नई दिल्ली: भारत का चुनाव आयोग (Election Commission of India-ECI), जो संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत स्थापित एक स्वायत्त संवैधानिक संस्था है, आज उस दोराहे पर खड़ा है, जहां उसकी खुद की पारदर्शिता पर गहरे सवाल उठने लगे हैं।
एक ओर वह नागरिकों से आधार लिंकिंग, सत्यापन और डेटा साझाकरण की मांग करता है। और दूसरी ओर खुद अपने फैसलों, आंकड़ों और प्रक्रिया को गोपनीय बनाए रखता है। यह स्थिति न केवल लोकतांत्रिक मूल्यों पर प्रहार करती है, बल्कि सहभागी लोकतंत्र के रक्षार्थ जन आंदोलन और नागरिक जवाबदेही की आवश्यकता को भी रेखांकित करती है।
चुनाव आयोग की भूमिका और अपेक्षाएं
चुनाव आयोग का दायित्व है:
- स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव कराना
- मतदाता सूची को अद्यतन और शुद्ध रखना
- सभी दलों और नागरिकों के साथ समान व्यवहार करना
इसी मकसद से आयोग वोटर वेरिफिकेशन, ईवीएम पारदर्शिता और डिजिटल ट्रैकिंग जैसे उपायों को बढ़ावा देता है। परंतु जब जनता या मीडिया इन सबसे संबंधित आंकड़े, प्रक्रिया और डेटा की मांग करती है, तो आयोग अक्सर चुप्पी साध लेता है या सूचना के अधिकार अधिनियम (RTI Act, 2005) के तहत जानकारी देने से इनकार कर देता है।
दोहरे मापदंड: पारदर्शिता एकतरफा क्यों?
CHRI के निदेशक वेंकटेश नायक ने Deccan Herald के अपने लेख में यह महत्वपूर्ण सवाल उठाया है कि चुनाव आयोग मतदाताओं से पारदर्शिता की अपेक्षा करता है, परंतु जब खुद पर सवाल उठते हैं, तो वह उत्तर देने से बचता है।
इस दोहरे मापदंड के कुछ उदाहरण:
- ईवीएम बनाम वीवीपैट विवाद-आयोग बार-बार कहता है कि मशीनें भरोसेमंद हैं, पर वीवीपैट डेटा का पूर्ण सार्वजनिक मिलान नहीं करता।
- RTI आवेदनों को टालना-कई बार मतदान प्रतिशत, पोस्टल बैलेट की स्थिति, या तकनीकी गड़बड़ियों से संबंधित सूचना RTI में अस्वीकार कर दी जाती है।
- चुनावी परिणामों की समय-सीमा-कई बार राज्य या संसदीय चुनावों के मतगणना के आंकड़े दिनभर नहीं मिलते, जिससे संदेह और भ्रम पैदा होता है।
लोकतांत्रिक मूल्यों के रक्षार्थ संदर्भ: जवाबदेही की मांग
पिछले दो दशकों में भारत में कई आंदोलन हुए RTI आंदोलन, जनलोकपाल आंदोलन और हाल ही में चुनावी बांड के खिलाफ चल रहे अभियान। इन सभी आंदोलनों की जड़ में एक ही मांग रही कि सरकारी संस्थाएं जनता के प्रति उत्तरदायी हों। अब समय आ गया है कि चुनाव आयोग जैसी संस्था को भी इस जवाबदेही के दायरे में लाया जाए। चुनाव आयोग कोई पवित्र गाय नहीं है। वह भी सार्वजनिक संस्था है और जनता को जवाब देने के लिए बाध्य है। ऐसे में चुनाव आयोग जैसी लोकतांत्रिक संस्थाओं के स्वायत्तता बनाए रखने और उन पर नागरिकों के विश्वास को अक्षुण्ण रखने के लिए आवश्यक है कि:
- ईवीएम और वीवीपैट डेटा सार्वजनिक रूप से साझा किया जाए।
- सभी मतदान प्रतिशत और परिणामों को पारदर्शी और समयबद्ध तरीके से जारी किया जाए।
- चुनाव आयोग RTI को पूरी तरह लागू करे और जानकारी रोके नहीं।
- राजनीतिक दलों को समान अवसर देने की उसकी भूमिका की समीक्षा की जाए।
अंतरराष्ट्रीय संदर्भ
अमेरिका, जर्मनी, फ्रांस जैसे लोकतांत्रिक देशों में चुनाव आयोग जैसे निकायों को पब्लिक ऑडिट, ओपन डेटा, और सार्वजनिक परामर्श (Public Consultation) की प्रक्रिया से गुजरना पड़ता है। भारत में भी यदि ECI खुद को निष्पक्ष और आधुनिक संस्था कहना चाहता है, तो उसे जन जागरूकता और नागरिकों के सवालों को अनदेखा नहीं करना चाहिए।
- लोकतंत्र में पारदर्शिता एकतरफा नहीं हो सकती
- पारदर्शिता केवल मतदाता की जिम्मेदारी नहीं-वह संस्थाओं की बुनियादी शर्त है।
जब चुनाव आयोग मतदाताओं से सत्यापन की मांग करे, तब जनता को पूरा अधिकार है यह पूछने का कि:
- आयोग खुद कितना पारदर्शी है?
- क्या वह खुद जवाबदेह है?
- क्या उसका आचरण लोकतांत्रिक है?
यदि उत्तर नहीं है-तो यह किसी राजनीतिक दल की आलोचना नहीं, बल्कि लोकतंत्र के स्वास्थ्य की चिंता है। यदि हम चाहते हैं कि भविष्य में चुनावों पर विश्वास बना रहे- तो हमें अब चुनावी पारदर्शिता काम करने की जरूरत है। यह किसी पार्टी के पक्ष में होगा, न विपक्ष में, बल्कि जनता के अधिकार, संवैधानिक नैतिकता, और उत्तरदायी लोकतंत्र के लिए होगा।
संदर्भ:
- वेंकटेश नायक, When an opaque Election Commission demands voter transparency, Deccan Herald, 12 July 2025
- RTI Act, 2005-भारत सरकार
- Election Commission of India official website

नोट: प्रकाशित लेख में लेखक के निजी विचार हैं।




सुलझा हुआ बेबाक विचार 👌👌👌
लोकतंत्र के लिए तुम्हारे द्वारा पूछे गए सभी प्रश्न ज्वलंत है। कायल हो जाती हूँ मैं जब भी तुम्हारे विचार राजनीतिक या सामाजिक संदर्भ में पढ़ती हूँ।
रुचि उत्पन्न होने लगती इन विषयों में।👍👍👍