Climate Change: बढ़ते तापमान से जीवों की दुनिया पर मंडराता खतरा

कनेक्टिकट यूनिवर्सिटी के पारिस्थितिकी और विकासवादी जीव विज्ञान विभाग के विशेषज्ञों ने एक ऐसा सिस्टम तैयार किया है, जिसे वे तेज जलवायु climate change जीव मूल्यांकन नाम दे रहे हैं। यह पुरानी, सुस्त और सालों पुरानी तकनीकों की जगह लेने के लिए बनाया गया है।

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नई दिल्ली: साल 2024 ने पर्यावरण की दुनिया में एक नया अध्याय लिखा, जो उतना ही चौंकाने वाला है जितना डरावना। यह साल रिकॉर्ड तोड़ गर्मी का गवाह बना, जो न सिर्फ पिछले दस सालों में सबसे ज्यादा रहा बल्कि वैज्ञानिकों की मानें तो पिछले लाखों सालों की तुलना में भी अभूतपूर्व। इस बढ़ती हुई तपिश (Climate Change) ने इंसानों के साथ-साथ पृथ्वी पर बसने वाली असंख्य जीव प्रजातियों को भी संकट में डाल दिया है। अब सवाल यह उठता है कि कौन-सी प्रजातियां इस गर्मी की गिरफ्त में सबसे ज्यादा फंस रही हैं और किनका अस्तित्व पूरी तरह मिटने की कगार पर पहुंच सकता है? इसी दिशा में अमेरिका की कनेक्टिकट यूनिवर्सिटी के वैज्ञानिकों ने एक क्रांतिकारी तरीका ईजाद किया है, जो तेजी से इस खतरे का मूल्यांकन कर सकता है।

नई जांच पद्धति का जन्म

कनेक्टिकट यूनिवर्सिटी के पारिस्थितिकी और विकासवादी जीव विज्ञान विभाग के विशेषज्ञों ने एक ऐसा सिस्टम तैयार किया है, जिसे वे तेज जलवायु जीव मूल्यांकन नाम दे रहे हैं। यह पुरानी, सुस्त और सालों पुरानी तकनीकों की जगह लेने के लिए बनाया गया है। इसकी खासियत यह है कि यह किसी भी जीव प्रजाति पर जलवायु की चरम सीमाओं के प्रभाव को झट से जांच सकता है। इस विधि को 2023 में विकसित किया गया और अगले ही साल इसे दुनिया भर की 33 हजार से ज्यादा रीढ़धारी प्रजातियों पर आजमाया गया।

अध्ययन के हैरान करने वाले परिणाम

नेशनल एकेडमी ऑफ साइंसेज की पत्रिका में छपे इस रिसर्च से कई चौंकाने वाली बातें सामने आईं। 2024 में हर छठी प्रजाति ने ऐसे तापमान का सामना किया, जो उनकी पूरी evolutionary हिस्ट्री में कभी नहीं आया था। जो प्रजातियां 2023 में गर्मी से जूझी थीं, उनमें से करीब 80 प्रतिशत ने 2024 में भी वैसी ही मुश्किलों का सामना किया। वैज्ञानिकों को लग रहा था कि यह प्रभाव बेतरतीब होगा, जैसे एक साल एक जगह तो अगले साल कहीं और। लेकिन हकीकत इससे उलट निकली: बार-बार वही इलाके और वही जीव प्रभावित हो रहे हैं। यह समस्या उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में एक समान नहीं फैली, बल्कि दक्षिण अमेरिका और अफ्रीका के भूमध्यरेखीय हिस्सों में ज्यादा गहराई से देखी गई। शोधकर्ताओं ने इसे ‘खराब कैद’ की तरह बताया, जहां लगातार दबाव बढ़ता जाता है। जैसे बैंक में ब्याज पर ब्याज जुड़ता है, वैसे ही हर साल की गर्मी जीवों की सहन क्षमता पर अतिरिक्त बोझ डालती है। उन्हें सांस लेने या खुद को ठीक करने का वक्त ही नहीं मिलता, जिससे उनकी मजबूती घटती जाती है और विलुप्त होने की संभावना कई गुना बढ़ जाती है।

क्यों बन रहा है यह और घातक?

आज का जलवायु बदलाव इतिहास में सबसे तेज गति से हो रहा है। पहले जीव धीरे-धीरे खुद को नई स्थितियों के अनुरूप ढाल लेते थे, लेकिन अब यह तेज रफ्तार उन्हें ऐसा मौका नहीं दे रही। अगर किसी प्रजाति की संख्या बार-बार गिरती है और वह लगभग खत्म होने की स्थिति में पहुंच जाती है, तो उसे बचाना नामुमकिन हो जाता है। इस रिसर्च में सुझाव दिया गया है कि यह सिस्टम सिर्फ रीढ़धारी जीवों तक नहीं रुकेगा; आगे इसमें कीड़े-मकोड़े और पेड़-पौधों को भी जोड़ा जाएगा। वैज्ञानिकों का प्लान है कि हर साल एक रिपोर्ट जारी की जाए, जिसमें जीवों की वर्तमान हालत और संभावित जोखिमों का ब्योरा हो। इससे फायदा यह होगा कि हम जमीनी स्तर पर तुरंत कार्रवाई कर सकेंगे जैसे गर्मी के पीक में जीवों को पानी और छांव उपलब्ध कराना, भोजन की कमी न होने देना, या संवेदनशील क्षेत्रों में पहले से ही मॉनिटरिंग और तैयारी रखना।

2024 का साल एक साफ संकेत है कि अब देर हो रही

2024 का साल एक साफ संकेत है कि अब देर हो रही है। यह महज एक साल की कहानी नहीं, बल्कि यह दिखाता है कि कैसे निरंतर बढ़ती गर्मी हमारी जैविक संपदा को कमजोर कर रही है। शोध में वैज्ञानिकों के शब्दों में, यह बिल्कुल वैसा है जैसे बैंक अकाउंट जीरो हो जाए, फिर ब्याज की दर का कोई महत्व नहीं रहता। ठीक उसी तरह, अगर जीव प्रजातियां लगातार दबाव में आकर खत्म हो गई, तो उन्हें वापस लाना असंभव होगा। इसलिए यह नई जांच पद्धति न सिर्फ अलर्ट देती है, बल्कि हमें समय रहते कदम उठाने का अवसर भी प्रदान करती है, ताकि हम इस ग्रह की अनमोल जैव विविधता को संरक्षित रख सकें।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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