पटना: बिहार में जहानाबाद पुलिस के अधिकारियों को पटना HC ने ₹2 लाख का जुर्माना भरने का आदेश दिया है। यह जुर्माना जहानाबाद के मखदुमपुर थाने में एक केस में तय अवधि से ज्यादा समय तक तीन लोगों को अवैध रूप से हिरासत में रखने के आरोप में लगाया गया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि पुलिस अधिकारियों ने गिरफ्तारी को लेकर सुप्रीम कोर्ट के दिशा-निर्देशों का पालन नहीं किया।
मामले का विवरण
यह मामला मखदुमपुर थाने में दर्ज अपहरण और हत्या (थाना कांड संख्या 337/2025) से जुड़ा है। इस केस में शक के आधार पर मखदुमपुर और जहानाबाद थाने की पुलिस ने एक आवेदक के तीन रिश्तेदारों, जिनका नाम मंजू देवी, आदित्य राज और गौतम कुमार है, को अलग-अलग जगहों से गिरफ्तार किया था।
- अवैध हिरासत: पुलिस ने इन तीनों को निर्धारित समय से ज्यादा समय तक थाने में रखा।
- परिजनों को सूचना नहीं: पुलिस ने इस गिरफ्तारी की जानकारी चार से पांच दिनों तक उनके परिजनों को नहीं दी।
- अधिकारों का उल्लंघन: पटना हाईकोर्ट ने इसे नागरिकों के अधिकारों का उल्लंघन माना और कहा कि किसी को तय अवधि से ज्यादा समय तक गैरकानूनी तरीके से हिरासत में रखना कानून के खिलाफ है।
कोर्ट का कड़ा रुख
जस्टिस राजीव रंजन प्रसाद और जस्टिस सौरेन्द्र पाण्डेय की खंडपीठ ने अरविंद कुमार गुप्ता द्वारा दायर आपराधिक रिट याचिका पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया।
- जुर्माना: कोर्ट ने कहा कि तीनों दोषी पुलिस अधिकारियों पर ₹2 लाख का जुर्माना लगाया जा रहा है, और जहानाबाद के पुलिस अधीक्षक (SP) को यह राशि दोषी पुलिसकर्मियों से वसूलने की पूरी छूट दी गई है।
- भविष्य के लिए चेतावनी: कोर्ट ने चेतावनी दी है कि दोषी अधिकारियों के खिलाफ अदालत की अवमानना का मामला भी चलाया जा सकता था, लेकिन फिलहाल सिर्फ जुर्माना लगाया गया है ताकि भविष्य में ऐसी गलतियाँ न हों।
- डीजीपी को आदेश: हाईकोर्ट ने इस आदेश की एक प्रति राज्य के पुलिस महानिदेशक (DGP) को भेजने का भी आदेश दिया है, ताकि सभी जिलों के पुलिस अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट के निर्देशों का पालन करने के लिए कहा जा सके। यह फैसला पुलिस द्वारा गिरफ्तारी और हिरासत के संबंध में कानूनी प्रक्रियाओं का पालन न करने पर एक महत्वपूर्ण संदेश है।
जहानाबाद में पुलिस हिरासत में हुए गैरकानूनी काम के मामले में पटना हाईकोर्ट के कड़े रुख के पीछे कई महत्वपूर्ण बातें हैं, जो इस तरह की घटनाओं की पृष्ठभूमि को दर्शाती हैं।
कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन
- गिरफ्तारी से जुड़े दिशानिर्देश: भारतीय कानून, विशेषकर सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी डी.के. बसु दिशानिर्देशों के अनुसार, किसी भी व्यक्ति को गिरफ्तार करते समय पुलिस को कुछ नियमों का पालन करना होता है। इनमें 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना, गिरफ्तारी की सूचना परिवार को देना, और हिरासत में रखे गए व्यक्ति के अधिकारों की रक्षा करना शामिल है।
- अधिकारों का हनन: इस मामले में, पुलिस ने न सिर्फ तय समय से ज्यादा समय तक तीन लोगों को हिरासत में रखा, बल्कि उनके परिवार को भी सूचित नहीं किया। यह सीधे तौर पर हिरासत में लिए गए लोगों के मौलिक अधिकारों का हनन है।
पुलिस की लापरवाही और मनमानी
अक्सर ऐसा देखा जाता है कि पुलिस अधिकारी गिरफ्तारी के मामलों में नियमों का पालन नहीं करते और अपने हिसाब से काम करते हैं। इस घटना में भी यही हुआ। पुलिस ने अपनी सुविधा के अनुसार लोगों को थाने में रोके रखा, जो कानूनी रूप से गलत है। कोर्ट ने इस प्रवृत्ति पर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि पुलिस अधिकारी “आए दिन” इन दिशानिर्देशों का पालन नहीं करते हैं।
न्यायपालिका का हस्तक्षेप
नागरिकों के अधिकार: जब पुलिस या अन्य सरकारी एजेंसियाँ कानून का उल्लंघन करती हैं, तो न्यायपालिका नागरिकों के अधिकारों की रक्षा के लिए हस्तक्षेप करती है। इस मामले में, पीड़ित परिवार ने सीधे पटना हाईकोर्ट का रुख किया, क्योंकि निचली अदालतों में उन्हें न्याय मिलने की उम्मीद कम थी।
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इसका उद्देश्य सिर्फ इस मामले में न्याय देना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि राज्य के अन्य पुलिस अधिकारी भी भविष्य में ऐसी गलती न करें। यह दिखाता है कि न्यायपालिका, पुलिस की मनमानी को रोकने के लिए तैयार है।



