नई दिल्ली: बिहार के गयाजी अंतरराष्ट्रीय हवाईअड्डे का कोड ‘GAY’ अब एक बड़े विवाद का कारण बन गया है, जिसने LGBTQ समुदाय और राजनेताओं के बीच बहस छेड़ दी है। बीजेपी सांसद डॉ. भीम सिंह ने इसे ‘अपमानजनक’ करार देते हुए बदलने की मांग की है, जबकि LGBTQ एक्टिविस्टों का कहना है कि यह बयान पूर्वाग्रह से ग्रसित है और सांसद को इसके लिए माफी मांगनी चाहिए। यह घटना भाषा, पहचान और सम्मान के अधिकार पर चल रही बहस को फिर से सामने लाई है।
सांसद ने कोड को ‘अपमानजनक’ बताया
बीजेपी सांसद डॉ. भीम सिंह ने मंगलवार को राज्यसभा में एक अतारांकित प्रश्न के माध्यम से गयाजी एयरपोर्ट के कोड ‘GAY’ को बदलने की मांग की। उन्होंने अपने तर्क में कहा कि अंग्रेजी शब्द ‘GAY’ को सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अपमानजनक और असहज माना जाता है। उनका मानना है कि यह कोड लोगों को असहज करता है, इसलिए इसे बदला जाना चाहिए।
केंद्रीय मंत्री ने नियमों का हवाला दिया
सांसद की मांग पर केंद्रीय नागर विमानन राज्य मंत्री मुरलीधर मोहोल ने जवाब दिया। उन्होंने स्पष्ट किया कि एयरपोर्ट कोड IATA द्वारा तय किए जाते हैं और ये स्थायी होते हैं। मोहोल ने बताया कि इन कोड्स को केवल कुछ विशेष परिस्थितियों में ही बदला जा सकता है, जैसे कि सुरक्षा संबंधी गंभीर कारण होने पर। उन्होंने यह भी बताया कि एयर इंडिया ने पहले भी इस कोड को बदलने का अनुरोध किया था, लेकिन IATA ने अपने नियमों का हवाला देते हुए इसे बदलने से इनकार कर दिया था। इस पर डॉ. भीम सिंह ने दोबारा कहा कि IATA से एक विशेष अनुरोध करके कोड में बदलाव कराया जाए।
LGBTQ एक्टिविस्ट्स ने की माफी की मांग
सांसद के इस बयान से LGBTQ समुदाय में नाराजगी है। LGBTQ एक्टिविस्ट्स ने डॉ. भीम सिंह के बयान को पूर्वाग्रह से ग्रसित बताया है और उनसे माफी मांगने की मांग की है। अरविंद नारायण, एक LGBTQ एक्टिविस्ट, ने 2018 के सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक फैसले का हवाला दिया। इस फैसले में समलैंगिक संबंधों को अपराधमुक्त किया गया था और ऐसे लोगों के सम्मान के अधिकार को मान्यता दी गई थी। उन्होंने कहा कि सांसद को अपनी जानकारी बढ़ाने की जरूरत है और उन्हें समझना चाहिए कि शासन व्यक्तिगत नैतिकता के बजाय संवैधानिक नैतिकता पर आधारित होता है। एक अन्य एक्टिविस्ट, राजेश श्रीनिवास, ने एयरपोर्ट कोड में किसी भी बदलाव की जरूरत को खारिज कर दिया। उन्होंने कहा कि इस शब्द में सांस्कृतिक रूप से कुछ भी गलत नहीं है और इसे बदलने की कोई आवश्यकता नहीं है। यह विवाद एक बार फिर से भाषा, संस्कृति और LGBTQ समुदाय के अधिकारों के बीच की बहस को सामने लेकर आया है।



