पटना। भारतीय राजनीति में बहुत कम देखने को मिला है कि राजनीतिक यात्रा का प्रतिफल किसी नेता को न मिला हो। इसमें भी यह पहली बार है कि राजनीतिक यात्रा कर पूरे बिहार को किसी नेता ने मथ डाला, लेकिन चुनाव में बढ़त के बजाय बैक गेयर लग गया। यह पहली बार कांग्रेस के साथ हुआ, जो पिछली बार 19 सीटों पर जीत हासिल की थी और इस बार मात्र एक सीट पर बढ़त बनायी हुई है। पिछली बार भी राहुल गांधी ने लोकसभा चुनाव से पूर्व यात्रा की थी। उसमें निखार भी आया था, सरकार बनाने में भले असफल रहे हों, लेकिन कांग्रेस की सीटें बढ़ाने में सफल रहे।
यात्रा के बाद एनटी रामाराव बने थे आंध्र के मुख्यमंत्री
आजाद भारत में चर्चित राजनीतिक यात्राओं का इतिहास 1982 से शुरु होता है, जब आंध्र प्रदेश में एनटी रामाराव ने चैतन्य रथम यात्रा निकाली। उन्होंने 75 हजार किलोमीटर लंबी इस यात्रा ने प्रदेश के चार चक्कर लगाए। यह गिनीज बुक आफ वल्र्ड रिकार्ड में दर्ज है। 29 मार्च 1982 को नंदमूरी तारक रामाराव ने तेलुगु सम्मान के मुद्दे पर तेलुगुदेशम पार्टी का गठन किया और देश की पहली राजनीतिक रथयात्रा शुरू की। एनटीआर एक दिन में 100-100 जगहों तक रुकते। वह इतना लोकप्रिय थे कि जनता इंतजार करती थी, महिलाएं उनकी आरती उतारती थीं। यात्रा के बाद विधानसभा चुनाव में तेलुगुदेशम पार्टी को 294 में से 199 सीटें मिलीं और एनटीआर आंध्र प्रदेश के पहले गैर कांग्रेसी मुख्यमंत्री बने।
यात्रा निकालकर चंद्रशेखर ने पायी थी प्रसिद्धी
वहीं चंद्रशेखर जी ने 1983 में एक राजनीतिक यात्रा निकाली, जिसकी चर्चा आज भी होती है। यह यात्रा चंद्रशेखर ने कन्याकुमारी से शुरु की और यह राजघाट पर समाप्त हुई। उस समय चंद्रशेखर जनता पार्टी के अध्यक्ष थे। इस यात्रा के बाद चंद्रशेखर की एक अलग ही छवि जनता के सामने आई। इस यात्रा के बाद उनकी पकड़ जनता के बीच और भी मजबूत हो गई थी लेकिन इंदिरा गांधी की हत्या ने राजनीतिक समीकरणों को बदल दिया। विपक्षी दलों और चंद्रशेखर की उम्मीदों को आगामी कांग्रेस की चुनावी सुनामी ने डुबो दिया।
राजीव ने भी निकाली थी यात्रा
वहीं राजीव गांधी ने 1985 में कांग्रेस संदेश यात्रा की घोषणा की थी। राजीव गांधी ने इस यात्रा का जिम्मा अखिल भारतीय कांग्रेस सेवा दल को सौंपा। एआईसीसी सत्र में राजीव गांधी ने यात्रा के शुभारंभ के अवसर पर तत्कालीन कांग्रेस सेवा दल प्रमुख तारिक अनवर को पार्टी का झंडा सौंपा।
आडवाणी की रथ यात्रा ने दिलायी थी भाजपा को बढ़त
बीजेपी के तत्कालीन अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी की अुगवाई में सोमनाथ से अयोध्या तक की रथ यात्रा की शुरुआत 1990 में शुरु हुई, जो राजनीति में भूचाल ला दिया। इस यात्रा के जरिए बीजेपी ने न केवल राम मंदिर का मुद्दा उठाया, बल्कि ‘मंडल’ की राजनीति के खिलाफ उसके ‘कमंडल’ दांव को भी चिह्नित किया। अयोध्या पहुंचने से पहले ही आडवाणी को गिरफ्तार कर लिया गया था, लेकिन मंदिर वही बनाएंगे जैसे नारों के बीच उनकी यात्रा ने भाजपा की किस्मत के अलावा भारतीय राजनीति के गणित को काफी बदल दिया। कहा जाता है कि यहीं से भाजपा की राजनीतिक यात्रा ने करवट ली और एक नए दौर में प्रवेश किया। रथयात्रा के बीच राममंदिर आंदोलन में भारी संख्या में कारसेवक अयोध्या पहुंचे। वर्ष 1991 के लोकसभा चुनावों में भाजपा को 120 सीटें मिलीं जो पिछले चुनाव से सीधे 35 अधिक थीं।
दिग्विजय ने भी की थी पदयात्रा
वहीं कई नेता राज्य स्तर पर राजनीतिक यात्राओं को भी शुरु किया है और उनको इसका फायदा भी मिला है। स्वर्गीय वाईएस राजशेखर रेड्डी 2003 में आंध्र प्रदेश में अपनी पदयात्रा के साथ सत्ता में आए। उनके बेटे जगन मोहन रेड्डी ने भी 2018 में इसका अनुसरण किया। ममता बनर्जी ने अपनी यात्रा के जरिए पश्चिम बंगाल में वाम किले पर धावा बोला। भारत जोड़ो यात्रा के समन्वयक दिग्विजय सिंह ने स्वयं छह महीने लंबी, 3,000 से अधिक किलोमीटर की ‘नर्मदा परिक्रमा’ पूरी की। 2018 मध्य प्रदेश विधानसभा चुनाव से पहले उन्होंने यह यात्रा पूरी की।
वाईएस रेड्डी ने की थी पैदल यात्रा, मिली थी बंपर जीत
वहीं कांग्रेस के आंध्र प्रदेश के कद्दावर नेता वाईएस राजशेखर रेड्डी ने 2004 में चेवेल्ला शहर से 1,500 किमी पैदलयात्रा की शुरुआत की। यह यात्रा 11 जिलों से होकर गुजरी। विधानसभा चुनाव में 294 में से 185 सीटों पर कांग्रेस की जीत के साथ 10 वर्ष से जारी टीडीपी का शासन खत्म हुआ और वाईएस राजशेखर रेड्डी मुख्यमंत्री बने। आंध्र प्रदेश में ही वर्ष 2017 में निकाली गई इस यात्रा ने युवा जगनमोहन रेड्डी को मुख्यमंत्री की कुर्सी तक पहुंचा दिया।
लोकसभा चुनाव से पूर्व राहुल की यात्रा भी रही थी सफल, लेकिन बिहार में हुई असफल
लोकसभा चुनाव से पूर्व राहुल गांधी ने भारत जोड़ो यात्रा शुरू की। उनके नेतृत्व में कन्याकुमारी से कश्मीर तक ‘भारत जोड़ो यात्रा’ 7 सितंबर हुई, जो करीब पांच महीने में 12 राज्यों और दो केंद्र शासित प्रदेशों से होकर 3,500 किलोमीटर की दूरी तय की। यह कांग्रेस का पिछले कुछ वर्षों में सबसे बड़ा प्रयास था। इस यात्रा का परिणाम भी अच्छा रहा और कांग्रेस की सीटें लोकसभा चुनाव में बढ़ गयी, लेकिन इस बार बिहार चुनाव से पूर्व राहुल गांधी ने एसआईआर के खिलाफत करने के बहाने बिहार में यात्रा शुरु की। उस समय इस यात्रा की बहुत चर्चा भी हुई, लेकिन यह चुनाव परिणामों में नहीं बदल पाया और 19 सीटों पर विजय पाने वाली कांग्रेस इस बार एक सीट पर आगे चल रही है।



