Delhi-NCR में Microplastics का बढ़ता संकट: यमुना व पर्यावरण पर गहराता खतरा

पर्यावरण अनुसंधान संस्थान (ईआरआई) की हालिया रिपोर्ट, अर्बन इकोसिस्टम्स में माइक्रोप्लास्टिक की पर्यावरणीय उपस्थिति, ने इस संकट की गंभीरता को उजागर किया है।

Share This Article:

नई दिल्ली: भारत की राजधानी दिल्ली और आसपास का राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (एनसीआर) अब न केवल वायु प्रदूषण और जल संकट से जूझ रहा है, बल्कि माइक्रोप्लास्टिक (Microplastics) प्रदूषण की एक नई और गंभीर चुनौती का सामना कर रहा है। पर्यावरण अनुसंधान संस्थान (ईआरआई) की हालिया रिपोर्ट, अर्बन इकोसिस्टम्स में माइक्रोप्लास्टिक की पर्यावरणीय उपस्थिति, ने इस संकट की गंभीरता को उजागर किया है।

नीति आयोग और अंतरराष्ट्रीय पर्यावरण संगठन के सहयोग से किए गए इस अध्ययन में दिल्ली-एनसीआर की हवा, पानी और मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक की मात्रा खतरनाक स्तर पर पाई गई है। शोधकर्ताओं ने क्षेत्र के 15 शहरी और अर्ध-शहरी स्थानों से नमूने एकत्र किए और उनकी जांच के लिए उन्नत तकनीकों जैसे कि एफटीआईआर और रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी का उपयोग किया।

हवा, पानी और मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक की मौजूदगी
रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली की हवा में प्रति घनमीटर 1.8 से 4.5 माइक्रोप्लास्टिक कण पाए गए हैं, जो विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) और यूरोपीय पर्यावरण एजेंसी की सुरक्षित सीमा (0.7 कण/घनमीटर) से कहीं अधिक है। यमुना नदी और अन्य स्थानीय जल स्रोतों में माइक्रोप्लास्टिक की सांद्रता प्रति लीटर 9 से 14 कण तक है, जो डब्ल्यूएचओ के अस्थायी मानक (2.5 कण/लीटर) से पांच गुना अधिक है। इसके अलावा, मिट्टी के नमूनों में प्रति 100 ग्राम में 300 से 400 माइक्रोप्लास्टिक फाइबर पाए गए, जो मिट्टी की उर्वरता और पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुंचा रहे हैं।

माइक्रोप्लास्टिक के स्रोत
माइक्रोप्लास्टिक प्रदूषण के प्रमुख स्रोतों में शामिल हैं:

  • टायर घर्षण: वाहनों के टायरों से निकलने वाले सूक्ष्म कण।
  • सिंथेटिक कपड़े: धुलाई के दौरान कपड़ों से निकलने वाले प्लास्टिक रेशे।
  • निर्माण कार्य: प्लास्टिक सामग्री का उपयोग और अपशिष्ट।
  • कचरा प्रबंधन की कमी: अनुचित तरीके से निपटारा गया प्लास्टिक कचरा।

ये सूक्ष्म कण हवा, पानी और भोजन के माध्यम से मानव शरीर में प्रवेश कर सकते हैं, जिससे फेफड़ों, पाचन तंत्र और यहां तक कि मस्तिष्क पर विषाक्त प्रभाव पड़ सकता है। मिट्टी में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक्स सूक्ष्मजीवों और फसलों को प्रभावित कर कृषि उत्पादकता को कम कर सकते हैं। ईआरआई के पर्यावरण वैज्ञानिक डॉ. रीना शर्मा ने कहा कि माइक्रोप्लास्टिक अब केवल पर्यावरण तक सीमित नहीं है। यह हमारे शरीर और भोजन श्रृंखला में प्रवेश कर चुका है। यह एक ऐसी आपदा है जो भविष्य की पीढ़ियों के लिए गंभीर खतरा बन सकती है।

वैश्विक तुलना में दिल्ली की स्थिति
दिल्ली-एनसीआर में माइक्रोप्लास्टिक का स्तर वैश्विक शहरों की तुलना में भी चिंताजनक है। उदाहरण के लिए, लंदन की थेम्स नदी में प्रति लीटर 4.2 कण और लॉस एंजेलेस की नदियों में 5.3 कण पाए गए हैं, जबकि दिल्ली के जल स्रोतों में यह आंकड़ा दोगुना है। हवा में मौजूद माइक्रोप्लास्टिक कणों का औसत आकार 4 माइक्रोन से कम है, जो मानव श्वसन तंत्र में आसानी से प्रवेश कर सकता है।

माइक्रोप्लास्टिक सूचकांक की आवश्यकता
रिपोर्ट में सुझाव दिया गया है कि भारत को वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) के साथ-साथ एक माइक्रोप्लास्टिक सूचकांक विकसित करना चाहिए। यह सूचकांक शहरी नियोजन, पर्यावरण नीतियों और सार्वजनिक स्वास्थ्य योजनाओं में शामिल किया जाना चाहिए। कई विकसित देश जैसे यूरोपीय संघ और चीन ने इस दिशा में कदम उठाने शुरू कर दिए हैं, और भारत को भी तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता है।

नीतिगत सुझाव और समाधान
रिपोर्ट में माइक्रोप्लास्टिक संकट से निपटने के लिए निम्नलिखित सिफारिशें दी गई हैं:

  • राष्ट्रीय माइक्रोप्लास्टिक निगरानी प्रणाली: एक केंद्रीकृत नेटवर्क की स्थापना जो हवा, पानी और मिट्टी में माइक्रोप्लास्टिक की निगरानी करे।
  • कचरा प्रबंधन में सुधार: नगरपालिकाओं को प्लास्टिक कचरे के संग्रह, पृथक्करण और पुनर्चक्रण के लिए तकनीकी और वित्तीय सहायता प्रदान की जाए।
  • पर्यावरण कर: सिंथेटिक कपड़ों और प्लास्टिक-आधारित टायरों पर ग्रीन टैक्स लगाया जाए, साथ ही पर्यावरण लेबलिंग को अनिवार्य किया जाए।
  • शिक्षा और जागरूकता: स्कूलों और कॉलेजों में माइक्रोप्लास्टिक और पर्यावरण संरक्षण पर पाठ्यक्रम शामिल किए जाएं।
  • शोध और नवाचार: माइक्रोप्लास्टिक हटाने की तकनीकों और जैविक विकल्पों पर अनुसंधान को प्रोत्साहन दिया जाए।
  • सामुदायिक भागीदारी: सिंगल-यूज प्लास्टिक के उपयोग को कम करने, स्वच्छता अभियानों और नागरिक निगरानी कार्यक्रमों को बढ़ावा दिया जाए।

तत्काल कार्रवाई की आवश्यकता
माइक्रोप्लास्टिक का यह संकट न केवल पर्यावरण बल्कि मानव स्वास्थ्य और जैव विविधता के लिए भी एक गंभीर खतरा है। दिल्ली-एनसीआर में इस समस्या से निपटने के लिए सरकार, नागरिक समाज और उद्योगों को मिलकर तत्काल और समन्वित प्रयास करने होंगे। यदि समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह मौन आपदा भविष्य में और भी विनाशकारी रूप ले सकती है।

NewG Network

contact@newgindia.com

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

न्यूज़लेटर के लिए सब्सक्राइब करें

कैटेगरीज़

हम वह खबरची हैं, जो खबरों के साथ खबरों की भी खबर रखते हैं। हम NewG हैं, जहां खबर बिना शोरगुल के है। यहां news, without noise लिखी-कही जाती है। विचार हममें भरपूर है, लेकिन विचारधारा से कोई खास इत्तेफाक नहीं। बात हम वही करते हैं, जो सही है। जो सत्य से परामुख है, वह हमें स्वीकार नहीं। यही हमारा अनुशासन है, साधन और साध्य भी। अंगद पांव इसी पर जमा रखे हैं। डिगना एकदम भी गवारा नहीं। ब्रीफ में यही हमारा about us है।

©2025 NewG India. All rights reserved.