नई दिल्ली: कल्पना कीजिए कि जो चीज हमें सूरज की खतरनाक किरणों से बचाती है, वही अब धरती को और ज्यादा गर्म करने का कारण बन रही है। जी हां, हम बात कर रहे हैं ओजोन (Ozone Layer) की, जो ऊपरी वातावरण में हमारी ढाल है, लेकिन एक ग्रीनहाउस गैस के रूप में गर्मी को भी फंसा लेती है। हाल ही में यूनिवर्सिटी ऑफ रीडिंग के शोधकर्ताओं ने एक चौंकाने वाला खुलासा किया है। उनके मुताबिक, ओजोन को नुकसान पहुंचाने वाली गैसों जैसे सीएफसी पर लगे प्रतिबंध से ओजोन लेयर की मरम्मत हो रही है, लेकिन बढ़ते प्रदूषण के साथ मिलकर यह पहले सोचे गए अनुमान से 40 प्रतिशत ज्यादा गर्माहट पैदा कर सकती है।
ओजोन की मरम्मत से जलवायु पर असर
इस रिसर्च में वैज्ञानिकों ने पाया कि 2015 से 2050 तक ओजोन के कारण पृथ्वी पर औसतन 0.27 वॉट प्रति वर्ग मीटर अतिरिक्त गर्मी बढ़ सकती है। इससे ओजोन कार्बन डाइऑक्साइड के बाद ग्लोबल वार्मिंग का दूसरा सबसे बड़ा कारक बन जाएगा। इसी दौरान सीओ2 से 1.75 वॉट प्रति वर्ग मीटर गर्मी बढ़ने की संभावना है। स्टडी के प्रमुख वैज्ञानिक प्रोफेसर बिल कॉलिन्स ने बताया कि सीएफसी और एचसीएफसी जैसी गैसों पर रोक लगाना बिल्कुल सही फैसला है, क्योंकि ये ओजोन को तबाह करती हैं। लेकिन जैसे-जैसे ओजोन लेयर ठीक हो रही है, धरती की गर्मी पहले की तुलना में कहीं ज्यादा बढ़ रही है। उन्होंने जोर देकर कहा कि वाहनों, कारखानों और पावर प्लांट्स से निकलने वाला प्रदूषण जमीन के करीब ओजोन बनाता है, जो न सिर्फ सेहत के लिए घातक है, बल्कि तापमान बढ़ाने में भी बड़ा रोल अदा कर रहा है।
प्रदूषण से बिगड़ रही स्थिति
शोधकर्ताओं ने कंप्यूटर सिमुलेशन का इस्तेमाल करके भविष्य के वातावरण के बदलावों का आकलन किया। नतीजे बताते हैं कि 1987 के मॉन्ट्रियल प्रोटोकॉल के तहत सीएफसी जैसी गैसों पर लगी पाबंदी से ओजोन की सुरक्षा तो हुई, लेकिन जलवायु परिवर्तन रोकने में उतना फायदा नहीं मिल रहा जितना उम्मीद थी। जैसे-जैसे ओजोन लेयर मजबूत हो रही है, यह गर्मी को और रोक रही है, जिससे इन गैसों पर रोक से मिलने वाला क्लाइमेट बेनिफिट काफी कम हो गया है। वैज्ञानिकों का कहना है कि जो देश वायु प्रदूषण पर काबू पाने के लिए कदम उठाएंगे, वे सतह के पास बनने वाले ओजोन को भी थोड़ा नियंत्रित कर पाएंगे। फिर भी, अगले कुछ दशकों में ओजोन लेयर में खुद-ब-खुद सुधार जारी रहेगा, और इससे अतिरिक्त गर्मी बढ़ना तय लगता है।
ओजोन की रक्षा अभी भी प्राथमिकता
बहरहाल, वैज्ञानिक इस बात पर एकमत हैं कि ओजोन लेयर को बचाना बेहद जरूरी है। यह हमें कैंसर, आंखों की समस्याओं और फसलों-जानवरों को नुकसान पहुंचाने वाली यूवी किरणों से बचाती है। स्टडी में जलवायु नीतियों में बदलाव की सलाह दी गई है, जहां ओजोन से बढ़ने वाली गर्मी को भी फैक्टर माना जाए। यह रिसर्च जर्नल एटमॉस्फेरिक केमिस्ट्री एंड फिजिक्स में छपी है। वहीं, मैसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (एमआईटी) की एक अलग स्टडी में चेतावनी दी गई है कि ग्लोबल वार्मिंग से सतह के पास ओजोन को कंट्रोल करना और मुश्किल हो जाएगा।
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फसलों पर पड़ रहा बुरा असर
ओजोन सतह पर एक मजबूत ऑक्सीडेंट की तरह काम करता है, जो पौधों की पत्तियों को झुलसा देता है और उनकी ग्रोथ रोक देता है। इससे फसलें कम होती हैं। नेचर जियोसाइंस जर्नल में छपी एक रिपोर्ट में भी कहा गया है कि सतह ओजोन से पेड़-पौधों की बढ़त धीमी पड़ जाती है, क्योंकि यह कार्बन डाइऑक्साइड सोखने की उनकी क्षमता घटा देता है। याद रखिए, यह ग्राउंड लेवल ओजोन ऊपरी ओजोन लेयर से अलग है – यह प्रदूषकों और सूरज की रोशनी की रिएक्शन से बनता है और जहरीला होता है। भारत में आईआईटी खड़गपुर की स्टडी से पता चला है कि अगर ओजोन प्रदूषण पर काबू नहीं पाया गया, तो गेहूं की पैदावार 20 प्रतिशत तक गिर सकती है, जबकि चावल और मक्के में 7 प्रतिशत की कमी आ सकती है। कुल मिलाकर, यह खबर हमें सोचने पर मजबूर करती है कि पर्यावरण की सुरक्षा के कदमों में बैलेंस बनाना कितना अहम है। ओजोन लेयर बचानी है, लेकिन प्रदूषण पर भी सख्ती जरूरी, वरना 2050 तक गर्मी का सैलाब हमें और परेशान कर सकता है।



