नई दिल्ली: दिल्ली की गर्मी और उमस अब केवल गर्मियों तक सीमित नहीं रही। बदलते मौसम के साथ बढ़ती नमी ने राजधानी में बिजली की मांग को नई ऊंचाइयों पर पहुंचा दिया है। सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरनमेंट (सीएसई) की ताजा रिपोर्ट में खुलासा हुआ है कि गर्मी और नमी का संयुक्त प्रभाव, जिसे हीट इंडेक्स कहते हैं, जब सामान्य स्तर से ऊपर जाता है, तो लोग ठंडक पाने के लिए एयर कंडीशनर (एसी) और कूलर का सहारा लेते हैं। नतीजतन, दिल्ली में बिजली की खपत रिकॉर्ड तोड़ रही है। यह स्थिति अब सिर्फ गर्मियों तक नहीं, बल्कि मानसून के महीनों में भी बनी रहती है, जिससे बिजली ग्रिड पर भारी दबाव पड़ रहा है।
गर्मी और उमस का खतरनाक मिश्रण
सीएसई की रिपोर्ट बताती है कि दिल्ली जलवायु परिवर्तन और ऊर्जा संकट के दोहरे चक्रव्यूह में फंस चुकी है। बढ़ता तापमान और उमस शहरवासियों को ठंडक के लिए मजबूर कर रहा है, जिससे बिजली की मांग में अभूतपूर्व वृद्धि हो रही है। पहले गर्मियां मई-जून तक सीमित रहती थीं, लेकिन अब मानसून में भी उमस के कारण लोग दिन-रात एसी और कूलर चला रहे हैं। यह बिजली की खपत को बढ़ाने के साथ-साथ शहर की बिजली आपूर्ति प्रणाली पर भी दबाव डाल रहा है।
रिकॉर्ड तोड़ रही बिजली की मांग
रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली में बिजली की मांग ने इस साल नया कीर्तिमान स्थापित किया है। 12 जून 2025 को रात 11:09 बजे बिजली की मांग 8,442 मेगावाट (MW) तक पहुंच गई, जो अब तक का दूसरा सबसे बड़ा आंकड़ा है। यह पिछले साल 19 जून 2024 को दर्ज 8,656 MW की सर्वकालिक उच्च मांग से केवल 2.5% कम है। पिछले एक दशक में दिल्ली की पीक बिजली मांग में 44% की वृद्धि हुई है, जो 2015 में 5,846 MW से बढ़कर 2025 में 8,442 MW हो गई। अगस्त 2025 में औसत पीक डिमांड पिछले साल की तुलना में 2% अधिक थी, और महीने के 31 में से 16 दिन 2024 की तुलना में ज्यादा मांग दर्ज की गई। यह दर्शाता है कि गर्मी और उमस का असर बिजली की खपत को लगातार बढ़ा रहा है।
मानसून में भी उमस ने बढ़ाई मुश्किल
पहले मानसून बारिश के साथ ठंडक लाता था, लेकिन अब स्थिति बदल गई है। सीएसई के अध्ययन के मुताबिक, जून से अगस्त के बीच मानसून के महीनों में हीट इंडेक्स 46 से 50 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच जाता है। यह उमस भरी गर्मी लोगों को ठंडक के लिए एसी और कूलर पर निर्भर होने को मजबूर करती है। 2025 में मानसून के दौरान दिन के तापमान में 2.1 डिग्री और रात के तापमान में 3 डिग्री की वृद्धि दर्ज की गई, जिसने ठंडक की अवधि को और कम कर दिया। अप्रैल 2025 में भी बिजली की खपत पिछले साल की तुलना में अधिक रही, जो गर्मियों की शुरुआत में ही तीव्र गर्मी का संकेत देता है।
रातें भी नहीं दे रहीं राहत
रिपोर्ट में एक चिंताजनक तथ्य सामने आया है कि दिल्ली की रातें अब पहले की तरह ठंडी नहीं रह गई हैं। पहले दिन और रात के तापमान में 15 डिग्री तक का अंतर होता था, लेकिन 2025 में यह घटकर 8.6 डिग्री रह गया। इस बार बिजली की मांग का पीक रात 11 बजे दर्ज हुआ, जो दर्शाता है कि रात में भी गर्मी लोगों को परेशान कर रही है। इसका कारण है शहरीकरण, कंक्रीट की बढ़ती इमारतें, हरियाली की कमी, और एसी व वाहनों से निकलने वाली गर्मी, जो रात में तापमान को कम नहीं होने देती। यह न केवल बिजली की खपत बढ़ा रहा है, बल्कि स्वास्थ्य जोखिमों को भी बढ़ा रहा है।
स्वास्थ्य और पर्यावरण पर खतरा
लंबे समय तक गर्मी और उमस का सामना करने से डिहाइड्रेशन, हीट स्ट्रोक और थकान जैसी समस्याएं बढ़ रही हैं। सीएसई की रिपोर्ट चेतावनी देती है कि दिल्ली को अब सिर्फ एसी पर निर्भरता कम करनी होगी। इसके लिए शहर में हरियाली बढ़ाने, जलस्रोतों का संरक्षण, ऊर्जा-कुशल इमारतों का निर्माण, और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों के लिए कूलिंग शेल्टर की व्यवस्था जरूरी है। जलवायु परिवर्तन ने इस समस्या को और जटिल बना दिया है, क्योंकि अनियमित बारिश और तीव्र गर्मी अब आम हो गई है।
राष्ट्रीय और वैश्विक संदर्भ
अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) की एक रिपोर्ट के अनुसार, भारत में गर्मियां अब पहले से एक महीने पहले शुरू हो रही हैं, और लू की घटनाएं अधिक तीव्र और बार-बार हो रही हैं। पिछले एक दशक में देश में बिजली की पीक मांग हर साल औसतन 4% बढ़ी है। अनुमान है कि 2030 तक यह मांग 2022 की तुलना में 60% तक बढ़ सकती है, जिसमें से आधा हिस्सा ठंडक के लिए उपकरणों की जरूरतों से आएगा। दिल्ली का यह संकट देश के अन्य हिस्सों में भी देखा जा रहा है, जो ऊर्जा और पर्यावरण नीतियों पर नए सिरे से सोचने की मांग करता है।
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समाधान की राह
रिपोर्ट सुझाव देती है कि दिल्ली को गर्मी और बिजली संकट से निपटने के लिए व्यापक रणनीति अपनानी होगी। इसमें शामिल हैं:
- ऊर्जा-कुशल इमारतें: इमारतों को थर्मल कम्फर्ट के लिए डिजाइन करना, ताकि एसी की जरूरत कम हो।
- हरियाली और जलस्रोत: पेड़-पौधों और जलाशयों को बढ़ाकर शहरी गर्मी को कम करना।
- कूलिंग शेल्टर: गरीब और कमजोर वर्गों के लिए सस्ते और सुरक्षित ठंडक केंद्र बनाना।
- जलवायु डेटा का उपयोग: मौसम और बिजली खपत के आंकड़ों का विश्लेषण कर बेहतर नीतियां बनाना।



