Climate Change डाल रहा लोगों के मानसिक स्वास्थ्य पर असर

MIT की ताजा रिसर्च बताती है कि चिलचिलाती गर्मी (Climate Change) में लोग ज्यादा चिड़चिड़े और नेगेटिव महसूस करते हैं,जिससे उनका मानसिक स्वास्थ्य खराब हो रहा हैं।

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नई दिल्ली: सोचिए, जब बाहर का मौसम उबल रहा हो, तो क्या आपका मूड भी खराब नहीं हो जाता? यह सिर्फ एक एहसास नहीं, बल्कि विज्ञान की सच्चाई है। दुनिया भर के वैज्ञानिकों ने पाया है कि वैश्विक तापमान (Climate Change) की लगातार बढ़ोतरी न सिर्फ हमारे शरीर को थका रही है, बल्कि दिमाग और दिल पर भी भारी पड़ रही है। एमआईटी समेत कई प्रमुख संस्थानों के विशेषज्ञों की ताजा रिसर्च बताती है कि चिलचिलाती गर्मी में लोग ज्यादा निराश, चिड़चिड़े और नेगेटिव महसूस करते हैं। खासकर सोशल मीडिया पर शेयर की जाने वाली पोस्ट्स से यह साफ झलकता है। यह स्टडी हाल ही में प्रतिष्ठित जर्नल ‘वन अर्थ’ में छपी है।

दुनिया भर के 1.2 अरब से ज्यादा पोस्ट्स की पड़ताल

शोधकर्ताओं ने 2019 में 157 देशों से आए 1.2 अरब से अधिक सोशल मीडिया पोस्ट्स को खंगाला। ये पोस्ट 65 अलग-अलग भाषाओं में थे, जिन्हें समझने के लिए उन्होंने एडवांस्ड एआई टूल बीईआरटी का सहारा लिया। हर पोस्ट को 0 से 1 के स्केल पर रेट किया गया – जहां 0 मतलब पूरी तरह नेगेटिव और 1 मतलब पॉजिटिव। इन डेटा को 2,988 जगहों के मौसम रिकॉर्ड्स से जोड़कर देखा गया। नतीजा? जब पारा 35 डिग्री सेल्सियस से ऊपर चढ़ता है, तो लोगों की पोस्ट्स में नेगेटिविटी बढ़ जाती है। गरीब देशों में यह असर 25 प्रतिशत तक ज्यादा दिखा, जबकि अमीर देशों में सिर्फ 8 प्रतिशत।

गरीब देशों में तीन गुना ज्यादा मार

एमआईटी की प्रोफेसर सिकी झेंग, जो इस रिसर्च से जुड़ी हैं, कहती हैं कि बढ़ती गर्मी सिर्फ फिजिकल हेल्थ या इकोनॉमी को ही नहीं चोट पहुंचा रही, बल्कि रोजाना की भावनाओं को भी बिगाड़ रही है – और यह पूरी दुनिया में फैल रहा है। स्टडी से पता चला कि सालाना आय 13,845 डॉलर से कम वाले देशों में गर्मी का मानसिक बोझ अमीर देशों से तीन गुना ज्यादा है। इससे साफ है कि क्लाइमेट चेंज का इमोशनल इंपैक्ट हर जगह एक समान नहीं – गरीब इलाकों में यह ज्यादा गहरा है। एक अन्य शोधकर्ता यिचुन फैन का मानना है कि भविष्य की क्लाइमेट पॉलिसी में मानसिक स्वास्थ्य को अनुकूल बनाने पर फोकस करना होगा, खासकर कमजोर समुदायों के लिए।

आने वाले सालों में और गिरेगी मेंटल हेल्थ

क्लाइमेट मॉडल्स की मदद से वैज्ञानिकों ने अनुमान लगाया कि अगर यही रुझान चला, तो सदी के अंत तक ग्लोबल वार्मिंग से लोगों की इमोशनल वेलबीइंग में 2.3 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। रिसर्चर निक ओब्राडोविच बताते हैं कि मौसम अब सिर्फ बॉडी नहीं, बल्कि मूड और फीलिंग्स को भी कंट्रोल कर रहा है। हमें सोसाइटी लेवल पर इस स्ट्रेस को हैंडल करने की तैयारी करनी होगी। सोशल मीडिया डेटा से हमें रियल-टाइम इंसाइट मिलती है कि अलग-अलग कल्चर्स में लोग क्या फील कर रहे हैं – जो ट्रेडिशनल सर्वे से मुमकिन नहीं।

टॉपिक कॉम्प्लेक्स है और ज्यादा स्टडी की जरूरत

हालांकि, वैज्ञानिक मानते हैं कि यह टॉपिक कॉम्प्लेक्स है और ज्यादा स्टडी की जरूरत है। एक समस्या यह है कि सोशल मीडिया यूजर्स पूरी पॉपुलेशन को रिप्रेजेंट नहीं करते, जैसे बच्चे या बुजुर्ग कम इस्तेमाल करते हैं, जबकि गर्मी उन्हें ज्यादा प्रभावित करती है। इसलिए, असली इंपैक्ट स्टडी के अनुमान से भी बड़ा हो सकता है। कुल मिलाकर, यह रिसर्च हमें चेताती है कि क्लाइमेट चेंज सिर्फ पर्यावरण की नहीं, बल्कि हमारी मेंटल हेल्थ की भी दुश्मन बन रही है। समय रहते कदम उठाने होंगे, वरना गर्मी का यह ‘मूड स्विंग’ हमें और परेशान कर सकता है।

Usha Mehta

ushamehta0013@gmail.com

NewG India का सबसे युवा चेहरा, दिल्ली विश्वविद्यालय से हिंदी पत्रकारिता में स्नातक की डिग्री हासिल की। ग्रेजुएशन के बाद IGNOU और ABP न्यूज़ नेटवर्क जैसे संस्थानों में इंटर्नशिप की। सोशल और कॉमर्स विषयों की गहरी समझ हैं कलम के साथ आवाज में भी धार हैं। NewG India में बतौर कंटेंट डेवलपर व एंकर अपनी जिम्मेदारी उषा मेहता बखूबी निभा रही हैं ।

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