जंगलराज किसका भारी, बिहार के सियासी गलियारे में बना बड़ा सवाल

बिहार में बीते दिनों हुई आपराधिक वारदातों से जंगलराज सियासी गलियारे में बड़ा सवाल बन गया है। चुनावी साल में लालू राज के जंगलराज पर आरजेडी को घेर रही एनडीए फिलवक्त बैकफुट पर है। फिर भी सत्ता पक्ष लालू राज की बार-बार याद दिला रहा है। जबकि बीते दस दिनों की 30 हत्याओं को विपक्ष सुशासन वाले बिहार में अपराध का शासन करार दे रहा है। इस मामले में राहुल प्रताप सिंह ने सेवानिवृत्त आईपीएस अधिकारी अमिताभ कुमार दास से भी बात की है।

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पटना: गोपाल खेमका, अजीत कुमार, रमाकांत यादव, विक्रम झा, जितेंद्र कुमार महतो, सुशीला देवी और सुरेंद्र केवट, इनमें से ज्यादातर नाम शायद आपने न सुने हों, लेकिन बिहार में ये नाम राजनीतिक विवाद का केंद्र बन गए हैं। यह लोग इसलिए भी अहम हो गए है कि साल के आखिर में होने वाले विधानसभा चुनाव से पहले।
दरअसल, यह ऐसे लोग हैं, जिनकी बीते दस दिनों की आपराधिक वारदातों ने जान चली गई है। इनमें हर तबके के लोग शामिल हैं। व्यापारियों, राजनेताओं, वकीलों, शिक्षकों और आम नागरिकों को निशाना बनाकर एक के बाद एक अंजाम दी जा रहीं हत्या की घटनाओं ने बिहार की कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं। विपक्ष नीतीश कुमार के शासन में बिगड़ती कानून-व्यवस्था के जरिए लालू यादव के राज को जंगलराज कहे जाने का बचाव कर रहा है। वहीं, पुलिस ने इन घटनाओं के लिए अवैध हथियारों और गोला बारूद की व्यापक उपलब्धता को जिम्मेदार ठहराया है।

हर महीने होती औसतन 229 हत्याएं
राज्य अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एससीआरबी) के नवीनतम आंकड़ों के अनुसार, राज्य में जनवरी से जून के बीच हर महीने औसतन 229 हत्याओं के साथ 1,376 हत्या के मामले दर्ज किए गए। जबकि वर्ष 2024 में यह संख्या 2,786 और वर्ष 2023 में 2,863 थी। वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों के अनुसार, अवैध रूप से निर्मित या बिना वैध लाइसेंस के खरीदे गए हथियारों के प्रसार और कारतूसों व गोला-बारूद की अनियंत्रित उपलब्धता ने हाल में हिंसक अपराधों में तेजी ला दी है।
राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (एनसीआरबी) के आंकड़ों के अनुसार, बिहार लगातार हिंसक अपराधों, जिनमें आग्नेयास्त्रों से जुड़े अपराध भी शामिल हैं, के मामले में शीर्ष पांच राज्यों में शामिल रहा है। एनसीआरबी के आंकड़ों के अनुसार, बिहार वर्ष 2017, 2018, 2020 और 2022 में हिंसक अपराध दर में दूसरे स्थान पर रहा है।
पुलिस महानिदेशक विनय कुमार ने मीडिया से बातचीत में कहा, ज्यादातर हत्याओं के पीछे जमीन विवाद और संपत्ति के मामले मुख्य कारण हैं। ऐसे मामलों में पुलिस की भूमिका सीमित होती है और यह अपराध होने के बाद शुरू होती है। अपराध का पता लगाने में हमारे बल ने 100 प्रतिशत की दर हासिल कर ली है। हालांकि, डीजीपी ने दावा किया कि पिछले साल की तुलना में संगठित अपराध में कमी आई है।

आम से खास तक निशाने पर
इन सब के बीच विपक्ष का आरोप है कि बिहार में अपराधी आम लोगों के साथ खास लोगों को भी जान से मारने की धमकी दे रहा है। 8 जुलाई को राज्यसभा सांसद उपेंद्र कुशवाहा और 11 जुलाई को केंद्रीय मंत्री लोजपा ( राम विलास ) के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान को जान से मारने की धमकी दी थी। हालांकि, इस मामले में बिहार पुलिस ने त्वरित कार्रवाई करते हुए आरोपी युवक को बेगूसराय से गिरफ्तार किया था।

बिहार में हुई हत्याएं
बिहार पिछले 10 दिनों में 30 से ज्यादा हत्याएं हुई है। बिहार कि राजधानी पटना में गांधी मैदान थाने से महज 500 मिटर कि दुरी पर 4 जुलाई कों उद्योगपति गोपाल खेमका कि हत्या हुई थी। इसके बाद बिहार में कई घटनाएं घटी हाल में 10 जुलाई कों पटना के रानी तालाब इलाके में बालू कारोबारी कि हत्या कर दी गई थी। 11 जुलाई की रात में पटना के रामकृष्णा नगर थाने के अंतर्गत एक मार्ट व्यवसायी कि हत्या कर दी गयी। इसके साथ ही बिहार अलग-अलग जिलों में कई घटनाएं घटीं, जो पुलिस की कार्यशैली पर सवाल खड़ा करती है।

चिराग ने कानून व्यवस्था पर सवाल खड़ा किया
विपक्ष के साथ एनडीए सरकार में केंद्रीय मंत्री चिराग पासवान ने भी बिहार की आपराधिक घटनाओं पर सवाल उठाया है। उन्होंने एक्स पर लिखा कि बिहारी अब और कितनी हत्याओं की भेंट चढ़ेगा।

विपक्ष का सीएम नीतीश पर हमला
तेजस्वी यादव ने सोशल मीडिया एक्स पर कहा कि अचेत मुख्यमंत्री क्यों है मौन? प्रतिदिन हो रही हत्याओं का दोषी कौन? भ्रष्ट भूंजा पार्टी जवाब दें। वहीं, बिहार कांग्रेस के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष अखिलेश सिंह ने बिहार को क्राइम कैपिटल कहते हुए विपक्ष को घेरा है। उन्होंने कहा कि बिहार को क्राइम कैपिटल ऑफ इंडिया बना दिया है। इस पर स्पष्टीकरण देते हुए अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (मुख्यालय) कुंदन कृष्णन ने कहा, इतनी बड़ी आबादी वाला राज्य, जिसकी 60 प्रतिशत से ज्यादा जनसंख्या 30 साल से कम उम्र की और बेरोजगार है, कानून-व्यवस्था की समस्याओं से ग्रस्त होना स्वाभाविक है।

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Q. सुरक्षा का मतलब क्या है?
A. सुरक्षा का मतलब तो आम आदमी की सुरक्षा ही है। जब सुरक्षा की बात होती है तो आम आदमी की ही सुरक्षा की होती है। यह बात दुनिया भर में लागू होती है। इसी में वीआईपी भी शामिल होते हैं।
Q. क्राइम शून्य बिहार हो पाना संभव है?
A. देखिए, शून्य जैसी कोई चीज नहीं है। पूरी दुनिया के लिए यह बात सही है। किसी भी कोने में बैठा कोई समाज पूरी तरह अपराध शून्य नहीं हो सकता। हां, अपराध नियंत्रित हो सकता है, यदि सरकार के पास इच्छा शक्ति हो। अभी बिहार के संदर्भ में बात करें तो यहां सरकार में यह खत्म हो गई है।
Q. बिहार में अपराध क्यों बढ़ रहा है?
A. जाहिरा तौर पर प्रदेश सरकार की नाकामी से। अपराध को रोकने की जिम्मेदारी उसकी ही है। सरकार कहती क्राइम पर हमारा जीरो टॉलरेंस है। पर कई ऐसी घटनाएं हैं, जो सरकार के जीरो टॉलरेंस के नीति पर सवाल खड़ा करती है। बिहार में राजनीतिक संरक्षित अपराध भी हो रहे हैं।
Q. इसके लिए पुलिस का मौजूदा सिस्टम कितना जवाबदेह है?
A. पुलिस की तो जवाबदेही होती ही है, लेकिन पुलिस पर राजनैतिक दबाव है। इसलिए कोई ठीक से काम नहीं कर पाता है और भ्रष्टाचार भी बहुत ज्यादा है। शराबबंदी के बाद शराब माफिया पावरफुल हो रहा है। भ्रष्ट पुलिस वाले हैं, वे शराब और बालू माफिया की सेवा में ही लिप्त है। आम आदमी से भी अवैध वसूली करते रहते हैं। आईपीएस से लेकर हवलदार तक दबाव में काम कर रहे है।
Q. इसके पीछे पुलिस की लपरवाही है या सिस्टेमेटिक प्रॉब्लम?
A. दोनों बातें हैं। विभाग में भ्रष्टाचार बहुत है। ज्यादातर थाना प्रभारी और एसपी लूट खसोट में लिप्त हैं। यह तो एक तरह से उनका प्रॉब्लम है। सिस्टेमेटिक प्रॉब्लम यह है कि पुलिस पर बहुत ज्यादा राजनैतिक दबाव है अपराधियों को नेताओं का संरक्षण प्राप्त रहता है। बिहार क्योंकि देश का गरीब राज्य है तो पुलिस के पास पर्याप्त संसाधन भी नहीं है। ज्यादातर थानों में जो गाड़ियां हैं भी, वो भी खटारा है। अधिकांश थानों के भवन जर्जर हैं। अपराधियों के पास पुलिस से बेहतर हथियार हैं।
Q. पुलिस व्यवस्थाा में बदलाव की जरूरत है क्या?
A. पुलिस व्यवस्था में सबसे जरूरी है कि राजनैतिक दखलअंदाजी बंद हो। पुलिस को स्वायत्तता मिलनी चाहिए। एसपी का कार्यकाल निर्धारित होना चाहिए। एसपी का कार्यकाल कम से कम तीन सालों का होना चाहिए। पुलिस को संसाधन भी दिलाना जरूरी है। और भ्रष्टाचार पर अंकुश तो आवश्यक है ही ।

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