भागलपुर : बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर भागलपुर की राजनीति मेें इस बार कुछ अलग रंग दिखाई दे रहा है। यहां इस बार लगभग सभी प्रमुख पार्टियों के जिलाध्यक्ष का धैर्य जवाब दे गया है। अब तक पर्दे के पीछे रहकर संगठन की जिम्मेदारी संभालने और दूसरे नेताओं को टिकट दिलाने वाले जिलाध्यक्ष खुद ही मैदान में ताल ठोंकने की तैयारी कर रहे हैं। जदयू, भाजपा, लोजपा(आर) राजद जैसी पार्टियों के जिला अध्यक्षों का कहना है कि हम लोग अपना जीवन समर्पित कर दिये पार्टी को खड़ा करने के लिए और संगठन को मजबूत करने के लिए अब तक दूसरे के लिए काम कर रहे थे अब हम खुद के लिए लड़ रहे हैं।
जदयू जिलाध्यक्ष विपिन बिहारी सिंह
जदयू जिलाध्यक्ष विपिन बिहारी सिंह ने बताया कि पार्टी के वह समर्पित कार्यकर्ता है, इसीलिए पार्टी ने उन्हें जिला अध्यक्ष बनाया और वह पार्टी के विजन को जन-जन तक पहुंचाने के लिए मजबूती से काम किया है। यही वजह है लोकसभा चुनाव भी हमने भारी मतों से जीता था। अब पार्टी से आलाकमान आग्रह करते हैं कि वह इस बार सुल्तानगंज से चुनाव लडऩे की तैयारी कर रहे हैं इसलिए उम्मीदवार बनाया जाएं, उनका दो टूक कहना है, दूसरों को जिताने में उम्र बीत गई, अब अपनी किस्मत आजमाने का वक्त है।
राजद जिलाध्यक्ष चंद्रशेखर यादव
राजद जिलाध्यक्ष चंद्रशेखर यादव ने सुल्तानगंज को अपना ठिकाना बना लिया है। इनका कहना है कि जिलाध्यक्ष है केवल संगठन के पहरेदार बनकर नहीं रहना चाहते, बल्कि सत्ता की चाबी अपने हाथ में देखना चाहते हैं, कहा पुराने समीकरणों को बदल सकते है।
कांग्रेस जिलाध्यक्ष परवेज जमाल
कांग्रेस जिलाध्यक्ष परवेज जमाल कहलगांव विधानसभा से दावेदारी की ताल ठोक रहे हैं, जहां कांग्रेस हमेशा से चुनाव लड़ती आई है। पिछले चुनाव में भाजपा से कांग्रेस हार गई थी। इस बार कांग्रेस के कई दावेदार कहलगांव सीट से चुनाव लडऩा चाह रहे हैं क्योंकि पिछले चुनाव में कांग्रेस नेता दिवंगत सदानंद सिंह के पुत्र शोभानंद मुकेश ने चुनाव लड़ा था। अब शोभानंद मुकेश जदयू में शामिल हो गए हैं, इसलिए कहलगांव से कांग्रेस से कई दावेदार हैं। परवेज जमाल कहते हैं कि संगठन खड़ा किया, कार्यकर्ताओं को जोड़ा, पसीना बहाया तो टिकट का पहला हक भी हमारा होना चाहिए। वर्षों से जिला स्तर पर पार्टी को खड़ा करने और हर छोटे-बड़े चुनाव में निष्ठापूर्वक काम करने का हवाला देकर वे खुद को सही दावेदार बताते हैं।
लोजपा (रामविलास) के जिला अध्यक्ष सुबोध पासवान
लोजपा (रामविलास) के जिला अध्यक्ष सुबोध पासवान का कहना है कि वह जिला अध्यक्ष बनते ही पार्टी को मजबूती प्रदान किए हैं। कई भागलपुर के दिग्गज नेताओं को पार्टी में शामिल कराया है, जिससे पार्टी मजबूत हुई है। सुबोध ने कहा कि हमेशा पार्टी के विजन और हमारे नेता राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान की सोच को लोगों तक पहुंचा है, इस बार मैं खुद भी पीरपैंती से चुनाव लडऩे की तैयारी में है। बस पार्टी मुझे मौका दे और पार्टी को हम सीट निकाल कर देंगे। उन्होंने कहा कि गठबंधन में यदि चुनाव लड़ेंगे तो पीरपैंती सीट लोजपा की होगी साथ ही नाथनगर पर भी हम लोगों की नजर है।
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भाजपा जिला अध्यक्ष संतोष कुमार
भाजपा जिला अध्यक्ष संतोष कुमार का मानना है कि उन्होंने पर्दे के पीछे रहकर पार्टी को मजबूत किया। वे उम्मीदवार तय करने में परामर्शदाता बने, कार्यकर्ताओं को एकजुट करने में अहम भूमिका निभायी और चुनावी प्रबंधन की जिम्मेदारी संभालते थे लेकिन इस बार खुद भागलपुर से चुनाव लडऩा चाहते हैं। यह सीट पिछले तीन चुनाव से हार रहे हैं इसलिए इस बार हम लोग एकजुट होकर इस सीट पर जीत दर्ज करने के लिए काम कर रहे हैं मुझे कार्यकर्ताओं का भी समर्थन है।
राजनीतिक गलियारे में इसे एक बड़े बदलाव के रूप में देखा जा रहा है। इस बदलती तस्वीर का एक और पहलू भी है। जिलाध्यक्षों की सक्रियता इस बात का प्रमाण है कि जिले में संगठन और चुनावी जमीन पर काम करने वालों का धैर्य अब जवाब देने लगा है। पहले वे पार्टी के बड़े नेताओं को मजबूत करने में ही संतुष्ट हो जाते थे, लेकिन अब उन्हें लग रहा है कि मेहनत का असली फल तभी मिलेगा। जब वे खुद जनता का प्रतिनिधित्व करें। यही वजह है कि उन्होंने सीधे टिकट की दौड़ में कूदने का फैसला किया है। अब यह साफ इशारा है कि संगठन की कुर्सी अब सत्ता की सीढ़ी बन गई है। हालांकि यह राह आसान नहीं है। पार्टी नेतृत्व के सामने मुश्किल यह है कि यदि जिलाध्यक्षों की दावेदारी को तरजीह दी गई, तो पुराने नेताओं और पूर्व प्रत्याशियों का विरोध झेलना पड़ सकता है। वहीं यदि उन्हें नजरअंदाज किया गया, तो संगठन पर उनकी पकड़ ढीली पड़ सकती है। ऐसे में आलाकमान किसे साधे और किसे नाराज करे। यही सबसे बड़ी चुनौती बन गई है।
भागलपुर की राजनीति इस बार इन्हीं समीकरणों की गवाह बनेगी। कांग्रेस से लेकर भाजपा, राजद, जदयू और लोजपा (रामविलास) हर दल में जिलाध्यक्ष टिकट की लाइन में खड़े हैं। अब देखना यही है कि पार्टी आलाकमान अपने संगठन के सिपहसालारों को इनाम देता है या एक बार फिर उनकी भूमिका प्रस्ताव भेजने और कागज पर हस्ताक्षर तक सीमित रह जाती है।



