज की गई है। वन्यजीव संरक्षण के इतिहास में किसी भी प्रजाति का इतनी तेजी से खत्म होना एक अभूतपूर्व और डराने वाली घटना है।

यह सिर्फ एक पक्षी के विलुप्त होने की कहानी नहीं है। यह एक ऐसे भयानक पारिस्थितिक असंतुलन (Ecological Imbalance) की शुरुआत है, जिसने भारत में सार्वजनिक स्वास्थ्य, धार्मिक परंपराओं और पूरे ग्रामीण अर्थशास्त्र को हिलाकर रख दिया है। जब हम बाघों, शेरों या हाथियों को बचाने के लिए करोड़ों रुपये के प्रोजेक्ट चलाते हैं, तब हम अक्सर अपने इस सबसे वफादार और मुफ्त में काम करने वाले ‘कुदरती सफाई-मित्र’ को भूल जाते हैं। यह ब्लॉग एक विस्तृत ‘एक्सप्लेनर’ है, जो अखबारों की गहरी पड़ताल, वैज्ञानिक शोधों और सरकारी दस्तावेजों के आधार पर गिद्धों के इसी महा-संकट की पूरी परतें खोलेगा।

आखिर गिद्ध क्या हैं और क्यों इन्हें कुदरत का ‘सफाई-मित्र’ कहा जाता है?

गिद्ध (Vulture) आकार में बहुत बड़े, मजबूत चोंच वाले और अविच्छिन्न रूप से तेज दूरबीन जैसी नजर रखने वाले शिकारी वर्ग (Raptors या Birds of Prey) के पक्षी होते हैं। लेकिन अन्य शिकारी पक्षियों जैसे बाज या चील के उलट, गिद्ध जीवित जानवरों का शिकार अमूमन नहीं करते। वे पूरी तरह से कैरियन’ (Carrion), यानी मरे हुए जानवरों के सड़ते हुए मांस पर निर्भर होते हैं।

विकासवादी जीवविज्ञान (Evolutionary Biology) के नजरिए से गिद्धों को इस तरह डिजाइन किया गया है कि वे सड़े-गले मांस को खाकर पर्यावरण को शुद्ध रख सकें। दुनिया भर में गिद्धों की कुल 23 प्रजातियां पाई जाती हैं, जिन्हें मुख्य रूप से दो श्रेणियों में विभाजित किया गया है:

  1. ओल्ड वीड वल्चर्स (Old World Vultures): ये एशिया, अफ्रीका और यूरोप में पाए जाते हैं। ये सूंघने की क्षमता के बजाय अपनी बेहद तेज आंखों (Visual Senses) का इस्तेमाल करके मृत शरीर को ढूंढते हैं। भारत के सभी गिद्ध इसी श्रेणी में आते हैं।
  2. न्यू वर्ल्ड वल्चर्स (New World Vultures): ये मुख्य रूप से अमेरिकी महाद्वीपों में पाए जाते हैं। इनमें से कई प्रजातियों में सूंघने की शक्ति (Olfactory Sense) बहुत तेज होती है।

गिद्धों के शरीर की अनोखी बनावट: प्रकृति का एक इंजीनियरिंग चमत्कार

गिद्धों को देखकर अक्सर लोग उन्हें बदसूरत या डरावना मान लेते हैं, लेकिन उनकी शारीरिक बनावट के पीछे गहरा वैज्ञानिक कारण है:

  • गंजे सिर और लंबी गर्दन: अधिकांश गिद्धों के सिर और गर्दन पर पंख नहीं होते या बहुत छोटे होते हैं। जब वे किसी मृत जानवर के पेट या शरीर के भीतर अपनी गर्दन डालकर मांस खाते हैं, तो खून और सड़ता हुआ मांस उनके पंखों पर नहीं चिपकता। इससे वे बैक्टीरिया के संक्रमण से बचे रहते हैं और भोजन के बाद धूप में अपने सिर को आसानी से साफ कर लेते हैं।
  • अल्ट्रा-पावरफुल गैस्ट्रिक एसिड: गिद्ध के पेट में पाए जाने वाले हाइड्रोक्लोरिक एसिड का पीएच (pH) स्तर 1 और 2 के बीच होता है, जो लगभग लेड-एसिड बैटरी के तेजाब जितना खतरनाक है। यह एसिड इतना शक्तिशाली होता है कि यह जानवरों की हड्डियों को तो गला ही देता है, साथ ही मांस में मौजूद बेहद जानलेवा बैक्टीरिया और वायरस को भी पूरी तरह नष्ट कर देता है।

इकोसिस्टम के ‘सुपरहीरो’: वे बीमारियां जो गिद्ध हमें छूने नहीं देते

अगर प्रकृति से गिद्धों को हटा दिया जाए, तो सड़ते हुए शव महामारियों का टाइम-बम बन जाते हैं। गिद्ध मुख्य रूप से निम्नलिखित घातक बीमारियों के प्रसार को रोकते हैं:

  • एंथ्रेक्स (Anthrax): यह मवेशियों में होने वाली एक जानलेवा बीमारी है, जिसके बीजाणु (Spores) मिट्टी और वातावरण में दशकों तक जीवित रह सकते हैं। गिद्ध संक्रमित मवेशी को खाकर इस बैक्टीरिया को अपने पेट के एसिड में हमेशा के लिए खत्म कर देते हैं।
  • रेबीज (Rabies) और कॉलरा (Cholera): जब गिद्ध शवों को नहीं खाते, तो वे शव हफ्तों तक खुले में सड़ते हैं। इससे वो बैक्टीरिया नदियों के पानी और हवा में घुलकर इंसानों की बस्तियों तक पहुंच जाते हैं।

भारत में गिद्धों का संसार: कहां पाई जाती हैं कौन सी प्रजातियां?

ऐतिहासिक रूप से भारत गिद्धों के लिए एक स्वर्ग जैसा था। यहां की विशाल मवेशी आबादी (Livestock Population) और ग्रामीण इलाकों में शवों को खुले में फेंकने (Carcass Dumping Sites) की परंपरा ने गिद्धों को भरपूर भोजन दिया। भारत में गिद्धों की 9 प्रजातियां दर्ज हैं, जिनकी वर्तमान संरक्षण स्थिति (IUCN Red List Status) इस प्रकार है:

  • व्हाइट-रम्पड वल्चर (White-rumped Vulture): इसका वैज्ञानिक नाम Gyps bengalensis है और वर्तमान में यह गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered) श्रेणी में है।
  • इंडियन वल्चर / लॉन्ग-बिल्ड वल्चर (Long-billed Vulture): इसका वैज्ञानिक नाम Gyps indicus है और यह भी गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered) श्रेणी में शामिल है।
  • स्लेंडर-बिल्ड वल्चर (Slender-billed Vulture): इसका वैज्ञानिक नाम Gyps tenuirostris है और यह भी गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered) स्थिति में है।
  • रेड-हेडेड वल्चर (Red-headed Vulture): इसका वैज्ञानिक नाम Sarcogyps calvus है और यह भी गंभीर रूप से संकटग्रस्त (Critically Endangered) घोषित है।
  • इजिप्टीयन वल्चर (Egyptian Vulture): इसका वैज्ञानिक नाम Neophron percnopterus है और इसे लुप्तप्राय (Endangered) माना गया है।
  • सिनेरियस वल्चर (Cinereous Vulture): इसका वैज्ञानिक नाम Aegypius monachus है और यह संकट के निकट (Near Threatened) श्रेणी में आता है।
  • बियर्डेड वल्चर / लैमर्जियर (Bearded Vulture): इसका वैज्ञानिक नाम Gypaetus barbatus है और इसकी स्थिति संकट के निकट (Near Threatened) है।
  • हिमालयन ग्रिफन (Himalayan Griffon): इसका वैज्ञानिक नाम Gyps himalayensis है और यह भी संकट के निकट (Near Threatened) श्रेणी में दर्ज है।
  • ग्रिफन वल्चर (Griffon Vulture): इसका वैज्ञानिक नाम Gyps fulvus है और यह कम चिंताजनक (Least Concern) श्रेणी में आता है।

इनके मुख्य ठिकाने और भौगोलिक फैलाव

  • मैदानी और ग्रामीण इलाके: व्हाइट-रम्पड, लॉन्ग-बिल्ड और स्लेंडर-बिल्ड वल्चर भारत के गंगा के मैदानी इलाकों, मध्य भारत के जंगलों, राजस्थान के अर्ध-शुष्क क्षेत्रों और दक्षिण भारत के कुछ हिस्सों में भारी संख्या में पाए जाते थे। ये इंसानी बस्तियों के आसपास के पुराने बरगद, पीपल और शीशम के पेड़ों पर घोंसले बनाते हैं।
  • पहाड़ी और दुर्गम इलाके: हिमालयन ग्रिफन और बियर्डेड वल्चर मुख्य रूप से हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, लद्दाख और जम्मू-कश्मीर के ऊंचे पहाड़ी क्षेत्रों में रहते हैं। बियर्डेड वल्चर की एक खास खूबी यह है कि यह मरे हुए जानवरों की सूखी हड्डियों को आसमान से नीचे चट्टानों पर गिराकर तोड़ता है और फिर उनके अंदर के मज्जा (Bone Marrow) को खाता है।

डिक्लोफेनाक: वह अदृश्य हत्यारा जिसने करोड़ों गिद्धों की जान ली

साल 1990 से 2000 के बीच, भारत के गांवों से एक अजीबोगरीब शिकायतें आने लगीं। लोगों ने देखा कि पेड़ों पर बैठे गिद्ध अचानक अपनी गर्दन झुका लेते थे, सुस्त हो जाते थे और कुछ ही घंटों में पेड़ से नीचे गिरकर तड़प-तड़प कर मर जाते थे। देखते ही देखते, जिन पेड़ों पर सैकड़ों गिद्धों का बसेरा था, वे पूरी तरह खाली हो गए।

शुरुआत में वैज्ञानिकों को लगा कि यह कोई बर्ड फ्लू या संक्रामक महामारी है। लेकिन साल 2003-2004 में द पेरेग्रिन फंड’ के डॉ. लिंडसे ओक्स और उनकी टीम ने एक ऐसी खोज की जिसने पूरी दुनिया के वैज्ञानिकों को चौंका दिया। मौत की वजह कोई वायरस नहीं, बल्कि एक बेहद साधारण और सस्ती दर्द निवारक दवा थी, जिसका नाम था—डिक्लोफेनाक (Diclofenac)।

बीमार गाय/भैंस को डिक्लोफेनाक इंजेक्शन दिया गया 
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जानवर की मृत्यु हुई-दवा शरीर में मौजूद रही
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गिद्धों ने उस मृत जानवर के शव को खाया
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डिक्लोफेनाक गिद्ध के शरीर में पहुंचा (यूरिक एसिड बढ़ा)
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गंभीर विसरल गाउट (Visceral Gout)-किडनी फेल
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पेड़ से गिरकर गिद्ध की दर्दनाक मौत

एक सामान्य दवा कैसे बनी गिद्धों के लिए ज़हर?

डिक्लोफेनाक एक नॉन-स्टेरॉयडल एंटी-इंफ्लेमेटरी ड्रग (NSAID) है। भारत में डेयरी किसान अपनी गायों और भैंसों के पैर के दर्द, सूजन या बुखार को ठीक करने के लिए इस दवा का धड़ल्ले से इस्तेमाल करते थे। यह दवा मवेशियों के लिए तो एक सामान्य पेनकिलर थी, लेकिन गिद्धों के लिए यह ‘साइनाइड’ जैसी घातक साबित हुई।

When कोई मवेशी अपनी मौत से कुछ घंटे या दिन पहले डिक्लोफेनाक की खुराक लेता था और उसकी मौत के बाद उसके शव को खुले में फेंक दिया जाता था, तो गिद्ध उसे बड़े चाव से खाते थे। गिद्धों का शरीर इस केमिकल को पचाने में पूरी तरह असमर्थ है। डिक्लोफेनाक गिद्धों के गुर्दों (Kidneys) को पूरी तरह ब्लॉक कर देता है, जिससे उनके शरीर में यूरिक एसिड का स्तर अचानक अत्यधिक बढ़ जाता है। इस बीमारी को विसरल गाउट’ (Visceral Gout) कहा जाता है। इसमें गिद्ध के आंतरिक अंगों (दिल, लिवर, किडनी) के ऊपर यूरिक एसिड की सफेद चादर जम जाती है और वे तड़पकर दम तोड़ देते हैं।

चौंकाने वाला वैज्ञानिक तथ्य: वैज्ञानिकों ने गणितीय मॉडलों से यह साबित किया कि अगर भारत के कुल मृत मवेशियों में से सिर्फ 1% शवों में भी डिक्लोफेनाक की थोड़ी सी मात्रा मौजूद हो, तो वह भारत की पूरी गिद्ध आबादी को कुछ ही महीनों में खत्म करने के लिए काफी है।

नया विलेन: ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन का दोहरा प्रहार

जब डिक्लोफेनाक के कारण गिद्धों की संख्या पहले ही अपने सबसे निचले स्तर पर पहुंच चुकी थी, तभी उनके सामने इक्कीसवीं सदी की सबसे बड़ी चुनौती आकर खड़ी हो गई-ग्लोबल वार्मिंग (Global Warming) और जलवायु परिवर्तन। अखबारों की हालिया क्लाइमेट रिपोर्ट्स बताती हैं कि बदलते मौसम के मिजाज ने गिद्धों के अस्तित्व पर दोहरा प्रहार किया है।

भीषण गर्मी और हीटवेव (Intense Heatwaves & Dehydration)

हाल के वर्षों में भारत के मैदानी इलाकों (जैसे उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान) में गर्मियों का तापमान 48 डिग्री सेल्सियस से 50 डिग्री सेल्सियस को पार करने लगा है। इतनी अत्यधिक गर्मी के कारण:

  • युवा गिद्धों की मौत: घोंसलों में मौजूद छोटे बच्चे (Chicks) इतनी भीषण गर्मी को सहन नहीं कर पाते। पानी की कमी (Severe Dehydration) के कारण वे उड़ने की उम्र से पहले ही घोंसलों से गिरकर मर जाते हैं।
  • जलस्रोतों का सूखना: जंगलों और ग्रामीण इलाकों के पारंपरिक तालाब और पोखर गर्मियों की शुरुआत में ही सूख जाते हैं, जिससे इन बड़े पक्षियों को पीने का पानी नहीं मिल पाता।

घोंसले बनाने वाले पेड़ों का विनाश (Loss of Nesting Habitats)

गिद्ध अपने घोंसले बनाने के लिए बहुत ऊंचे, पुराने और मजबूत पेड़ों (जैसे अर्जुन, महुआ, बरगद, सिमल) को चुनते हैं। ग्लोबल वार्मिंग के कारण दो बड़ी घटनाएं हो रही हैं:

  • जंगलों की आग (Forest Fires): मध्य भारत और हिमालय की तलहटी में गर्मियों के दौरान जंगलों की आग की घटनाएं कई गुना बढ़ गई हैं। ये आग उन पुराने पेड़ों को जलाकर राख कर देती है, जहां गिद्धों की आखिरी बची हुई कॉलोनियां प्रजनन कर रही हैं।
  • अचानक आने वाले चक्रवात (Cyclones) और आंधी-तूफान: जलवायु परिवर्तन के कारण बेमौसम और अत्यधिक तीव्र आंधी-तूफान आने लगे हैं। ये तूफान गिद्धों के बड़े-बड़े घोंसलों को पेड़ों से नीचे गिरा देते हैं, जिससे उनके अंडे नष्ट हो जाते हैं।

प्रजनन चक्र (Breeding Cycle) का असंतुलित होना

गिद्धों का प्रजनन काल बेहद संवेदनशील होता है। वे आमतौर पर सर्दियों की शुरुआत में अंडे देते हैं और लगभग दो महीने तक उन्हें सेते हैं। लेकिन ग्लोबल वार्मिंग के कारण सर्दियों का समय छोटा होता जा रहा है और अचानक गर्मी शुरू हो जाती है। मौसम के इस अचानक बदलाव के कारण गिद्धों का जैविक क्लॉक (Biological Clock) भ्रमित हो जाता है, जिससे या तो वे अंडे नहीं देते, या फिर उन अंडों से बच्चे सुरक्षित बाहर नहीं निकल पाते।

जब गिद्ध गायब हुए, तो भारत को क्या भुगतना पड़ा?

गिद्धों के गायब होने का असर सिर्फ जंगलों तक सीमित नहीं रहा; इसने भारत के समाज और अर्थव्यवस्था को एक गहरा जख्म दिया। जब गिद्ध गायब हुए, तो प्रकृति की अनूठी खाद्य श्रृंखला (Food Chain) टूट गई और इसके भयानक परिणाम सामने आए:

आवारा कुत्तों का आतंक और रेबीज का विस्फोट

गिद्धों की अनुपस्थिति का सीधा फायदा आवारा कुत्तों (Feral Dogs) को मिला। चूंकि गांवों के बाहर मरे हुए मवेशियों को खाने के लिए अब कोई गिद्ध नहीं बचा था, इसलिए वहां मांस के ढेर सड़ने लगे। इस असीमित भोजन के कारण आवारा कुत्तों की आबादी में अप्रत्याशित बाढ़ आ गई।

गिद्धों की आबादी में क्रैश

1992-2000

डिक्लोफेनाक के कारण भारत के 90% से अधिक गिद्ध गायब हो गए। गांवों के बाहर मरे हुए मवेशियों के शव सड़ने लगे।

आवारा कुत्तों की आबादी में भारी उछाल

2000-2015

भोजन की प्रचुरता के कारण भारत में आवारा कुत्तों की संख्या बढ़कर लगभग 3 करोड़ के पार पहुंच गई।

रेबीज का वैश्विक हॉटस्पॉट

2015-Present

कुत्तों के काटने की घटनाओं में रिकॉर्ड बढ़ोतरी। विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के अनुसार, दुनिया के कुल रेबीज से होने वाली मौतों में से करीब 36% अकेले भारत में होने लगीं।

एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक अध्ययन के अनुसार, भारत में गिद्धों के गायब होने के कारण बढ़े आवारा कुत्तों और उनके इलाज, रेबीज के टीकों तथा मानव श्रम के नुकसान के कारण भारतीय अर्थव्यवस्था को 34 बिलियन डॉलर (करीब 2.8 lakh करोड़ रुपये) का भारी वित्तीय नुकसान उठाना पड़ा।

पारसी समुदाय का धार्मिक संकट

गिद्धों के गायब होने से भारत के पारसी समुदाय के सामने अपनी सदियों पुरानी धार्मिक परंपरा को बचाने का संकट खड़ा हो गया। पारसी धर्म में ‘दोखमेनाशीनी’ (Dokhmenashini) प्रथा के तहत, मृत शरीरों को न तो जलाया जाता है और न ही दफनाया जाता है (क्योंकि वे अग्नि, जल और मिट्टी को पवित्र मानते हैं)। वे शवों को मुंबई के मालाबार हिल स्थित ‘टावर ऑफ साइलेंस’ (Tower of Silence) की खुली छत पर रख देते थे, जहां गिद्ध कुछ ही मिनटों में शव को साफ कर देते थे।

गिद्धों के अचानक गायब होने से टावर ऑफ साइलेंस पर शव महीनों तक सड़ने लगे, जिससे समुदाय को भारी मानसिक और धार्मिक ठेस पहुंची। बाद में, उन्हें शवों को जल्दी गलाने के लिए बड़े-बड़े सोलर कंसंट्रेटर (Solar Concentrators) और अन्य तकनीकी विकल्प अपनाने पड़े, जो कभी भी गिद्धों जितने प्रभावी नहीं साबित हुए।

भारत सरकार के बड़े कदम: महा-संकट से महा-संरक्षण की ओर

जब यह साफ हो गया कि अगर तुरंत कदम नहीं उठाए गए, तो भारत से गिद्ध हमेशा के लिए इतिहास के पन्नों में दर्ज हो जाएंगे, तब भारत सरकार, राज्य सरकारों और बॉम्बे नेचुरल हिस्ट्री सोसाइटी (BNHS) ने मिलकर दुनिया का सबसे बड़ा पक्षी संरक्षण अभियान शुरू किया।

डिक्लोफेनाक और अन्य घातक दवाओं पर पूर्ण प्रतिबंध

  • 2006 का ऐतिहासिक प्रतिबंध: भारत सरकार ने साल 2006 में पशु चिकित्सा (Veterinary Use) के लिए डिक्लोफेनाक के निर्माण, बिक्री और इस्तेमाल पर पूरी तरह से बैन लगा दिया।
  • लूपहोल को बंद करना (2015): प्रतिबंध के बावजूद, कुछ लोग इंसानों वाली डिक्लोफेनाक की बड़ी वॉयल (Vials) खरीदकर चोरी-छिपे पशुओं को लगा रहे थे। इसे रोकने के लिए सरकार ने 2015 में इंसानों वाली डिक्लोफेनाक के 3ml से बड़े पैक बनाने पर भी रोक लगा दी।
  • नए प्रतिबंध (2023-2026): वैज्ञानिकों ने पाया कि डिक्लोफेनाक के अलावा दो और दर्द निवारक दवाएं—केटोप्रोफेन (Ketoprofen) और एसिक्लोफेनाक (Aceclofenac) भी गिद्धों के लिए उतनी ही जानलेवा हैं। भारत सरकार ने हाल ही में इन दोनों दवाओं के पशु चिकित्सा उपयोग पर भी पूरी तरह प्रतिबंध लगा दिया है।

एक्शन प्लान फॉर वल्चर कंजर्वेशन

केंद्रीय पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय ने एक व्यापक पंचवर्षीय योजना लागू की, जिसके तहत देश के हर बड़े राज्य में कम से कम एक गिद्ध संरक्षण केंद्र स्थापित करने का लक्ष्य रखा गया। इस योजना के मुख्य बिंदु हैं:

  • देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों में गिद्धों की आबादी का हर साल वैज्ञानिक सर्वे करना।
  • पशुओं की दवाओं की दुकानों की नियमित रूप से औचक जांच (Surprise Raids) करना ताकि प्रतिबंधित दवाएं न बेची जा सकें।

वल्चर कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर (VCBC) – ‘कृत्रिम जन्म’ की सफलता

चूंकि जंगलों में गिद्ध तेजी से मर रहे थे, इसलिए वैज्ञानिकों ने उनके ‘कैप्टिव ब्रीडिंग’ (Captive Breeding), यानी मानव देखरेख में प्रजनन कराने का फैसला किया। भारत में इस समय चार प्रमुख वल्चर कंजर्वेशन ब्रीडिंग सेंटर सफलतापूर्वक चल रहे हैं:

  1. पिंजौर (हरियाणा) – Jatayu Conservation Breeding Centre: यह दुनिया का सबसे बड़ा गिद्ध प्रजनन केंद्र है, जिसे BNHS और हरियाणा वन विभाग मिलकर चलाते हैं।
  2. राजभातखावा (पश्चिम बंगाल)
  3. रानी (असम)
  4. भोपाल (मध्य प्रदेश)

अंडों का सुरक्षित संकलन (Double Clutching):चरण 1.

गिद्ध साल में सिर्फ एक अंडा देते हैं। वैज्ञानिक चालाकी से उस पहले अंडे को इनक्यूबेटर में रख देते हैं। इसके बाद मादा गिद्ध तुरंत दूसरा अंडा दे देती है। इससे एक साल में दो बच्चे पैदा करने में सफलता मिलती है।

आर्टिफिशियल इनक्यूबेशन और पपेट फीडिंग:चरण 2.

अंडों को मशीनों में सही तापमान पर सेका जाता है। जब बच्चे बाहर आते हैं, तो वैज्ञानिक खुद उनके सामने नहीं जाते, बल्कि गिद्ध के आकार के दस्तानों (Puppets) से उन्हें खाना खिलाते हैं, ताकि बच्चों को इंसानों की आदत न पड़े।

एवियरी में समाजीकरण (Socialization):चरण 3.

जब बच्चे थोड़े बड़े हो जाते हैं, तो उन्हें बड़ी कॉलोनियों (Aviaries) में अन्य गिद्धों के साथ रखा जाता है, जहाँ वे उड़ना और मरे हुए जानवरों का मांस खाना सीखते हैं।

सैटेलाइट टैगिंग और जंगलों में विमुक्ति:चरण 4.

पूरी तरह वयस्क होने पर उनके पंखों पर सैटेलाइट ट्रांसमीटर (Satellite Tags) लगाए जाते हैं और उन्हें खुले आसमान में छोड़ दिया जाता है। वैज्ञानिक कंप्यूटर स्क्रीन पर उनकी हर लोकेशन और सेहत पर नजर रखते हैं।

क्या हम अपने महा-संकट से घिरे ‘सफाई-मित्र’ को बचा पाएंगे?

पिंजौर और अन्य केंद्रों से सैटेलाइट-टैग किए गए गिद्धों को जंगलों में छोड़ने के बाद शुरुआती नतीजे बेहद उम्मीद जगाने वाले रहे हैं। कई छोड़े गए गिद्धों ने जंगलों में अन्य जंगली गिद्धों के साथ मिलकर अपने खुद के कुदरती घोंसले बनाने और अंडे देने शुरू कर दिए हैं।

लेकिन यह लड़ाई तब तक नहीं जीती जा सकती जब तक आम जनता और विशेष रूप से हमारे किसान भाई इस मुहिम का हिस्सा नहीं बनते।

हमें जमीनी स्तर पर क्या करने की जरूरत है?

  • ‘वल्चर सेफ जोन’ (Vulture Safe Zones) का विस्तार: हमें देश के उन सभी नेशनल पार्कों और वाइल्डलाइफ सेंचुरी के आसपास के 100 किलोमीटर के इलाके को पूरी तरह ‘वल्चर सेफ जोन’ बनाना होगा, जहां पशुओं के इलाज में सिर्फ और सिर्फ मेलॉक्सिकैम (Meloxicam) या टॉल्फेनैमिक एसिड (Tolfenamic Acid) जैसी सुरक्षित दवाओं का ही इस्तेमाल हो।
  • गौशालाओं के पास वल्चर रेस्टोरेंट (Vulture Restaurants): हिमाचल प्रदेश और महाराष्ट्र के कुछ हिस्सों में ‘वल्चर रेस्टोरेंट’ की अनूठी मुहिम शुरू की गई है। यहां वन विभाग स्थानीय लोगों से बिना किसी केमिकल वाली दवाओं के मरे हुए मवेशी खरीदता है और उन्हें एक निश्चित सुरक्षित जगह पर गिद्धों के खाने के लिए रख देता है। इससे गिद्धों को 100% ज़हर-मुक्त और सुरक्षित भोजन मिलता है।
  • जागरूकता अभियान: ग्रामीण भारत में आज भी कई लोग गिद्धों को अपशकुन का प्रतीक मानते हैं। हमें स्कूली किताबों और नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से यह संदेश फैलाना होगा कि गिद्ध हमारे दुश्मन नहीं, बल्कि बीमारियों के खिलाफ हमारे सबसे मजबूत सुरक्षा कवच हैं।

निष्कर्ष

गिद्धों का महा-संकट हमें यह बड़ी सीख देता है कि इंसानों की एक छोटी सी लापरवाही या सिर्फ एक केमिकल का गलत इस्तेमाल पूरी पृथ्वी के ताने-बाने को कैसे तहस-नहस कर सकता है। अगर आज भारत का आसमान गिद्धों की विशाल उड़ानों से महरूम है, तो यह हमारे पर्यावरण के बीमार होने का सबसे बड़ा लक्षण है।

भारत सरकार की नीतियां, वैज्ञानिकों की रात-दिन की मेहनत और ब्रीडिंग सेंटर्स की सफलता ने यह उम्मीद जरूर जगाई है कि आने वाले कुछ दशकों में हम इस महा-संकट को पूरी तरह टालने में कामयाब होंगे। अगली बार जब आप आसमान में किसी गिद्ध को ऊंचे घेरे लगाते देखें, तो उसे डरावना समझने के बजाय दिल से शुक्रिया जरूर कहिएगा—क्योंकि वह आपके पर्यावरण को स्वच्छ और आपको सुरक्षित रखने के अपने काम पर मुस्तैद है।

Meenu Rautela

Meenunewwork@gmail.com

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