नई दिल्ली: भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) गुवाहाटी (IIT-Guwahati) के शोधकर्ताओं ने एक क्रांतिकारी पर्यावरण-अनुकूल सामग्री विकसित की है, जो पारंपरिक प्लास्टिक का स्थान ले सकती है। यह नया कंपोजिट पूर्वोत्तर भारत में प्रचुर मात्रा में उगने वाली बांस की प्रजाति बंबूसा टुल्डा और बायोडिग्रेडेबल पॉलिमर के मिश्रण से तैयार किया गया है।
यह बांस तेजी से बढ़ने वाला, हल्का, मजबूत और उच्च तापमान को सहन करने में सक्षम है। साथ ही, यह कम नमी अवशोषित करता है और लागत में भी किफायती है। इसकी ये खूबियां इसे कार के डैशबोर्ड, दरवाजों के पैनल और सीटों के पीछे के हिस्सों में प्लास्टिक और धातु के लिए एक आदर्श विकल्प बनाती हैं।
प्लास्टिक कचरे का समाधान और ऑटोमोबाइल उद्योग में योगदान
शोधकर्ताओं का कहना है कि यह सामग्री न केवल प्लास्टिक कचरे की वैश्विक समस्या को कम कर सकती है, बल्कि ऑटोमोबाइल उद्योग में पर्यावरण-अनुकूल सामग्रियों की बढ़ती मांग को भी पूरा करती है। इस शोध का नेतृत्व आईआईटी गुवाहाटी के मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग की प्रोफेसर डॉ. पूनम कुमारी ने किया, जिसमें शोधकर्ता अबीर साहा और निखिल दिलीप कुलकर्णी ने भी योगदान दिया। इस अध्ययन के परिणाम प्रतिष्ठित अंतरराष्ट्रीय पत्रिका एनवायरमेंट, डेवलपमेंट एंड सस्टेनेबिलिटी (स्प्रिंगर नेचर) में प्रकाशित हुए हैं।
बांस कंपोजिट का निर्माण और परीक्षण
शोध के दौरान, वैज्ञानिकों ने बंबूसा टुल्डा के रेशों का उपयोग कर चार अलग-अलग कंपोजिट तैयार किए, जिन्हें जैव-आधारित और पेट्रोलियम-आधारित एपॉक्सी रेजिन के साथ जोड़ा गया। बांस के रेशों को विशेष उपचार के माध्यम से और अधिक मजबूत बनाया गया। इन कंपोजिट्स का 17 अलग-अलग मापदंडों जैसे मजबूती, गर्मी प्रतिरोध, टिकाऊपन, नमी अवशोषण और लागत के आधार पर गहन परीक्षण किया गया।
इस सामग्री की खासियत
परीक्षणों में प्रत्येक कंपोजिट के अपने फायदे और कमियां सामने आईं, लेकिन कोई भी सभी आवश्यक गुणों में पूर्ण रूप से संतुलित नहीं था। सर्वश्रेष्ठ विकल्प चुनने के लिए शोधकर्ताओं ने एक विशेष मूल्यांकन तकनीक का उपयोग किया। परिणामस्वरूप, जैव-आधारित एपॉक्सी ‘फॉर्मुलाइट’ से बना बांस कंपोजिट सबसे उत्कृष्ट साबित हुआ। यह कंपोजिट कम नमी अवशोषित करता है, उच्च तापमान सहन करता है और अत्यधिक मजबूत है। इसकी कीमत लगभग 4,300 रुपये प्रति किलोग्राम है, जो इसे कार के डैशबोर्ड, दरवाजे के पैनल और सीटों के पीछे के हिस्सों जैसे ऑटोमोबाइल घटकों के लिए किफायती और पर्यावरण-अनुकूल बनाता है।
पारंपरिक सामग्रियों का विकल्प
डॉ. पूनम कुमारी ने बताया, “यह नया बांस कंपोजिट ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक्स, एयरोस्पेस और निर्माण जैसे क्षेत्रों में उपयोगी हो सकता है। यह लकड़ी, धातु और प्लास्टिक जैसी पारंपरिक सामग्रियों का स्थान ले सकता है, और इसकी लागत भी इनके समकक्ष है।” उन्होंने यह भी कहा कि यह सामग्री सतत विकास लक्ष्यों (एसडीजी 7, 8 और 9) को प्राप्त करने में योगदान देगी, साथ ही यह मेक इन इंडिया और हरित प्रौद्योगिकी पहल के अनुरूप है।
वर्तमान में, शोधकर्ता इस कंपोजिट के पूरे जीवन चक्र का विश्लेषण कर रहे हैं ताकि इसके उत्पादन से लेकर निपटान तक पर्यावरण पर प्रभाव का आकलन किया जा सके। भविष्य में, वे कम्प्रेशन मोल्डिंग और रेजिन ट्रांसफर जैसी औद्योगिक तकनीकों के माध्यम से बड़े पैमाने पर उत्पादन की योजना बना रहे हैं।



