गया: पंचायत पुस्तकालय ग्रामीण भारत में शिक्षा तक पहुँच बढ़ाने के लिए स्थापित किए गए हैं, विशेष रूप से बिहार जैसे राज्यों में जहां साक्षरता दर कम है। लेकिन सरकार के इरादे को गया में पंचायत प्रतिनिधियों और अफसरों-कर्मियों ने अपनी खुदगर्जी और बेरुखी योजना में पलीता लगा दिया है। यही वजह है कि समूचे जिले की 324 पंचायतों में किताब खरीद के नाम पर 6 करोड़ रुपये से ज्यादा की रकम फूंक दिए जाने के बाद में एक भी पंचायत में ढंग की लाइब्रेरी नहीं खुल सकी है। पिछले साल के अंत में ही बिहार की सभी 8053 पंचायतों में किताबों की खरीद कर लाइब्रेरी बनाने का निर्णय लिया गया था। सरकार की योजना थी कि जहां पंचायत भवन हैं, वहां इमारत के एक कमरे में लाइब्रेरी चलेगी, जहां भवन नहीं है, वहां सामुदायिक भवनों में पुस्तकालय बनेंगे।
ऐसे में पंचायतों और गांवों में रहने वाले पुस्तक प्रेमी अब तक सरकार की इस योजना के जमीन पर उतरने का इंतजार कर रहे हैं। जिले की अधिकांश पंचायतों में या तो किताबें पहुंची ही नहीं हैं, या पहुंची हैं तो वह पंचायत भवन या सामुदायिक भवन के एक कोने में पड़ी हैं। किताबों के बोरे तक नहीं खोले गए हैं।
किताबों में नहीं है किसी की दिलचस्पी
ऐसा लगता है कि लाइब्रेरी स्थापित करने में पंचायत प्रतिनिधियों की दिलचस्पी नहीं है। नगरानी की कमी और संसाधनों का अभाव भी इसमें बड़ी बाधा के रूप में सामने आई है। सूत्रों का कहना है अधिकारियों का सारा ध्यान सिर्फ किताब की खरीद पर था, ताकि कमीशन खाया जा सके। उसके इस्तेमाल पर अधकारियों से लेकर पंचायत प्रतिनिधि तक उदासीन हैं। यही वजह है कि ज्ञान बढ़ाने वाली किताबें लम्बे अर्से के बाद भी बोरे के बाहर नहीं निकल सकीं। यह हालत तब है जब पंचायती राज विभाग का सारा तंत्र जिला मुख्यालय से लेकर पंचायतों तक सक्रिय है। साधनों के दुरूपयोग का इससे बेहतर मिसाल और क्या हो सकता है।
सुदूरवर्ती पंचायतों में नहीं पहुंची किताबें
गया जिले के शेरघाटी प्रखंड की चांपी ग्राम पंचायत के मुखिया पप्पू पासवान की मानें तो किताबों की खरीद के लिए करीब छह महीने पूर्व ही लगभग दो लाख रुपये का भुगतान सरकार द्वारा पुस्तक विक्रेता को कर दिया गया।
शेरघाटी प्रखंड की श्रीरामपुर पंचायत के मुखिया संजय सिंह ने जब पांच महीने तक पुस्तकें नहीं पहुंचाये जाने पर हल्ला मचाया तो जल्दीबाजी में शुक्रवार को पुस्तकों की खेप पंचायत भवन पहुंची।
किताबें तो पहुंच गईं, मगर उसका इस्तेमाल नहीं
गया जिले के दूसरे प्रखंडों का यही हाल है। डुमरिया प्रखंड की भोकहा पंचायत की मुखिया सरिता देवी के अनुसार 15 दिनों पूर्व किताबों की खेप तो पहुंची है, मगर इसे रखें कहां। पंचायत भवन में कोई आलमारी नहीं है। बैठने-पढ़ने के लिए कुर्सी मेज भी नहीं है किताबों को बोरे में ज्यों के त्यों रखे हैं। यह कहानी महुएत, भोकहा, नारायणपुर, चिलिम और चांपी पंचायत भर की नहीं है। जिले की तमाम 324 पंचायतों में किताबों और पुस्तकालयों का भी यही हाल है।
किताबें खरीदने का मकसद
गया जिले में सक्रिय जनसुराज की महिला नेता प्रियंका यादव और जुगनू सुल्ताना ने बताया पंचायतों में किताबों की खरीदने की योजना बिहार के एक वरिष्ठ आइएएस अफसर के पिता की लिखी हिन्दी-अंग्रेजी किताबों को उंचे दामों पर खरीदने के लिए बनाई गई थी। यही वजह है कि कुछ पंचायतों में पहुंची किताबों में आइएएस के पिता और अल्पज्ञात लेखक की आठ-नौ किताबें शामिल हैं। पिछले साल दिसम्बर में जब यह मामला गरमा था। तब सरकार ने आइएएस अफसर के पिता की किताबों को शामिल किए जाने के मामले की जांच कराने का आश्चासन दिया था लेकिन हुआ कुछ नहीं।
पड़ताल में हुआ खुलासा
रामपुर पंचायत के मुखिया संजय सिंह कहते हैं कि एक तो किताबों की खरीद उंची कीमत पर की गई है। दूसरे मुखिया या ग्राम पंचायत को यह अधिकार भी नहीं था कि वह किस लेखक की कौन सी किताबें कहां से खरीदें। सबकुछ ऊपर तय किया जाता है। मुखिया पर दबाव डालकर दो-दो लाख रुपये का भुगतान कराया गया। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं होगी कि अफसरों के ऐसे हथकंडों से ग्राम स्वराज के गांधी जी के सपने भी चकनाचूर हुए हैं।
मुखिया संघ के अध्यक्ष का आरोप
गया जिला मुखिया संघ के अध्यक्ष राजीव रंजन उर्फ डब्लु यादव ने बताया पंचायतों में किताबों की खरीद का मकसद सरकार या अफसरों का यह नहीं था कि इससे ग्रामीण पढ़ कर शिक्षित हो। यदि ऐसा होता तो पंचायतों को यह अधिकार भी दिया जाता कि वह पंचायतवासियों और प्रबुद्ध जनों की सलाह से ऐसी किताबें खरीदें, जिससे समाज और पाठकों को लाभ हो सके।
क्या कहते हैं पंचायती राज पदाधिकारी
गया के जिला पंचायती राज पदाधिकारी के.के.यादव का कहना है जिले की पंचायतों में पुस्तकालय बेहतर ढंग से संचालित हो, इसके लिए किताबें खरीदी गई हैं। जिले के सभी बीपीआरओ को पहले भी पुस्तकालय संचालन के लिए निर्देश दिए गए हैं। अब यह बातें संज्ञान में आई हैं तो पंचायतों में पुस्तकालय के बेहतर संचालन के लिए जो कुछ जरूरी होगा, किया जाएगा।



