नई दिल्ली: राजस्थान के रेगिस्तान में महेंद्र रैका की आवाज टूटती है। हमारे बाप-दादा बादल को देखकर गीत गाते थे, ‘बादल आया, पानी लाया…’। अब बादल आते हैं, बरसते नहीं। जो चारागाह हमारी मां की तरह थे, उन पर सौर पैनल चमक रहे हैं। मेरा ऊंट दिन भर भटकता है, शाम को थककर मेरे पैरों पर सिर रखकर रोता है। मैं उसे गले लगाकर चुपके से रोती हूं। दिल्ली में कोई नहीं सुनता।कच्छ की मालधारी बहन फातमा की आंखें नम हैं। पहले रात में ठंडी हवा आती थी, बच्चे रजाई में दुबककर सोते थे। अब रजाई भी जलाती है। मेरी बकरियां दूध देना भूल गईं। मेरे बच्चे रात को भूखे सोते हैं। मैं उन्हें जंगल की कहानी सुनाते-सुनाते खुद रो पड़ती हूं। ये जलवायु नहीं, हमारे दिलों पर वार है।
ये धरती के सबसे पुराने बच्चे हैं
जिन्होंने कभी पेड़ नहीं काटा, सिर्फ उसकी छांव में लोरी गाई। जिन्होंने तालाब को मिट्टी नहीं दी, उसकी प्यास बुझाई। जिन्होंने जंगल को मां कहा, उसकी गोद में अपने बच्चों को सुलाया। जिन्होंने रेगिस्तान को भी हरा रखा, उसकी रेत में अपने आंसुओं से फूल उगाए। आज वही बच्चे बेघर हैं। वही माएं रेत में आंसू बहा रही हैं।
सौर पैनल की चमक में खो गई बचपन की धूप-छांव
कच्छ के एक छोटे से गांव में सात साल की गुड़िया अपनी बकरी को गले लगाकर रोती है। दीदी, ये लोहे के पंखे इतने बड़े क्यों हैं? मेरी बकरी अब कहां चरेगी? पहले यहां घास होती थी, मैं यहां लुका-छिपी खेलती थी। अब सिर्फ धूप है और धूप जलाती है। उसके पिता चुप हैं। उनकी जमीन अब ‘बंजर’ कहलाती है। वह बंजर नहीं थी। वहां कभी हरी घास लहराती थी, जहां बच्चे ऊंट की पीठ पर चढ़कर हंसते थे, जहां माएं दूध उबालती थीं, जहां बूढ़े शाम को हुक्का गुड़गुड़ाते हुए कहानियां सुनाते थे। अब सिर्फ चमक है और चमक के पीछे अंधेरा।
2014 से 2024 तक 1.73 लाख हेक्टेयर वन भूमि चली गई। 48% नवीकरणीय ऊर्जा प्रोजेक्ट साझा चारागाहों पर। ‘बंजर’ कहकर कब्जा। जबकि ये सदियों की जीवनरेखा थे। लैंड कॉन्फ्लिक्ट वॉच की रिपोर्ट चीख-चीखकर बता रही है कि ये प्रोजेक्ट स्वच्छ ऊर्जा तो दे रहे हैं, पर इनकी कीमत मालधारी बच्चों की मुस्कान से चुकाई जा रही है।
कार्बन क्रेडिट की चमक में खो गईं आंखों की चमक
दिल्ली-मुंबई की कंपनियां प्रेजेंटेशन में कहती हैं, हमने 10 लाख टन कार्बन बचा लिया। लेकिन रेगिस्तान में एक बूढ़ा चरवाहा कहता है, मेरे पोते की आंखों की चमक बचा लो। वो अब ऊंट नहीं देखता, सिर्फ सौर पैनल देखता है। कार्बन क्रेडिट की कीमत है पर एक मां का आंसू कीमत नहीं रखता?
ग्रीन इंडिया मिशन, कैम्पा फंड, कार्बन क्रेडिट स्कीम, सब सागौन-बांस के जंगल लगा रहे हैं। स्थानीय पेड़ गायब, पक्षी गायब और जैव-विविधता गायब है और सबसे बड़ी बात कि समुदायों को कुछ नहीं मिलता। उनकी जमीन ‘लैंड बैंक’ में डाल दी जाती है। ग्राम सभा की सहमति? नाममात्र की। ऊर्जा मंत्रालय चलाता है सबकुछ, आदिवासी मंत्रालय खामोश।
ओडिशा की जंगल माएं फिर भी नहीं हारीं
कोरापुट की गदबा महिलाएं सुबह चार बजे उठती हैं। अंधेरे में लालटेन लेकर जंगल जाती हैं। मृत लकड़ी चुनती हैं, बीज बोती हैं। हमारे पुरखों ने सिखाया कि जंगल मरता है तो हम मरते हैं। 15 साल में 22 दुर्लभ पेड़ बचाए। 50 एकड़ बंजर को फिर से मां बनाया। 50 साल का वन आकलन किया। सामुदायिक नियम बनाए, सिर्फ मृत लकड़ी, घुमावदार चराई, बीज छोड़ना। लेकिन दिल्ली कहती है, इसे मापा नहीं जा सकता, इसलिए जलवायु रणनीति नहीं।
पुनासिया गांव की महिलाएं: उम्मीद की आखिरी किरण
1980 में जंगल कटे, लोग पलायन करने लगे, पर महिलाएं नहीं मानीं। 20 साल में 50 एकड़ बंजर को हरा-भरा किया। साल, महुआ, बांस लगाए, पानी लौटा, फसलें लौटीं और लौटी। यह जंगल अब कार्बन सिंक है, तापमान कम करता है, बारिश लाता है, भूजल भरता है, पर कार्बन ट्रेडिंग में इसका कोई हिस्सा नहीं। क्योंकि यहां कोई कॉर्पोरेट नहीं, सिर्फ माएं हैं।
समुदायों की सदियों पुरानी रणनीतियां, जिन्हें नीतियां नजरअंदाज करती हैं
शोधकर्ता अरुण अग्रवाल ने बताया:
- विविधीकरण – खेती, पशु, वन उत्पाद
- साझेदारी – चारा, पानी, अन्न भंडार
- भंडारण – संकट के लिए स्टॉक
- गतिशीलता – मौसम के हिसाब से प्रवास
- सूचना साझा – पारंपरिक कैलेंड
ये आज भी जीवित हैं। राजस्थान के कल्याणपुरा में बंजर भूमि हरी हुई।।केरल-तमिलनाडु में मछुआरे ‘पडु’ से साझा करते हैं। पर नीतियाँ अंधी हैं।
अब वक्त है इन आंसुओं को पोंछने का
- चारागाह वापस करो
- ग्राम सभा को असली ताकत दो
- सौर पैनल नीचे फसलें, मछली, पशुधन उगने दो
- कार्बन क्रेडिट का पैसा सीधे समुदाय की जेब में डालो
- उनकी आवाज़ को नीति का केंद्र बनाओ
- पेसा, वनाधिकार कानून, एफपीआईसी को जिंदा करो
- मनरेगा, एनआरएलएम को साझा संसाधनों से जोड़ो
- तमिलनाडु में पवन चक्की की कमाई का हिस्सा किसानों को मिलता है। इसी मॉडल को पूरे देश में फैलाओ।
- सौर पैनल ऊँचे करो, नीचे फसलें उगाओ।
- समुदाय को सह-स्वामित्व दो।
COP-30 में कौन बोलेगा इनकी भाषा?
ब्राजील में 11 नवंबर से COP-30 शुरू हो रहा है। वहां सूट-बूट वाले बड़े-बड़े वादे करेंगे, पर कोई यह नहीं बताएगा कि कच्छ की मालधारी बहन अब रात को सोते हुए डरती है कि कहीं उसका ऊंट भूख से मर न जाए।
कोरापुट की गदबा मां अपने बच्चे को जंगल की कहानी सुनाते-सुनाते खुद रो पड़ती है। राजस्थान का रैका बच्चा अब ऊंट नहीं, सिर्फ सौर पैनल देखता है।
अंतिम चेतावनी
ये घुमंतू, ये आदिवासी ये धरती के आखिरी रखवाले हैं।
अगर इन्हें बचाना है तो अब वक्त है। वरना एक दिन आएगा जब रेगिस्तान में सिर्फ सौर पैनल चमकेंगे और दूर कहीं एक बच्चा अपनी मां से पूछेगा कि मां, ऊंट क्या होता था? जंगल क्या होता था? और मां चुप रहेगी, क्योंकि उसकी आंखों में आंसू होंगे और आंसुओं की कोई भाषा नहीं होती।



