नई दिल्ली: देशभर में छात्रों की आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को सभी स्कूलों, कॉलेजों और कोचिंग संस्थानों के लिए छात्रों की मानसिक सेहत को सुरक्षित रखने हेतु 15 बिंदुओं वाले दिशानिर्देश जारी किए हैं। यह आदेश उस याचिका की सुनवाई के दौरान आया, जो एक ऐसे छात्रा के पिता ने दायर की थी, जिसकी जुलाई में विशाखापट्टनम स्थित आकाश बायजूस कोचिंग सेंटर में NEET की तैयारी के दौरान रहस्यमय परिस्थितियों में मौत हो गई थी।जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता ने कहा कि जब तक संसद उपयुक्त कानून या नियामकीय ढांचा तैयार नहीं करती, तब तक ये दिशा-निर्देश सभी शिक्षण संस्थानों पर बाध्यकारी रहेंगे।
सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को दो महीने में नियम बनाने के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे निजी कोचिंग संस्थानों के पंजीकरण, छात्रों की सुरक्षा और शिकायत निवारण तंत्र को अनिवार्य बनाने वाले नियम दो महीने के भीतर अधिसूचित करें। साथ ही हर जिले में जिला मजिस्ट्रेट की अध्यक्षता में एक निगरानी समिति गठित करने का भी आदेश दिया गया, जो निरीक्षण, कार्यान्वयन और शिकायतों पर निगरानी रखेगी।
केंद्र सरकार से 90 दिनों में प्रगति रिपोर्ट मांगी
अदालत ने केंद्र सरकार को 90 दिनों के भीतर एक अनुपालन हलफनामा दाखिल करने को कहा है जिसमें बताया जाए कि किन कदमों के ज़रिए राज्यों के साथ समन्वय, नियमन और निगरानी की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है। साथ ही छात्रों की मानसिक सेहत पर नेशनल टास्क फोर्स की रिपोर्ट की समयसीमा भी इसमें शामिल होनी चाहिए।
शिक्षण संस्थानों के लिए मुख्य दिशानिर्देश
- मानसिक स्वास्थ्य नीति अनिवार्य – सभी शिक्षण संस्थानों को ‘उम्मीद’ गाइडलाइन, ‘मनोदर्पण’ योजना और राष्ट्रीय आत्महत्या रोकथाम नीति के आधार पर मानसिक स्वास्थ्य नीति अपनानी होगी और उसे हर साल अपडेट करना होगा। यह नीति संस्थान की वेबसाइट और नोटिस बोर्ड पर सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होनी चाहिए।
- परामर्शदाता अनिवार्य – जिन संस्थानों में 100 या अधिक छात्र हैं, उन्हें मानसिक स्वास्थ्य में प्रशिक्षित परामर्शदाता, मनोवैज्ञानिक या सामाजिक कार्यकर्ता की नियुक्ति करनी होगी। छोटे संस्थानों को बाहरी विशेषज्ञों से लिंक बनाना होगा।
- छोटे बैचों में मेंटौर नियुक्त – खासकर परीक्षा या शैक्षणिक संक्रमण के दौरान छात्रों के लिए निरंतर, अनौपचारिक और गोपनीय सहयोग हेतु छोटे समूहों में मेंटौर नियुक्त किए जाएं।
- सेफ्टी मापदंड – हॉस्टल वाले संस्थानों को छत, बालकनी जैसे उच्च जोखिम वाले स्थानों तक पहुंच सीमित करनी होगी। पंखों आदि में छेड़छाड़ न हो, इसके लिए सुरक्षा उपकरण लगाए जाएं।
- बैच विभाजन पर रोक – छात्रों को उनकी अकादमिक प्रदर्शन के आधार पर अलग-अलग बैच में न रखा जाए। उनके स्तर से अधिक लक्ष्य देने या सार्वजनिक रूप से शर्मिंदा करने पर भी रोक लगाई गई।
- हिंसा, शोषण व भेदभाव पर सख्त कदम – यौन शोषण, रैगिंग, जाति, धर्म, लिंग, विकलांगता या यौन रुझान जैसे किसी भी आधार पर भेदभाव की घटनाओं की गोपनीय रिपोर्टिंग और समाधान की व्यवस्था हो। शिकायतकर्ताओं को प्रतिशोध से बचाना संस्थान की ज़िम्मेदारी होगी।
- संस्थान की जिम्मेदारी तय – यदि किसी घटना पर समय रहते उचित कार्रवाई नहीं की गई, तो उसे संस्थागत लापरवाही माना जाएगा और उस पर कानूनी कार्यवाही की जा सकेगी।
नेशनल टास्क फोर्स का गठन
सुप्रीम कोर्ट ने छात्रों की आत्महत्या की घटनाओं को बेहद गंभीर मानते हुए नेशनल टास्क फोर्स गठित करने का आदेश दिया है।यह टास्क फोर्स पूरे देश में छात्रों की मानसिक सेहत, तनाव के कारण, आत्महत्या की प्रवृत्ति, और संस्थागत जिम्मेदारियों पर गहराई से अध्ययन कर एक व्यापक रिपोर्ट तैयार करेगी। कोर्ट ने केंद्र सरकार से कहा है कि वह इस टास्क फोर्स की रिपोर्ट और उसकी कार्ययोजना पेश करे।इस टास्क फोर्स का उद्देश्य केवल स्थिति का मूल्यांकन करना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि हर राज्य और संस्थान छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए स्पष्ट नीति और व्यवस्था अपनाएं।
निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट का यह आदेश छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य की सुरक्षा की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना जा रहा है। जब तक इस दिशा में कोई व्यापक कानून नहीं बनता, तब तक ये दिशानिर्देश सभी सार्वजनिक व निजी शिक्षण संस्थानों, कोचिंग सेंटर्स और हॉस्टलों पर अनिवार्य रूप से लागू रहेंगे। अदालत ने साफ कर दिया कि मानसिक स्वास्थ्य अब वैकल्पिक नहीं बल्कि अनिवार्य प्राथमिकता है।



