पश्चिमी चंपारण: बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहा है। वैसे-वैसे सियासी सरगर्मी तेज हो चली है। सत्ताधारी और विपक्षी दल अपनी-अपनी रणनीतियों के साथ शह-मात के खेल में जुट गए हैं। गठबंधनों की चर्चा, नेताओं के बयान और जनता के बीच मुद्दों की गूंज ने माहौल को और गर्म कर दिया है। इस बार का चुनाव न केवल सत्ता की कुर्सी, बल्कि बिहार की सियासी दशा और दिशा तय करने वाला साबित होगा। इसी से जुड़ी सीट का समीकरण सीरीज में आज नरकटियागंज विधानसभा सीट की बात करेंगे।
पहले जानते हैं नरकटियागंज सीट के बारे में
बिहार के 38 जिलों में से एक पश्चिमी चंपारण जिला भी है। नरकटियागंज विधानसभा निर्वाचन क्षेत्र वाल्मीकि नगर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र का हिस्सा है। वाल्मीकि नगर लोकसभा में कुल छह विधानसभा सीटें आती हैं। इसमें वाल्मीकि नगर, रामनगर (एससी), नरकटियागंज, बगहा, लौरिया, सिकटा शामिल हैं। इस सीट पर लंबे समय तक कांग्रेस ने राज किया है। नरकटियागंज सीट 2008 में हुए परिसीमन के बाद अस्तित्व में आई थी। इससे पहले यह मौजूदा सीट नहीं थी।
वर्मा राजघराने का सियासी किला, परिवार के बीच होती है जंग
बिहार विधानसभा चुनाव नजदीक हैं और सियासी दंगल शुरू हो चुका है। इस बीच, नरकटियागंज विधानसभा सीट की सियासत हमेशा चर्चा में रहती है। यह सीट 2008 में अस्तित्व में आई थी और तब से इस पर वर्मा परिवार का दबदबा रहा है। आइए, इस सीट की सियासी कहानी को करीब से जानते हैं।
नरकटियागंज सीट का इतिहास
पश्चिमी चंपारण जिले में स्थित नरकटियागंज विधानसभा सीट, वाल्मीकि नगर लोकसभा क्षेत्र का हिस्सा है। इस सीट पर लंबे समय तक कांग्रेस का कब्जा रहा, लेकिन 2008 के परिसीमन के बाद यह सीट बनी। 2010 में यहां पहला चुनाव हुआ, जिसमें बीजेपी ने बाजी मारी। वर्मा परिवार इस सीट पर दशकों से सियासी प्रभाव रखता है।
2010 का पहला चुनाव
2010 में हुए पहले विधानसभा चुनाव में बीजेपी के सतीश चंद्र दुबे ने कांग्रेस के आलोक प्रसाद वर्मा को 20,228 वोटों से हराया। तीसरे स्थान पर निर्दलीय फखरुद्दीन खान रहे, जिन्हें 22,381 वोट मिले। सतीश चंद्र दुबे बाद में 2014 में वाल्मीकि नगर से लोकसभा सांसद बने और वर्तमान में केंद्रीय कोयला एवं खनन राज्यमंत्री हैं।
2014 का उपचुनाव
सतीश चंद्र के लोकसभा सांसद बनने के बाद 2014 में उपचुनाव हुआ। बीजेपी की रश्मि वर्मा ने कांग्रेस के फखरुद्दीन खान को 15,742 वोटों से हराया। रश्मि वर्मा की यह पहली चुनावी जीत थी। उनके पति आलोक प्रसाद वर्मा, जो 2010 में कांग्रेस के उम्मीदवार थे, वर्मा परिवार के सदस्य हैं, जिनका चंपारण की राजनीति में 1957 से दबदबा रहा है। रश्मि वर्मा बिहार की राजनीति में काफी सुर्खियों में रहती है।
2020 में भाभी-जेठ का मुकाबला
2020 के चुनाव में रश्मि वर्मा (बीजेपी) और उनके जेठ विनय वर्मा (कांग्रेस) आमने-सामने थे। रश्मि ने विनय को 21,134 वोटों से हराया। रश्मि वर्मा कई बार विवादों में भी रहीं। 2023 में उनकी कुछ तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, जिन्हें उन्होंने एडिट और भ्रामक बताया। इसके अलावा, उन्होंने मोतिहारी में रंगदारी और अपहरण का मामला दर्ज कराया था, जबकि उन पर भी आर्म्स एक्ट समेत कई धाराओं में केस दर्ज हुआ था। 2022 में उनके इस्तीफे की खबरें भी उड़ीं, लेकिन इसे पारिवारिक मामला बताकर शांत कर दिया गया।
इसको भी पढ़ें: Bihar में SIR: मतदाता सूची से हटने का मतलब नागरिकता खत्म होना नहीं
वर्मा राजघराने का इतिहास
वर्मा परिवार का चंपारण की सियासत में गहरा प्रभाव रहा है। विनय वर्मा के पिता सिंहेश्वर प्रसाद वर्मा 1957 में शिकारपुर से विधायक बने थे। परिवार के उमेश प्रसाद वर्मा 1962 में इस सीट से जीते थे। विपिन बिहारी वर्मा 1950-52 में पहली लोकसभा के सदस्य थे।



