नई दिल्ली। बिहार विधानसभा चुनाव को ले कर बस विपक्षी महागठबंधन और सत्तारूढ़ राजग के बीच सियासी वार-पलटवार की चर्चा हो रही है। विपक्षी महागठबंधन की सियासत का पहिया मतदाता सूची विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) के इर्द गिर्द घूम रहा है, जबकि सत्तारूढ़ राजग को अचानक मां के अपमान का नया मुद्दा हाथ लगा है। चुनावी परिणाम को ले कर सियासी पंडितों का गणित भी इन्हीं दो प्रमुख महागठबंधनों के इर्दगिर्द घूम रहा है। क्या वाकई बिहार में सबकुछ ऐसा ही है?
अगर आप भी ऐसा सोचते हैं कि तो आपको पिछली बार की तरह राज्य का चुनाव परिणाम फिर से चौंका सकता है। बीते चुनाव में विपक्षी महागठबंधन सीमांचल में एआईएमआईएम के प्रदर्शन के कारण जीत के मुहाने पर ठिठक गया था। अचानक अपने दम पर चुनावी ताल ठोक कर मोदी के हनुमान चिराग पासवान ने जदयू को सीटों की संख्या के सवाल पर तीसरे नंबर पर धकेल दिया था। फिर दोनों मुख्य महागठबंधनों में सीट बंटवारे का सवाल अब भी यक्ष प्रश्न बना हुआ है। इस लिहाज से देखें तो आप कह सकते हैं कि बिहार में पिक्चर अभी बाकी है।
ऐसा इसलिए कि इस बार बिहार के सियासी मैदान में कुछ और नए खिलाडिय़ों ने एंट्री मारी है। बीते चुनाव में सीमांचल की 24 में से 5 सीटें जीतने वाली असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी एआईएमआईएम ने अपना दायरा सीमांचल के इतर कोसी और मिथिलांचल तक फैला लिया है। जनसुराज पार्टी के सहारे चुनावी रणनीतिकार से राजनीतिज्ञ बने प्रशांत किशोर ने अपने मुद्दों से बिहार की गाद से भरी राजनीति में उथलपुथल मचा दी है। इसके अलावा पार्टी से निष्कासित तेजप्रताप यादव टीम तेजप्रताप का गठन कर अपनी पुरानी पार्टी राजद और अपने ही परिवार के पर लगातार निशाना साध रहे हैं। एक अहम सवाल यह भी है कि महागठबंधन में कभी मान कभी अपमान झेल रहे जन अधिकार पार्टी के पप्पू यादव की क्या भूमिका होगी?
ओवैसी के प्रदर्शन का नफा नुकसान
ओवैसी सीधे तौर पर विपक्षी महागठबंधन के लिए एक बार फिर से दु:स्वप्न साबित हो सकते हैं। बीते चुनाव में भले ही उनकी पार्टी के जीते पांच में से चार विधायक राजद में शामिल हो गए, मगर पार्टी का प्रभाव क्षेत्र सीमांचल से बाहर कोसी और मिथिलांचल के अलावा सिवान के मुस्लिम बहुल इलाकों तक फैल गया है। खासतौर पर मुस्लिम युवाओं में पार्टी का व्यापक प्रभाव है। पार्टी की रणनीति इस बार 135 सीटों पर उन सीटों पर उम्मीदवार उतारने की है, जहां मुसलमानों का प्रभाव है। सीमांचल को छोड़ दें तो मुस्लिम आबादी दरभंगा में 22.39 प्रतिशत, मधुबनी में 18.25 प्रतिशत, सिवान में 34 प्रतिशत, सुपौल में 20 प्रतिशत, खगडिय़ा में 20 प्रतिशत है। जाहिर तौर पर इस पार्टी के उम्मीदवार को हासिल हर वोट विपक्षी महागठबंधन की संभावनाओं केलिए खतरे की घंटी की तरह होगा।
राजग के लिए दु:स्वप्न साबित हो सकते हैं प्रशांत किशोर
ओवैसी के उलट प्रशांत किशोर सत्तारूढ़ राजग के लिए परेशानी बन सकते हैं। दरअसल अपनी पदयात्रा के दौरान प्रशांत किशोर के उठाए गए शिक्षा, स्वास्थ्य, पलायन और रोजगार जैसे मुद्दों ने सभी वर्गों को प्रभावित किया है। हालांकि चुनाव नजदीक आते आते राजद का यादव-मुस्लिम समीकरण पहले से अधिक मजबूती के साथ विपक्षी महागठबंधन के पक्ष में खड़ा दिखाई दे रहा है। ऐसे में अगर प्रशांत का प्रभाव अगड़ा और अति पिछड़ा वर्ग में कायम रहा तो यह सत्तारूढ़ राजग के लिए परेशानी खड़ी करेगा। वैसे भी प्रशांत किशोर ने नीतीश सरकार के चुनिंदा मंत्रियों को भ्रष्टïाचार के मुद्दे पर घेर कर सत्तारूढ़ गठबंधन की परेशानी बढ़ाई है। हालांकि खुद प्रशांत किशोर मानते हैं कि इस चुनाव में उनकी पार्टी या तो अर्श पर होगी या फर्श पर।
महागठबंधन का जायका बिगाड़ेंगे तेजप्रताप
महिला से संबंधों वाला वीडियो और पोस्ट वायरल होने के बाद से पार्टी से निष्कासित राजद सुप्रीमो लालू प्रसाद यादव के बड़े बेटे तेजप्रताप यादव नई भूमिका में हैं। टीम तेजप्रताप का गठन करने के बाद वह लगातार अपनी ही पार्टी को कटघरे में खड़ा करते दिख रहे हैं। हालांकि तेजप्रताप अपने इस रुख से राजद के यादव-मुस्लिम समीकरण पर प्रभाव डाल पाएंगे, ऐसा नहीं दिखता, मगर चुनाव प्रचार के दौरान वह विपक्षी महागठबंधन को लगातार असहज कर सत्तारूढ़ राजग को चुनाव प्रचार में बढ़त का मौका तो दे ही सकते हैं।
सीट बंटवारे के बाद भी बदल सकते हैं समीकरण
अब सवाल दोनों मुख्य गठबंधनों का है। दोनों ही गठबंधनोंं में शामिल दल फिलहाल एक हैं, हालांकि दोनों ने ही सीटों के बंटवारे के असली मुद्दे को हल नहीं किया है। विपक्षी महागठबंधन में तो सीट बंटवारे के साथ ही मुख्यमंत्री पद के चेहरे पर भी खींचतान है। राहुल गांधी की अगुवाई में एसआईआर पर जारी सियासी संग्राम ने कांग्रेस को नई ताकत दी है। अधिक सीट हासिल करने के लिए पार्टी तेजस्वी के नाम पर हामी नहीं भर रही। विपक्षी महागठबंधन में शामिल सात दलों में सीटों का बंटवारा आसान नहीं है। कांग्रेस पहले की तरह 70 सीटें चाहती हैं। वाम दलों में शामिल तीन दल 40 सीटों पर कम पर मानने के लिए राजी नहीं है। वीआईपी ने 20 सीटों पर दावा ठोका है। राजद लोजपा को भी सम्मानजनक सीटें देनी है। ऐसे में सवाल है कि अगर कांग्रेस और वाम दल नहीं झुके तो राजद कितना त्याग कर पाएगी? याद रहे कि इसी बंटवारे पर फंसे पेच के कारण बीते चुनाव में वीआईपी ने महागठबंधन से दूरी बना ली थी।
राजग की राह भी नहीं आसान
राजग में सीट बंटवारे का जो फार्मूला तय हुआ है, उस पर लोजपा, हम और आरएलएम की सहमति नहींं है। भाजपा और जदयू 200 से 205 सीटों पर लडऩा चाहते हैं। जाहिर तौर पर इसकेबाद सहयोगियों केलिए अधिकतम 40 सीटें ही बचेंगी। लोजपा किसी भी सूरत में 20 सीटों तक खुद को सीमित किए जाने के लिए तैयार नहीं है। हम 15 तो आरएलएम ने 12 सीटों पर दावा ठोका है। ऐसे में सवाल है कि क्या सत्तारूढ़ राजग सहयोगी दलों के साथ सीट बंटवारे पर अंतिम सहमति बना पाएगी। अगर सहमति नहीं बनी तो पिछले चुनाव में जदयू के पीछे हाथ धो कर पीछे पडऩे वाले चिराग पासवान की रणनीति क्या होगी?



