नई दिल्ली: बिहार विधानसभा का चुनावी बिगुल बज चुका है। छठ की तैयारियों के बीच सभी पार्टियां प्रचार-प्रसार करने में भी जुटी है। सीटों का बंटवारा हो चुका है। NDA में बीजेपी और जदयू इस बार बराबर सीटों 101-101 पर लड़ रहे हैं। टिकट बंटवारें के दौरान NDA ने सवर्णों पर ज्यादा भरोसा जताया। बिहार जातीय जनगणना के अनुसार सूबे में सवर्णों की कुल आबादी 15.52 फीसदी है। हालांकि प्रत्याशियों के चयन का मापदंड देखें तो ज्यादातर सवर्णों में बांटे गए हैं, खासकर भाजपा की तरफ से। इसके पीछे क्या वजह हो सकती है, आइये समझते हैं-
NDA का सवर्णों पर भरोसा
NDA के सीट बंटवारें में सबसे अधिक 35% कैंडिडेट सवर्ण हैं, 31 फीसदी पिछड़े वर्ग से हैं। विपक्षी पार्टियां इसे लेकर आरोप लगा रही कि बीजेपी ने दलितों व वंचितों के साथ हकमारी की हैं। दरअसल NDA ने अपने कोर वोट बैंक को देखकर फॉरवर्ड कार्ड खेला है। सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसाइटीज यानी CSDS ने 2020 बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर डेटा शेयर किया था।
क्या कहता है डेटा
इस डेटा के मुताबिक 52 फीसदी ब्राह्मणों ने एनडीए को वोट दिया। महागठबंधन को 15 फीसदी ब्राह्मणों ने वोट किया। चिराग सभी सीटों पर अकेले लड़ रहे थे तो उन्हें भी 7 प्रतिशत वोट मिला। चिराग को अगर जोड़ दें तो यह आंकड़ा 59 प्रतिशत हो जाता है। 51 प्रतिशत भूमिहारों ने NDA को वोट दिया। चिराग को 3 प्रतिशत मिला और महागठबंधन को 19 फीसदी। राजपूत वर्ग से 55 फीसदी वोट NDA को मिला, चिराग को 4% तो वहीं महागठबंधन को 9 फीसदी राजपूतों ने वोट दिया। कायस्थ समाज से 59 फीसदी वोट एनडीए के पक्ष में गया और 19 प्रतिशत महागठबंधन को।
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नाराज थे अपर कास्ट
राजनीतिक विश्लेषकों की माने तो फॉरवर्ड कास्ट के सहारे नीतीश और बीजेपी बिहार में सत्ता में हैं। कुछ सालों से वो उपेक्षित महसूस कर रहे थे। इसे लेकर खुल कर नाराजगी भी जताई जा रही थी। तेजस्वी यादव बार-बार भूमिहार समाज को साधने में लगे थे। जन सुराज के आने के बाद एनडीए के अंदर अपर कास्ट के बंटने का डर और बढ़ गया। यहीं वजह है कि पार्टी ने खुलकर इस बार फॉरवर्ड को टिकट दिए हैं।



