पटना। बिहार विधानसभा चुनाव के परिणाम शुक्रवार को आ जाएंगे। दोपहर तक रूझानों से स्पष्ट हो जाएगा कि सरकार किसकी बन रही है। इस बीच एक्जिट पोल में एनडीए की जीत बताया जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों ने महागठबंधन की अपेक्षा एडीए का तीन प्रतिशत वोट अधिक रहने का अनुमान लगाया है। इस वोट प्रतिशत का अंतर पिछली बार दशमलव शून्य तीन प्रतिशत था। इस बार महागठबंधन का ज्यादा पीछे रहने का अनुमान है। इसका कारण एनडीए का चुनावी प्रबंधन का ठीक होना नहीं है, बल्कि महागठबंधन का चुनावी प्रबंधन का गलत होना है।
पहले पिछली बार का डाटा जानते हैं। पिछली बार के विधानसभा चुनाव में एनडीए को कुल 37.26 प्रतिशत वोट मिले थे, जबकि महागठबंधन को 37.23 वोट मिला था। इस .03 प्रतिशत के वोट के अंतर ने ही एनडीए को कुर्सी की चाबी पकड़ा दी, जबकि महागठबंधन मुख्यमंत्री की कुर्सी से दूर हो गया। पिछले 2020 के विधानसभा चुनाव में एनडीए को कुल 125 सीटें मिली थीं, जबकि महागठबंधन को 110 सीटें हाथ लगी थीं। पिछली बार चिराग पासवान की पार्टी एनडीए के साथ नहीं थी। उसने जदयू के वोट को ज्यादा प्रभावित किया।
अधिसूचना के बाद काफी दिन निष्क्रिय हो गये राहुल गांधी
इस बार की अधिसूचना से पूर्व राहुल गांधी ने बिहार में यात्रा शुरु की। इसके बाद तेजस्वी ने अकेले भी यात्रा निकाली। उस समय माहौल गरम था, महागठबंधन के कार्यकर्ताओं में एकता का जोश स्पष्ट झलक रहा था, लेकिन अधिसूचना जारी होने के बाद महागठबंधन दलों के बीच चली खिंचतान ने कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ दिया। इससे कांग्रेस को ज्यादा निराशा हाथ लगी, जब अधिसूचना से पहले बिहार में काफी सक्रिय रहे राहुल गांधी ने अधिसूचना के बाद लगभग पचास दिनों तक बिहार में आये ही नहीं और न ही सोशल मीडिया पर बिहार के बारे में उनका बयान आया।
अंत तक महागठबंधन के बीच नहीं हो पाया सीट का स्पष्ट बंटवारा
ना-ना करते हुए भी दोनों गठबंधनों में गठबंधन की सीट बंटवारा में एनडीए आगे निकल गयी और सीटों का स्पष्ट बंटवारा कर लिया, जबकि महागठबंधन अंत तक इसमें उलझी रही और 10 सीटों पर आपस में ही उलझ गये। यह महागठबंधन के लिए अशुभ संकेत साबित हुआ। इससे दूसरी जगहो पर संदेश अच्छा नहीं गया।
अनुमान के मुताबिक वोट काटने में असफल रही जन सुराज
इस बार चुनाव से पूर्व यह अनुमान लग रहा था कि जन सुराज एनडीए के वोट बैंक में बहुत ज्यादा सेंध लगाएगी, लेकिन वह चुनाव आते-आते कुछ शिथिल पड़ गयी और उसके समर्थक काफी संख्या में उससे कट गये। इसका कारण यह था कि सबके मन में यह हो गया कि जन सुराज कुछ खास नहीं कर पाएगी, इसको वोट देने का मतलब है कि वोट को पानी में बहा देना। इससे उसके शुभचिंतकों ने भी अंत में उससे दूरी बना ली।
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महागठबंधन के घटक दलों में तालमेल नहीं रहा अच्छा
इस चुनाव में महागठबंधन के घटक दलों के बीच तालमेल भी अच्छा नहीं रहा। कई जगहों पर भीतर-घात करने की कोशिश हुई, जिसे ऊपर बैठे पदाधिकारियों ने दबाने की भी कोशिश नहीं की। इससे वे आपस में उलझकर अपना ही नुकसान कर बैठे। हालांकि अभी फाइनल नहीं कहा जा सकता। यह तो शुक्रवार को रिजल्ट के बाद ही घोषित होगा, लेकिन न्यूजी इंडिया के सर्वे अनुमानों के आधार पर यह कहा जा सकता है कि महागठबंधन की गलतियों के कारण एनडीए को लीड मिलने का अनुमान है। इसमें सबसे ज्यादा नुकसान कांग्रेस को हो सकता है।



