हिमालयी आपदाएं: प्रकृति का संदेश या मानव जनित त्रासदी!

पर्यावरणविद डा. संजय सिंह का मानना है कि हजारों सालों से हिमालय की नदियाँ और पहाड़ संतुलन में थे, लेकिन अब अचानक आपदाएं बढ़ने का कारण यही असंतुलन है। वनों की कटाई से जल चक्र बिगड़ा है, ग्लेशियरों का सिकुड़ना तेज हुआ है और मिट्टी की पकड़ कमजोर हो गई है।

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नई दिल्ली: उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और जम्मू-कश्मीर में हाल ही में आई आपदाओं ने हिमालय की संवेदनशीलता और उसकी नदियों के अस्तित्व पर गहरा संकट खड़ा कर दिया है। मध्य हिमालय से बहने वाली गंगा, यमुना और उनकी सहायक नदियाँ इस विनाशकारी प्राकृतिक घटनाओं की गवाह बन रही हैं। बाढ़, भूस्खलन और बादल फटने की घटनाओं ने न केवल जीवन और संपत्ति को भारी नुकसान पहुँचाया है, बल्कि हिमालय की सेहत और उससे जुड़े मैदानी क्षेत्रों के लिए भी गंभीर खतरे की घंटी बजा दी है।

केदारनाथ की त्रासदी को देश ने पहली बार देखा था

2010 से लेकर 2025 तक हिमालयी राज्यों में एक के बाद एक आपदाएँ आती रही हैं। केदारनाथ की त्रासदी (2013) के रूप में देश ने पहली बार उस तबाही को इतने व्यापक पैमाने पर देखा, जहाँ हजारों लोग चंद घंटों में लापता हो गए और पूरी घाटी वीरान हो गई। इसके बाद ऋषिगंगा (2021), जोशीमठ (2023), बालगंगा (2024) और अब 2025 में उत्तरकाशी, कुल्लू, किश्तवाड़ और कठुआ में बादल फटने की घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि हिमालय अब लगातार चेतावनी दे रहा है।

हिमालय लगातार चेतावनी दे रहा है

हिमालय की यह चेतावनी केवल पहाड़ों तक सीमित नहीं है। यह पूरे भारतवर्ष के लिए है, जहाँ इन नदियों का पानी जीवन का आधार है। इस वर्ष की ही बात करें, तो जम्मू-कश्मीर के किश्तवाड़ जिले के चोसिट्टी गाँव में बादल फटने से 67 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई, 300 से ज्यादा लोग घायल हुए और 200 से अधिक लोग लापता हो गए। उत्तराखंड के उत्तरकाशी जिले के धाराली गाँव में खीरगंगा के ऊपरी हिस्से में बादल फटने से कई घर बह गए। हिमाचल प्रदेश के कुल्लू ज़िले की सैंज वैली में सड़कें और पुल टूट गए, जिससे गाँवों का संपर्क पूरी तरह कट गया। जम्मू-कश्मीर के कठुआ जिले में भी बादल फटने की घटनाओं ने तबाही मचाई। एक ही वर्ष में इतनी आपदाएँ होना अपने आप में भयावह संकेत है।

इन आपदाओं ने केवल भौतिक नुकसान नहीं पहुँचाया, बल्कि लोगों के मनोबल, उनकी सांस्कृतिक विरासत, धार्मिक यात्राओं और पारंपरिक जीवनशैली को भी गहरा झटका दिया है। जो हिमालय कभी आध्यात्मिकता, शांति और जैव विविधता का प्रतीक माना जाता था, आज वही क्षेत्र आपदा-प्रवण इलाका बनता जा रहा है।

वैज्ञानिक दृष्टि से देखें तो हिमालय विश्व का सबसे युवा पर्वत शृंखला है, जो अब भी भूगर्भीय दृष्टि से सक्रिय है। इंडो-यूरेशियन टेक्टॉनिक प्लेटों के टकराव से बना यह क्षेत्र लगातार खिसकता और बदलता रहता है। इसी वजह से यहाँ भूकंप और भूस्खलन का जोखिम हमेशा बना रहता है। जब इस अस्थिर भूगर्भीय क्षेत्र पर मानवजनित दबाव बढ़ता है, जैसे सुरंगों के लिए विस्फोट, भारी निर्माण कार्य, और अनियंत्रित शहरीकरण तो यह जोखिम कई गुना बढ़ जाता है।

जलवायु परिवर्तन ने आपदाओं की तीव्रता में बढ़ोतरी की

जलवायु परिवर्तन ने भी हिमालयी आपदाओं की तीव्रता में बढ़ोतरी की है। पिछले दो दशकों में मानसून का स्वरूप बदल गया है। पहले जहाँ वर्षा धीरे-धीरे और लंबे समय तक होती थी, वहीं अब कम समय में अत्यधिक वर्षा होती है। वैज्ञानिक इसे “एक्सट्रीम वेदर इवेंट्स” कहते हैं। यही स्थिति बादल फटने की घटनाओं को बढ़ा रही है। जब वायुमंडल का तापमान बढ़ता है, तो उसमें अधिक नमी समा जाती है। पहाड़ी इलाकों में जब यह नमी अचानक ठंडी हवाओं से टकराती है, तो भारी वर्षा एक छोटे से इलाके में केंद्रित हो जाती है। यही बादल फटना कहलाता है।

हजारों सालों से हिमालय की नदियाँ और पहाड़ संतुलन में थे, लेकिन अब अचानक आपदाएँ बढ़ने का कारण यही असंतुलन है। वनों की कटाई से जल चक्र बिगड़ा है, ग्लेशियरों का सिकुड़ना तेज हुआ है और मिट्टी की पकड़ कमजोर हो गई है। इसके कारण बारिश का पानी जमीन में समाने के बजाय सीधे बहकर नदियों में चला जाता है और तबाही मचाता है।

पहाड़ों पर विकास वैज्ञानिक आकलन के बाद हो

ऐसे में सबसे बड़ी आवश्यकता है कि विकास का रास्ता बदला जाए। सड़क निर्माण, जलविद्युत परियोजनाएँ और पर्यटन विस्तार तभी हों जब उनकी पर्यावरणीय वहन क्षमता का वैज्ञानिक आकलन हो चुका हो। वनों का संरक्षण और पुनर्वनीकरण केवल औपचारिक योजना न बने, बल्कि जमीनी स्तर पर लागू किया जाए। स्थानीय समुदायों को आपदा प्रबंधन और संसाधन संरक्षण में भागीदार बनाना भी अनिवार्य है, क्योंकि पहाड़ों में रहने वाले लोग प्रकृति को सबसे अच्छी तरह समझते हैं। हाल ही में देहरादून में जल बिरादरी एवं जल-जन जोड़ो अभियान के द्वारा आयोजित विचार-विमर्श में हिमालयी आपदाएँ, गंगा और यमुना का भविष्य तथा विकास बनाम विनाश जैसे मुद्दों पर गहन चर्चा हुई। इस बैठक में पर्यावरणविदों ने यह स्पष्ट निष्कर्ष निकाला कि हिमालय में किसी भी प्रकार का विकास केवल पर्यावरणीय परिस्थितियों और भूगर्भीय संवेदनशीलता को ध्यान में रखकर ही किया जाना चाहिए। इस विमर्श से यह अनुशंसा उभरी कि आने वाले समय में हिमालय में प्रकृति-सम्मत और संतुलित विकास ही एकमात्र विकल्प है, अन्यथा विनाशकारी आपदाएँ और बढ़ेंगी।

जलवायु परिवर्तन की वैश्विक चुनौती से निपटने के लिए हमें अपनी जीवनशैली और ऊर्जा खपत में भी बदलाव करना होगा। हिमालय के लिए संतुलित और नियंत्रित पर्यटन नीति आवश्यक है, ताकि धार्मिक यात्राएँ और ट्रेकिंग मार्ग पर्यावरण पर बोझ न बनें।

हिमालय अब हमसे केवल पहाड़ों की सुरक्षा नहीं मांग रहा, बल्कि हमारी सोच, जीवनशैली और विकास के मॉडल पर पुनर्विचार करने के लिए कह रहा है। यदि हमने उसकी चेतावनी को समय रहते सुन लिया, तो संतुलित विकास के सहारे हिमालय पुनः उसी रूप में खड़ा रहेगा जैसा सदियों से रहा है-आध्यात्मिकता, शांति और जीवन का प्रतीक। लेकिन यदि हमने इसे अनसुना किया, तो अगली त्रासदी और भी भयावह हो सकती है।

लेखक डा. संजय सिंह, जन-जन जोड़ो अभियान के संयोजक हैं और पिछले तीन दशकों से प्रकृति संरक्षण एवं जन-आंदोलन के माध्यम से पर्यावरणीय संतुलन की दिशा में सतत प्रयासरत हैं।

Sanjay Rai

sanjayrai.dj@gmail.com

संजय राय ने बीते 25 साल के प्रोफेशनल कैरियर में स्वास्थ्य, अपराध, शिक्षा, विकास समेत सभी बीट की कवरेज की है। दिल्ली सरकार, विधानसभा की कार्यवाही, भाजपा, कांग्रेस, आप सरीखे राजनीतिक दलों के साथ सामाजिक-सांस्कृतिक व आंदोलनात्मक गतिविधियों को भी कवर किया है। कई सत्रों में संसद की कार्यवाही पर भी कलम चलाई है। फिलवक्त NewG India में बतौर सीनियर स्पेशल काॅरेस्पोंडेंट अपनी जिम्मेदारी निभा रहे हैं।

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