NGT की चेतावनी: राज्यों को कानून बनाओवरना हरियाली मिटेगी

NGT ने वृक्ष संरक्षण कानून, ट्री जनगणना, और तकनीकी निगरानी पर राज्यों को सख्त निर्देश दिए हैं। सीपीसीबी की रिपोर्ट शहरीकरण और पेड़ों की कटाई पर तत्काल कार्रवाई की मांग करती है, जिसमें 'ट्री ऑफिसर' और 'हेरिटेज ट्री' सुरक्षा शामिल है।

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नई दिल्ली: पेड़ काटने की होड़ में भारत की हरियाली दांव पर है। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को कड़ा संदेश दिया है: वृक्षों को बचाओ, कानून बनाओ, और ट्री जनगणना की तैयारी शुरू करो। अध्यक्ष जस्टिस प्रकाश श्रीवास्तव और विशेष सदस्य डॉ. ए. सेंथिल वेल की बेंच ने सुनवाई में साफ कहा – जहां वृक्ष संरक्षण का कानून नहीं, वहां तुरंत लाएं। जहां है, उसे 1988 की राष्ट्रीय वन नीति के मुताबिक निखारें। चार हफ्ते में केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (सीपीसीबी) की रिपोर्ट पर जवाब दाखिल करो, और नवंबर 2025 के आखिर तक सब कुछ सौंप दो। अगली सुनवाई 27 जनवरी 2026 को होगी। ये निर्देश प्रतिपूरक वनीकरण और पेड़ों की रक्षा पर केंद्रित हैं, क्योंकि तेज शहरीकरण हर सांस को मुश्किल बना रहा।

CBI की रिपोर्ट: तकनीक से निगरानी

सुनवाई में सीपीसीबी ने अपनी ताजा रिपोर्ट पेश की, जो पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (मोएएफसीसी) की विशेषज्ञ समिति की सिफारिशों पर टिकी है। रिपोर्ट चेताती है कि पेड़ों की कटाई पर नजर रखने के लिए जीआईएस और रिमोट सेंसिंग जैसी आधुनिक तकनीकों को तेजी से अपनाओ। स्थानीय स्तर पर ‘ट्री ऑफिसर’ को ताकत दो, ताकि छोटे-मोटे फैसले फटाफट हों। शहरों में ‘हेरिटेज ट्री’ यानी सदियों पुराने या सांस्कृतिक महत्व वाले पेड़ों को खास सुरक्षा कवच दें। ट्री अथॉरिटी को मजबूत बनाने का आइडिया भी कमाल का: सिर्फ सरकारी अफसरों तक सीमित न रखो, बल्कि शहरी प्लानर, पर्यावरण वैज्ञानिक, हेल्थ एक्सपर्ट, लीगल माइंड्स, एनजीओ और प्राइवेट सेक्टर के लोगों को जोड़ो। मंत्रालय को नीति बनाने, ट्रेनिंग देने और राज्यों के बीच तालमेल बिठाने की जिम्मेदारी सौंपी गई। ये कदम पेड़ों को सिर्फ कागजों पर न रखकर जमीनी हकीकत में लाने के लिए हैं।

समिति की रिपोर्ट में तत्काल एक्शन की मांग

मंत्रालय ने वन महानिदेशक और विशेष सचिव की अगुवाई में बनी समिति ने राज्यों की जमीनी स्थिति का जायजा लिया। रिपोर्ट में साफ कहा – भारत की लकड़ी की 85 फीसदी जरूरत जंगलों से नहीं, बल्कि गैर-वन क्षेत्रों (जैसे खेत, सड़कें, शहर) से पूरी होती है। जंगलों से महज 3 फीसदी योगदान। ऐसे में इन इलाकों को बचाना जरूरी, वरना लकड़ी का संकट और गहरा जाएगा। समिति ने तुरंत कदम उठाने को कहा: कानूनों को टाइट करो, तकनीकी निगरानी बढ़ाओ, और हर राज्य में ‘वृक्ष प्राधिकरण’ खड़ा करो। इसका हेड राज्य वन या शहरी विकास का टॉप अफसर होगा, जिसमें वन, प्लानिंग, हेल्थ, पर्यावरण एक्सपर्ट्स के साथ अर्बोरिस्ट (पेड़ विशेषज्ञ) भी होंगे। हर राज्य में एक ‘ट्री ऑफिसर’ की तैनाती अनिवार्य – ये लोकल निकायों को पेड़ काटने की मंजूरी देगा। गैर-वन क्षेत्रों में कटाई, छंटाई, रोपाई के लिए ‘एक देश, एक नीति’ लागू करो।

शहरीकरण का कहर: स्मार्ट पेड़ ही बचाएंगे शहरों को

तेज शहर फैलाव से गैर-वन इलाके सिकुड़ रहे, जबकि गर्मी, प्रदूषण, बाढ़ जैसे खतरे बढ़ रहे। समिति की नजर में ‘स्मार्ट ट्रीज’ ही रामबाण ये हवा साफ करेंगे, तापमान ठंडा रखेंगे, पानी सोखेंगे और जैव विविधता को हवा देंगे। केंद्र ने राज्यों को नीति दिशा देने की जिम्मेदारी सौंपी है, ताकि पेड़ कटाई का लाइसेंस बिना सोचे न बंटे। एनजीटी का ये फैसला पेड़ों को सिर्फ सजावट नहीं, बल्कि जीवनरक्षक मानने का संकेत है। अगर राज्यों ने अमल किया, तो भारत की हवा साफ हो सकती है। वरना, हरियाली की कीमत सांसों से चुकानी पड़ेगी।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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