नई दिल्ली: दुनिया के मानचित्र पर एक छोटा-सा द्वीपसमूह गैलापागोस (Galapagos Islands) अपनी अद्भुत प्राकृतिक संपदा के लिए मशहूर है। यहां विशालकाय कछुओं से लेकर दुर्लभ पक्षी और रंग-बिरंगे इगुआना तक, सब कुछ ऐसा जो कहीं और नहीं मिलता। चार्ल्स डार्विन की विकासवाद थ्योरी को प्रेरणा देने वाला यह इलाका अब खुद संकट में है। बढ़ते जलवायु परिवर्तन और बार-बार आने वाली प्राकृतिक आपदाओं ने यहां की जैव विविधता को खतरे में डाल दिया है। हाल में इक्वाडोर की एसपोल यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक गहन अध्ययन किया, जिसमें पिछले सात दशकों के ज्वालामुखी फटने, भूकंप, सुनामी, मूसलाधार वर्षा और ऊंची लहरों के रिकॉर्ड को खंगाला गया। यह रिपोर्ट ‘नेचुरल हैजर्ड्स’ जर्नल में छपी है और चेतावनी देती है कि ये खतरे अब और गंभीर हो चले हैं।
आपदाओं का जाल: एक से शुरू, कई पर खत्म
वैज्ञानिकों का मानना है कि प्राकृतिक विपदाएं कभी अकेले नहीं आतीं, वे एक-दूसरे से जुड़ी हुई एक चेन बनाती हैं। मिसाल के तौर पर, ज्वालामुखी का फटना सिर्फ गर्म लावा और धूल ही नहीं फैलाता। इससे जंगलों में भीषण आग लग सकती है, एसिड रेन हो सकती है, जमीन का आकार बदल सकता है और अगर पहाड़ का कोई भाग गिरे तो समुद्री सुनामी तक पैदा हो सकती है। नतीजा? पानी के स्रोत जहरीले हो जाते हैं, लोगों की सेहत पर असर पड़ता है, सड़कें-इमारतें तबाह हो जाती हैं और स्थानीय जानवरों-पौधों की प्रजातियां विलुप्त होने की कगार पर पहुंच जाती हैं। इसी तरह, भारी बारिश से लैंडस्लाइड, बाढ़ और मिट्टी की उर्वरता का नुकसान जैसी मुसीबतें खड़ी हो सकती हैं। एक समस्या कई नई जन्म देती है, और गैलापागोस जैसे नाजुक इलाके में यह सिलसिला और तेज चलता है।
इंसान और पर्यावरण का नाजुक संतुलन
इस रिसर्च की सबसे बड़ी ताकत है कि यह सिर्फ प्रकृति पर नहीं रुकती। बल्कि द्वीप के निवासियों की जिंदगी पर पड़ने वाले प्रभाव को भी गहराई से देखती है। यहां के लोग पीने का पानी, खेती और पर्यटन से जुड़े कारोबार पर निर्भर हैं, सब कुछ इन आपदाओं की चपेट में आ जाता है। जंगलों और समुद्र में बसने वाले दुर्लभ प्राणी भी खतरे में पड़ते हैं। जैसे, अगर एल नीनो या ला नीना जैसी क्लाइमेट घटनाओं से सूखा पड़ता है, तो जंगलों में आग भड़क सकती है। इससे हवा प्रदूषित होती है, मिट्टी की नमी सोखने की ताकत कमजोर पड़ती है और जानवर अपना ठिकाना खो बैठते हैं। भूकंप या सुनामी से रोड-ट्रांसपोर्ट सिस्टम चरमरा जाता है, पानी की सप्लाई रुक जाती है और पर्यटन से जुड़ी सुविधाएं ध्वस्त हो जाती हैं।
अर्थव्यवस्था और समाज पर पड़ता बोझ
आपदाओं का दर्द सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं रहता। यह सामाजिक और आर्थिक ढांचे को भी हिला देता है। गैलापागोस की इकोनॉमी मुख्य रूप से टूरिज्म और नैचुरल रिसोर्सेज पर टिकी है। अगर कोई बड़ा हादसा हो जाए और पर्यटक दूर रहने लगें, तो स्थानीय लोगों की कमाई ठप हो जाती है। पानी-खाने की कमी से दैनिक जीवन मुश्किल बन जाता है। इसलिए, वैज्ञानिक जोर देते हैं कि खतरे से लड़ने के लिए सिर्फ साइंस काफी नहीं समाज की कमजोरियों और आर्थिक तैयारियों को भी मजबूत करना होगा।
नया प्लान: आपदा से पहले की तैयारी
यह स्टडी सिर्फ समस्या बताने तक नहीं रुकती, बल्कि एक प्रैक्टिकल फ्रेमवर्क भी देती है। रेड क्रॉस, लोकल गवर्नमेंट और इक्वाडोर की ईसीयू911 इमरजेंसी सर्विस जैसी एजेंसियां इसे इस्तेमाल कर आपदाओं का मुकाबला कर सकती हैं। इससे फैसले तेज होंगे, नुकसान कम होगा और रेस्क्यू ऑपरेशन में वक्त बचेगा। गैलापागोस में पहले से ‘सुनामी रेडी’ प्रोग्राम चल रहा है, जो सुनामी जैसी घटनाओं के लिए लोगों को ट्रेन करता है। रिसर्चर्स सलाह देते हैं कि लोकल डेटा कलेक्शन बढ़ाया जाए और संस्थाओं के बीच कोऑर्डिनेशन मजबूत किया जाए।
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क्लाइमेट चेंज: खतरे को दोगुना करने वाला फैक्टर
वैश्विक स्तर पर जलवायु परिवर्तन से आपदाओं की तीव्रता बढ़ रही है, और गैलापागोस जैसे संवेदनशील द्वीपों पर इसका असर कई गुना ज्यादा है। समुद्र का बढ़ता जलस्तर, तापमान की वृद्धि और अनियमित मौसम पैटर्न यहां के इकोसिस्टम को तोड़ रहे हैं। मानवीय गतिविधियां जैसे ओवर-टूरिज्म और रिसोर्स एक्सप्लॉइटेशन दबाव और बढ़ा रही हैं। वैज्ञानिकों का कहना है कि अब आपदाओं को अलग-अलग देखने का वक्त नहीं, हमें उनके इंटरकनेक्शन समझने होंगे और समाज-प्रकृति दोनों पर प्रभाव का आकलन करना होगा। गैलापागोस का भविष्य इस बात पर टिका है कि हम अनिश्चितताओं का कितना सटीक अनुमान लगाते हैं और कितनी मजबूत तैयारियां करते हैं। मल्टी-हैजर्ड अप्रोच अपनाकर हम रिस्क को कम कर सकते हैं और लोगों, इकोनॉमी व पर्यावरण को बचा सकते हैं। यह द्वीप सिर्फ इक्वाडोर का नहीं, पूरी दुनिया का खजाना है। इसे बचाने के लिए साइंटिस्ट, गवर्नमेंट, लोकल कम्युनिटी और ग्लोबल पार्टनर्स को हाथ मिलाना होगा।



