नई दिल्ली: हिमाचल की रानी शिमला (Shimla) जो कभी ब्रिटिश राज की गर्मियों की राजधानी थी, आज बंदरों के साये में सिहर रही है। कल्पना कीजिए, सुबह-सुबह छत पर चाय का कप थामे पक्षियों को दाना डाल रहे एक बुजुर्ग, और अचानक एक झुंड लपकता है। अगस्त 2025 की वो सुबह रामपुर के रिटायर्ड टीचर 65 साल के देश लाल गौतम के लिए आखिरी साबित हुई। बंदरों से भागते हुए वो चौथी मंजिल से फिसल पड़े, और मौके पर दम तोड़ दिया। दो साल पहले की यादें अभी ताजा हैं, ढांडा उपनगर में 19 साल की हिमानी शर्मा छत पर कपड़े सुखा रही थीं। बंदरों का झुंड आया, डर से वो तीन मंजिल नीचे गिरीं, और जिंदगी खत्म। ये सिर्फ दो किस्से हैं, हिमाचल में पिछले पांच सालों में बंदरों के हमलों से 50 मौतें और 3,000 चोटें दर्ज हो चुकी हैं। पर्यटक तो इन बंदरों को सेल्फी का सब्जेक्ट मानते हैं, रील्स बनाते हैं, लेकिन स्थानीयों के लिए ये रोज का खौफ है।
पर्यटकों का रोमांच, लोकल्स का दर्द: अनदेखा खतरा
शिमला पहुंचते ही मॉल रोड पर बंदरों की शरारतें देखकर टूरिस्ट हंसते हैं, वीडियो बनाते हैं। लेकिन क्या उन्होंने कभी सोचा कि ये ‘क्यूट’ प्राणी क्यों इतने बेखौफ हो गए हैं? जाखू मंदिर जाते श्रद्धालु तो अक्सर बंदरों की ‘तलाशी’ का शिकार बनते हैं, बैग खंगालना, खाना छीनना, यहां तक कि काट लेना। सरेंडर करना पड़ता है, क्योंकि भागने का रास्ता नहीं। स्थानीय कहते हैं, “ये शहर का हिस्सा बन चुके हैं, लेकिन हमारी जिंदगी का दुश्मन। शिमला के सात पहाड़ियों पर बसे घर अब जेल जैसे लगते हैं – हर तरफ लोहे की जालियां, एल्यूमिनियम की ग्रिल्स। पहली नजर में लगता है, शायद चोरी से बचाव के लिए। लेकिन सच्चाई कड़वी है: ये सब बंदरों से जंग लड़ने की मजबूरी है। बिना ग्रिल वाले घर में घुसना आसान, सामान बर्बाद, और खतरा हमेशा सिर पर।
‘पिंजड़ा शहर’ का जन्म: घरों की खूबसूरती पर ग्रिल का दाग
जब आप शिमला घूमने जाते हैं, तो नोटिस करेंगे – हर गेस्टहाउस, हर अपार्टमेंट लोहे के जाल में लिपटा। ये ट्रेंड दशकों पुराना है, लेकिन ग्लोबल वार्मिंग और जंगलों की कटाई ने बंदरों को शहर की तरफ धकेल दिया। फल-फूल कम होने से भूखे झुंड इंसानी बस्तियों में उतर आते हैं। नतीजा? घर पिंजड़े में बदल गए। एक स्थानीय रिहायशी ने बताया, पहले खिड़कियां खुली रखते थे, हवा आती थी। अब ग्रिल लगाकर बंद। सौंदर्य पर बट्टा लग गया, लेकिन जान बच गई। ये बदलाव सिर्फ सौंदर्य का नहीं, बल्कि डर का प्रतीक है।
जेब पर बोझ: बंदरों ने महंगा कर दिया ‘क्वीन ऑफ हिल्स’
सोचिए, शिमला में फ्लैट किराए पर लेना हो। ग्रिल वाला घर? किराया 20-30% ज्यादा। क्योंकि मकानमालिक जानते हैं, बंदरों से बचाव का खर्चा। बिना ग्रिल वाला? सस्ता, लेकिन चेतावनी के साथ सामान का जोखिम अपना। बंदर कूदकर अंदर, फ्रिज खंगालें, कपड़े फाड़ें। ये आर्थिक चोट है। टूरिज्म पर असर? पर्यटक तो आते रहेंगे, लेकिन लोकल बिजनेस प्रभावित। होटल्स ग्रिल लगाने पर लाखों खर्च कर रहे। और ये सिर्फ शुरुआत है, अगर समस्या न सुलझी, तो शिमला की ‘क्वीन’ वाली चमक फीकी पड़ जाएगी।
सरकार की जंग: 150 करोड़ खर्च, फिर भी बंदरों का राज
हिमाचल सरकार के लिए बंदर राजनीतिक मुद्दा हैं, लेकिन हकीकत में चैलेंज। 2006 से स्टेरलाइजेशन प्रोग्राम चला रहे हैं। 8 सेंटर्स, सालाना 8 करोड़ का खर्च। 2023 तक 1.87 लाख बंदरों को नसबंदी। कुल मिलाकर 19 सालों में 150 करोड़ से ज्यादा। 2020 में केंद्र ने निजी जमीन पर मारने की एक साल की इजाजत दी, लेकिन सरकारी जगहों पर नहीं। फिर भी, आंकड़े निराशाजनक: जन्म रुक रहे, लेकिन मौजूदा झुंड बेधड़क। दिसंबर 2024 में सीएम सुखविंदर सिंह सुक्खू ने प्लान अनाउंस किया, जंगलों में 60% फ्रूट बेयरिंग ट्री लगाना, ताकि बंदरों को भोजन मिले और शहर से दूर रहें। लेकिन 2025 में भी प्रोटेस्ट हो रहे – नागरिक सभा सड़कों पर उतरी, कुत्तों-बंदरों के खिलाफ। वन विभाग कहता है, “हम कोशिश कर रहे, लेकिन नतीजे कम।
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वक्त है जागने का: शिमला को बचाओ
शिमला का ये ‘पिंजड़ा’ सिर्फ लोहे का नहीं, डर का है। पर्यटक हंसें, लेकिन लोकल सिसकियां भरें – ये असंतुलन कब सुधरेगा? वैज्ञानिक कहते हैं, इकोसिस्टम बैलेंस जरूरी: जंगल बचाओ, वाइल्डलाइफ कॉरिडोर बनाओ। सरकार को सख्त कदम – ट्रैपिंग, रिलोकेशन, कम्युनिटी एजुकेशन। वरना, वो शहर जो दुनिया को लुभाता था, बंदरों के आतंक में कैद हो जाएगा। अगली बार शिमला जाएं, तो ग्रिल्स देखकर सोचें – ये सिर्फ घर नहीं, एक चेतावनी है। आपकी राय? क्या बंदरों को ‘वर्मिन’ घोषित करें? कमेंट्स में बताएं!



