1G…..6G, सारा खेल रफ्तार का

केंद्रीय संचार और ग्रामीण विकास मंत्री डॉ. पेम्मासानी चंद्रशेखर का कहना है कि देश मेंं 99.8 प्रतिशत जिलों में 5G नेटवर्क पहुंच गया है।

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नई दिल्ली: 20वीं सदी अगर तेल व गैस की थी तो 21वीं सदी में बोलबाला डाटा रहेगा। महाबली वही होगा, जो अपना डाटा भेजने में तेज होगा। डाटा मतलब आंकड़ा, तथ्य। आभासी संसार, Digital World में वह चीज डाटा है, जिसे भौतिक लेन-देन के बगैर एक जगह से दूसरी जगह भेजना है या संग्रहित रखना है। यह आपकी आवाज, तस्वीर हो सकती है या आपका ऑडियो, वीडियो, कोई दूसरी फाइल।

यह जो 1G से 4G तक का सफर है और 5 व 6G दस्तक दे रहा है, वह इससे तय होता है कि डाटा को भेजने की गति क्या है। 2G में यह धीमी थी और 6G में बाकी सबसे तेज। इसके साथ जो दूसरी चीज भी जुड़ी है वह है डाटा की मात्रा। 2G से 6G तक पहुंचने के क्रम में यह बढ़ता जाता है।

सामान्य समझ बनाने के लिए इसकी तुलना सड़क परिवहन से कर सकते हैं। एक संकरी व उबड़-खाबड़ सड़क पर वाहन चल नहीं पाते। जबकि चौड़ा, सपाट और बाधारहित हाइवे पर वाहन फर्राटे भरता है। हाइवे से जो दूरी एक घंटे में तय होती है, संकरी सड़कों से उसी में पांच से छह घंटे लगते हैं। आभासी संसार में कुछ-कुछ यही बा‌त डाटा ट्रांसफर की भी है। हाइवे इसमें स्पेक्ट्रम है, बैंडविथ लेन और वाहन Wave या तरंग। सवारी इसकी डाटा है। 

2G में डाटा संकरी सड़क से गुजरता है। इसमें विशेष प्रकृति के डाटा के लिए ठीक से लेन नहीं होती। मतलब स्पेक्ट्रम भी कम है ओर बैंडविथ भी ठीक नहीं है। तभी इसमें डाटा धीमी गति से जाता है। मात्रा भी कम होती है। जबकि 6G में बेहतरीन हाइवे, स्पेक्ट्रम की अलग-अलग लेन से होकर गुजरना संभव होगा। मात्रा भी ज्यादा होगी। पलक झपकते एक साथ ऑडियो, वीडियो, तस्वीर के साथ और भी बहुत कुछ जा सकेगा। G इनमें जनरेशन है।

असल में, ‌अभासी दुनिया में सारा डाटा तरंगों के रूप में भेजा जाता है। यह विद्युत चुंबकीय तरंगे, इलेक्ट्रोमै‌ग्नेटिक वेब होती हैं। इनका इस्तेमाल भी बेवजह नहीं है। इस तंरगों की इनकी चाल बहुत तेज, सूर्य के प्रकाश की चाल के बराबर होती है। मतलब यह हर सेंकेंड में करीब 3,00,000 लाख किमी दूर तक चली जाती हैं। यह धरती से लेकर आकाश तक में भी चल लेती हैं। तभी इनको धरती से उपग्रह, उपग्रह से दूसरे शहर तक तुरत भेजा जा सकता है।

तरंग की चाल का मतलब क्या?
अब शायद आप सोच रहे हों कि तरंग की चाल का मतलब क्या है? इसमें दो चीजें होती हैं। पहला आवृत्ति (फ्रीक्वेंसी) और दूसरा तरंग दैर्ध्य (वेवलेंथ)। यह दोनों एक-दूसरे से जुड़ी हैं। लेकिन कुछ इस तरह से कि एक ज्यादा होगा तो दूसरा कम। तरंग कैसी है, वह इन्हीं राशियों सेे तय होता है। आवृत्ति का मतलब नियत में तरंग का वहां लौटना, जहां से वह चली थी। जैसे कोई एक व्यक्ति; मान लीजिए कि राम, आपके पास एक मिनट में तीन बार आया और श्याम छह बार। जबकि दोनों एक ही चाल से चल रहे हैं। तो इसमें श्याम की आवृत्ति ज्यादा हुई, लेकिन वेवलेंथ कम होगी। वह ज्यादा बार आपके पास इसलिए आ सकता, क्योंकि आपके पास से जाने और लौटकर आने में कम दूरी तय की। जबकि ज्यादा दूरी से ही राम कम बार आपके पास आ सका।

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लौटते हैं बैंडविथ पर
लौटते हैं लेन मतलब बैंडविथ पर। 2G से 6G की तरफ दुनिया तभी बढ़ पा रही है, जब तरंगों को ले जाने वाली विशेष लेन मौजूद है। यह हर घर से जुड़ा मसला है। घर में कंप्यूटर हो, लैपटॉप हो, मोबाइल हो या फिर ऑफिस में बड़ी-बड़ी फाइल भेजना हो, यह सब बिना बैंडबिथ नहीं चल सकते। इस शब्द का इस्तेमाल दो तरह से होता है;

1. इंटरनेट के संदर्भ में। इसमें बैंडबिथ यह बताता है कि कितना डेटा निश्चित समय में ट्रांसमिट किया जा सकता है। यह बिट्स प्रति सेकंड (बीपीएस) के हिसाब से होता है। 
2. मोबाइल टेलीफोन के लिए। इसमें यह एक बैंड की फ्रीक्वेंसी या वेवलैंग्थ की रेंज बताता है। जितनी ज्यादा बैंडविथ होगी, उतना ज्यादा तेजी से अधिक डेटा ट्रांसफर किया जा सकेगा। यानी तेज स्पीड से। इस डेटा को बिट्स में नापा जाता है।

डाटा जिस दर से ट्रांसफर होता है, एक जगह से दूसरी जगह पहुंचता है, उसे बिट्स प्रति सेकंड के हिसाब से नापते हैं। एक किलोबिट यानी 1000 बिट्स और मेगाबिट्स मतलब 1000 किलोबिट। इसलिए एक मेगाबिट यानी दस लाख बिट्स। यह दर जितनी अधिक होगी, उतनी ही इंटरनेट स्पीड तेज होगी। हाई बैंडविथ का अर्थ है 2 से 4 एमबीपीएस की दर से डेटा ट्रांसफर करना। जाहिर तौर पर हर जनरेशन में डाटा पहले की तुलना में तेजी से आगे बढ़ेगा।

जानिए स्पेक्ट्रम भी
अब आते हैं स्पेक्ट्रम पर। इसे आप यूं समझिए। मान ‌लीजिए कि सरकार कोई हाइवे बनाने जा रही  है। इसके लिए वह जमीन का अधिग्रहण करती है। और तय दायरे में वह हाइवे बना देती है। यही हाइवे स्पेक्ट्रम है। इसका दायरा 300 किलोहर्ट्स से लेकर 300 गीगाहर्ट्स के बीच में है। इससे नीचे और ऊपर की जगह में हमारे-आपके काम का डाटा लेकर जाने वाली इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगें नहीं गुजर सकती।

जिस तरह हाइवे पर अलग-अलग लेन होती है, उसी तरह से स्पेक्ट्रम पर बैंडविथ होती है। विशेष तरह की सूचना विशेष ले जा रही इलेक्ट्रोमैग्नेटिक तरंगे विशेष बैंडविथ पर ही गुजरती हैं। सुरक्षा से जुड़ी सूचनाओं की तरंगों के लिए बैंडविथ एक है, टेलीकाम के लिए दूसरी और एयर ट्रैफिक के लिए तीसरी। इनमें कोई टकराव नहीं है। कोई भी देश अगर टेलीकॉम से जुड़ी सेवाओं पर काम कर रहा है तो उसी फ्रीक्वेंसी पर तरंगों को भेजेगा, जो उसके लिए आबंटित बैंडविथ है। यही बात दूसरी सेवाओं की तरंगों के लिए भी सही है।

यह इलेक्ट्रोमैग्नेटिक स्पेक्ट्रम का शार्ट फार्म है। यह वह विकिरण ऊर्जा है, जो धरती को चारों ओर से घेरे है। इसका मुख्य स्रोत सूर्य है। तारों, आकाशगंगाओं से लेकर धरती के नीचे दबे रेडियोएक्टिव तत्वों तक से यह ऊर्जा मिलती है। अगर कोई कंपनी किसी स्पेक्ट्रम का कारोबार के तौर पर इस्तेमाल करना चाहती है तो उसे पहले यह तय करना होगा कि उसे तरंग की लंबाई कितनी चाहिए होगी। वह कितनी फ्रीक्वेंसी, कितनी ऊर्जा, कितनी दूर तक ले जा सकती है? टेलीकॉम सेक्टर में रेडियो तरंगों का इस्तेमाल किया जाता है। वजह यह कि यही सबसे लंबी तरंगे होती हैं।

अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ
अंतरराष्ट्रीय दूरसंचार संघ की बात किए बिना डाटा ट्रांसफर की बात अधूरी है। वजह यह कि अब सवाल यही बचा कि इस सबको नियामक कौन है। तो वह यह संघ ही है। यह एक अंतरराष्ट्रीय संगठन है। अंतरराष्ट्रीय रेडियो और दूरसंचार व्यवस्था को नियमित और मानकीकृत करने हेतु स्थापित हुई थी। इसकी स्थापना पैरिस में 17 मई 1865 में हुई थी। यह रेडियो वर्णक्रम मतलब स्पेक्ट्रम का मानकीकरण, नियमन, अलग-अलग देशों के आपसी संबंधों में तालमेल बिठाता है। यही तय करता है कि किस बैंडविथ पर कौन सी सूचना ले जाने वाली तरंग गुजरेगी। सामान्य अवस्था में सभी देश इसका मानते भी हैं।

यहां तक तो ठीक है। लेकिन सवाल यह उठता है कि दुनिया के सभी संप्रभु देश किस तरह के संघ की बात को मान लेते हैं। कभी किसी देश ने दूसरी वैंडविथ पर काबिज होने की कोशिश की तो क्या होगा? इस सवाल का जवाब यातायात नियमों से ढूढ़ा जा सकता है। दूसरा देश तभी यह काम कर सकेगा, जब उसके पास तकनीक हो। फिर, एक सी तकनीकी महारत करने वाले देश अगर ऐसा करते हैं तो हाइवे की तरह तरंगों में भी टक्कर होगी। एक संदेश लेकर जा रही तरंग दूसरे संदेश के जाने वाली तरंगों के साथ टकराएगी। इसका नतीजा दोनों देशों को भुगतना पड़ेगा। इसी वजह से सभी आपसी सहमित से तय किए गए फार्मूले के हिसाब से अपने हिस्से के स्पेक्ट्रम का इस्तेमाल करते हैं।

आखिर में बात सुरक्षा पर। डाटा की सुरक्षा तकनीक से किया जाता है। दूसरे कई सुरक्षा मानकों के साथ आम तौर पर हर संदेश इंक्रिप्टेड होता है, मतलब इस तरह बनता है, जिसे समझ पाना दूसरे के लिए संभव नहीं। इंक्रिप्टेड मैसेज को डिक्रिप्टेड करते वक्त उसकी भाषा समझ में नहीं आती। इससे संबंधित संदेश सुरक्षित रहता है।

1G-6G…,जानिए सबकुछ

1G

  • यह दुनिया की वायरलेस टेलीफोनी की पहली तकनीक है। 
  • यह पहली बार 1980 में सामने आई और 1992-93 तक इसका इस्तेमाल किया जाता रहा। 
  • इसमें डेटा की रफ्तार 2.4 केवीपीएस थी। 
  • इस तकनीक की बड़ी खामी इसमें रोमिंग का ना होना था। 
  • पहली बार अमेरिका में 1जी मोबाइल सिस्टम ने इस तकनीक का प्रयोग किया था। 
  • इसमें मोबाइल फोन पर आवाज की क्वालिटी काफी खराब थी।

2G

  • इसकी शुरुआत 1991 में फिनलैंड में हुई। 
  • यह ग्लोबल सिस्टम फॉर मोबाइल कम्यूनिकेशन पर आधारित तकनीक है जिसे संक्षिप्त रूप में जीएसएम टेक्नॉलजी कहते हैं।
  • इसमें पहली बार डिजिटल सिग्नल का प्रयोग किया गया। 
  • इससे फोन कॉल के अलावा पिक्चर मैसेज, टेक्स मैसेज और मल्टीमीडिया मैसेज भेजा जाने लगा। 
  • इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसे इस्तेमाल करने से काफी कम ऊर्जा की खपत होती है और फोन की बैटरी काफी ज्यादा चलती है। 
  • इस तकनीक पर डेटा की रफ्तार 50,000 बिट्स प्रति सेकेंड तक हो सकती है। 
  • इसमें डाउनलोड और अपलोड की अधिकतम स्पीड 236 केवीपीएस (किलो बाइट प्रति सेकंड) होती है। 
  • इसके एडवांस वर्शन को 2.5जी और 2.7जी नाम दिया गया था, जिसमें डेटा की और भी तेजी से आगे बढ़ता है।

3G

  • इसकी शुरुआत 2001 में जापान में हुई। 
  • इसका मानकीकरण इंटरनेशनल टेलेकम्यूनिकेशन यूनियन (आईटीयू) ने किया था। 
  • इससे टेक्स्ट, तस्वीर और वीडियो के अलावा मोबाइल टेलीविजन और वीडियो कांफ्रेसिंग या वीडियो कॉल किया जा सकता है।
  • इसने दुनिया में क्रांति ला दी और मोबाइल फोन की अगली पीढ़ी यानी स्मार्टफोन को बढ़ावा दिया। 
  • डेटा के आने-जाने की रफ्तार 40 लाख बिट्स प्रति सेकेंड तक होती है। 
  • इनका जोर मुख्य रूप से डेटा ट्रांसफर पर है। 
  • 2G तकनीक की तुलना में 3G की एक अहम खासियत यह है कि यह आंकड़ों के आदान-प्रदान के लिए अधिक सुरक्षित (इनक्रिप्टेड) है। 
  • इसकी अधिकतम डाउनलोड स्पीड 21 एमवीपीएस और अपलोड स्पीड 5.7 एमवीपीएस होती है। 
  • इस तकनीक ने मोबाइल फोन के लिए एप बनाने का रास्ता खोल दिया।

4G

  • इसकी शुरुआत साल 2000 के अंत में हुई। 
  • इसे मोबाइल तकनीक की चौथी पीढ़ी कहा जाता है। 
  • इसके माध्यम से 100 एमवीपीएस से लेकर एक जीबीपीएस तक की स्पीड से डेटा का डाउनलोड-अपलोड किया जा सकता है।
  • यह ग्लोबल रोमिंग को सपोर्ट करता है। 
  • यह 3G की तुलना में सस्ती है। साथ ही सिक्युरिटी के फीचर्स भी ज्यादा है। 
  • लेकिन इसमें 3G के मुकाबले अधिक बैटरी की खपत होती है।
  • इस तकनीक से लैस मोबाइल फोन में जटिल हार्डवेयर प्रणाली की जरूरत होती है, इसलिए 3G फोन के मुकाबले 4G के फोन महंगे होते हैं। 
  • देश अभी 4जी नेटवर्क पर चल रहा है।

5G तकनीक

  • इसकी शुरुआत साल 2010 में हुई। इसे मोबाइल नेटवर्क का पांचवी पीढ़ी कहा जाता है। 
  • यह ‘वायरलेस बर्ल्ड वाइड वेब’ (मोबाइल इंटरनेट) को ध्यान में रखकर बनाया गया है। 
  • इस तकनीक में बड़े पैमाने पर डेटा का आदान-प्रदान होगा।
  • एचडी क्वालिटी का वीडियो के साथ मल्टीमीडिया न्यूजपेपर प्रसारित की जा सकती है। 
  • इसमें अल्ट्रा हाइडेफिनिशन क्वालिटी की आवाज का प्रसारण किया जा सकता है।
  • इस तकनीक की सबसे बड़ी खूबी रियल टाइम में बड़े से बड़े डेटा का आदान-प्रदान होगा। 
  • साथ ही यह तकनीक संवर्धित वास्तविकता (अगर्मेंटेड रियलिटी) के क्षेत्र में नया रास्ता खोलेगी, यानि इसके माध्यम से फोन कॉल पर आप बिल्कुल आमने-सामने बात कर पाने में सक्षम होंगे। 
  • विभिन्न साइंस फिक्शन और फंतासी कथाओं में जिस प्रकार व्यक्ति आपके आगे आभासी रूप में उपस्थित हो जाता है और आप उससे आमने-सामने बात करने में सक्षम होते हैं।

6G

  • 6G पर भी काम शुरू हो गया है। 
  • इसकी स्पीड को लेकर अभी प्रामाणिक डाटा बाहर नहीं आया है, लेकिन माना जा रहा है कि यह नेटवर्क 5G नेटवर्क की स्पीड तुलना में 50 गुना तेज होगी।
  • चीन और जापान में रिसर्च एंड डवलपमेंट का काम चल रहा है। भारत ने भी इस दिशा में कदम बढ़ाया है।

Navneet Sharan

navneetsharan@gmail.com https://newgindia.com/

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