मुजफ्फरपुर: बिहार के पटना-मुजफ्फरपुर एनएच पर सरपट दौड़ती गाड़ियों की तरह कुढ़नी विधानसभा क्षेत्र की चुनावी राजनीति सीधी नहीं है। यहाँ की चुनावी राहों में कई दांव-पेंच, समीकरण और चुनौतियाँ हैं, जो इसे एक दिलचस्प चुनावी मैदान बनाती हैं। कभी कांग्रेस का गढ़ रहे इस क्षेत्र में अब भगवा लहरा रहा है, लेकिन सत्ता समीकरणों का खेल यहाँ के नेताओं के लिए आसान नहीं है।
राजनीतिक इतिहास और सत्ता का बदलाव
आजादी के बाद शुरुआती तीन चुनावों में कांग्रेस ने यहां जीत दर्ज की। लेकिन, 1969 से समाजवादियों ने अपनी जड़ें जमा लीं और कांग्रेस को 1985 के बाद से यहाँ कोई खास सफलता नहीं मिली।
समाजवाद का उदय: साधुशरण शाही ने 1969 में कांग्रेस को हराकर समाजवाद का झंडा बुलंद किया। उन्होंने 1969 से लेकर 1990 तक चार बार इस सीट का प्रतिनिधित्व किया।
बीजेपी का दबदबा: पिछले डेढ़ दशक में इस सीट पर चार चुनाव हुए हैं। 2010 में जेडीयू के मनोज सिंह कुशवाहा ने जीत हासिल की, लेकिन 2015 में बीजेपी के केदार प्रसाद गुप्ता ने उन्हें हराकर यह सीट अपने नाम कर ली।
उपचुनाव का गणित: 2020 के चुनाव में केदार गुप्ता को आरजेडी के अनिल सहनी से हार का सामना करना पड़ा। हालांकि, सहनी की सदस्यता रद्द होने के बाद 2022 में हुए उपचुनाव में केदार गुप्ता ने फिर वापसी की और जेडीयू के मनोज कुशवाहा को हरा दिया। अब जब जेडीयू और बीजेपी एक साथ हैं, तो बीजेपी के लिए अपने सहयोगी दलों को साधना एक बड़ी चुनौती होगी।
इस बार के चुनावी मुद्दे और जनता की अपेक्षाएं
कुढ़नी में इस बार चुनावी मुद्दे पिछले कई सालों से चले आ रहे वादों और अधूरे विकास कार्यों पर केंद्रित होंगे।
मनियारी को प्रखंड बनाने की मांग: यह दशकों पुरानी मांग इस बार भी एक बड़ा चुनावी मुद्दा बनेगी।
आधारभूत संरचना का अभाव: मनियारी-महुआ रोड का चौड़ीकरण, वाया नदी पर उच्चस्तरीय पुल, फरदो नाले का जीर्णोद्धार और तिरहुत नहर की मरम्मत जैसे वादे अभी भी अधूरे हैं।
रोजगार और पलायन: क्षेत्र में कृषि आधारित उद्योगों की संभावना होने के बावजूद रोजगार की कमी है, जिससे युवाओं और श्रमिकों का पलायन जारी है।
अपराध पर अंकुश: अपराध पर लगाम लगाना और व्यवसायियों की सुरक्षा भी इस बार के प्रमुख मुद्दों में से एक है।
नेताओं का पक्ष
रमेश कुमार गुप्ता, आरजेडी जिलाध्यक्ष, मुजफ्फरपुर: “विकास का काम कहीं नहीं दिखता। रोजगार नहीं मिलने से युवाओं का पलायन जारी है। राजद और गठबंधन के बाकी सदस्य इन मुद्दों पर आवाज बुलंद करते रहेंगे।”
केदार प्रसाद गुप्ता, पंचायती राज मंत्री सह स्थानीय विधायक: “अपने तीन साल के कार्यकाल में जनता से किए वादों को पूरा करने का प्रयास किया है। बिजली, स्वास्थ्य और सड़कों की स्थिति बेहतर हुई है। विधि व्यवस्था पर सरकार गंभीर है और जल्द ही सार्थक परिणाम सामने आएंगे।”
जन सुराज की एंट्री
इस बार चुनावी मैदान में जन सुराज भी अपनी ताकत दिखाने की कोशिश कर रहा है। शहर के एक होम्योपैथिक चिकित्सक की गतिविधि हाल में बढ़ी है और प्रशांत किशोर भी यहाँ जनसंवाद कर चुके हैं। जन सुराज ने हाल ही में दलित किशोरी से दुष्कर्म की घटना के खिलाफ आंदोलनों में सक्रियता दिखाकर अपनी मौजूदगी दर्ज कराई है। यह देखना दिलचस्प होगा कि जन सुराज का यह प्रयास कुढ़नी के चुनावी समीकरणों पर क्या असर डालता है।
कुढ़नी विधानसभा: राजनीतिक इतिहास और सामाजिक समीकरण
पिछले कुछ सालों में इस सीट पर बीजेपी और जेडीयू के बीच मुकाबला देखने को मिला है। हाल ही में हुए उपचुनाव में बीजेपी के केदार प्रसाद गुप्ता की जीत ने इस सीट पर भगवा झंडा गाड़ दिया। अब जब जेडीयू और बीजेपी फिर से साथ हैं, तो इस गठबंधन के लिए अपने सहयोगियों को साधना और एक मजबूत उम्मीदवार तय करना एक बड़ी चुनौती होगी।
चुनावी मुद्दे और क्षेत्र की समस्याएं
खबर में कुढ़नी क्षेत्र की कई महत्वपूर्ण समस्याओं का जिक्र है, जो यहां के चुनावों में मुख्य मुद्दे बनते हैं।
अधूरे विकास कार्य: मनियारी को प्रखंड बनाने की दशकों पुरानी मांग, सड़कों का चौड़ीकरण, और सिंचाई के लिए नहरों की मरम्मत जैसे वादे अभी भी पूरे नहीं हुए हैं।
आर्थिक मुद्दे: कुढ़नी एक कृषि प्रधान क्षेत्र है जहाँ आम, लीची, गेहूं और धान की खेती होती है। यहाँ कृषि आधारित उद्योगों की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन रोजगार की कमी के कारण युवाओं का पलायन एक बड़ी समस्या है।
कानून व्यवस्था: व्यवसायियों की सुरक्षा और अपराध पर अंकुश भी यहाँ के लोगों के लिए महत्वपूर्ण मुद्दे हैं।
नए राजनीतिक समीकरण और चुनौती
इस बार के चुनाव में प्रशांत किशोर का जन सुराज भी एक नया समीकरण बनाने की कोशिश कर रहा है। जन सुराज की सक्रियता ने इस सीट पर एक नया आयाम जोड़ दिया है, जो पारंपरिक राजनीतिक दलों के लिए एक नई चुनौती पेश कर सकता है।



