नई दिल्ली: उत्तराखंड के धराली कस्बे (Dharali incident) में 5 अगस्त को आई भयानक तबाही ने एक बार फिर साबित कर दिया कि हिमालय की नाजुक संरचना के साथ खिलवाड़ कितना महंगा पड़ सकता है। यह इलाका खीर गंगा नदी की लाई हुई मिट्टी पर बसा है, जहां पहले भी कई बार बाढ़ और भूस्खलन जैसी घटनाएं हो चुकी हैं। लेकिन दुख की बात यह है कि इस हादसे के सबक सीखने की बजाय, पड़ोसी हर्षिल घाटी में एक और बड़ी आपदा की वैज्ञानिकों की साफ चेतावनी को दरकिनार किया जा रहा है। अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले दिनों में और बड़ा संकट खड़ा हो सकता है।
धराली: एक फटने को तैयार टाइम बम जैसा
धराली हादसे के बाद सोशल मीडिया पर वरिष्ठ भू-विशेषज्ञ प्रोफेसर नवीन जुयाल का दो साल पुराना वीडियो तेजी से फैला, जिसमें उन्होंने साफ कहा था कि यह इलाका एक टाइम बम पर टिका है, जो कभी भी विस्फोट कर सकता है। उनके मुताबिक, हिमालयी नदियों की प्राकृतिक व्यवस्था को समझे बिना की गई छेड़छाड़ ही ऐसी घटनाओं की जड़ है। वीडियो में उन्होंने हर्षिल में सड़क चौड़ी करने के लिए हजारों पेड़ काटने की योजना पर भी उंगली उठाई। झाला-जांगला इलाके के जंगल हिमस्खलन की मिट्टी पर उगे हैं, और ये पेड़ न सिर्फ बर्फीले तूफानों को रोकते हैं, बल्कि अपनी जड़ों से ढलान को मजबूत रखते हैं। अगर इन्हें काटा गया, तो पूरा पहाड़ अस्थिर हो जाएगा, और नतीजा विनाशकारी होगा।
सड़क चौड़ीकरण का प्रोजेक्ट: क्या है पूरा मामला?
यह योजना केंद्र सरकार की महत्वपूर्ण ‘ऑल वेदर रोड’ परियोजना का हिस्सा है, जिसका मकसद साल भर सुगम यात्रा सुनिश्चित करना है। पर्यावरणीय असर की जांच के लिए सुप्रीम कोर्ट ने पर्यावरण विशेषज्ञ रवि चोपड़ा की अगुवाई में एक उच्च स्तरीय समिति गठित की थी, जिसमें प्रोफेसर जुयाल भी शामिल थे। समिति ने हर्षिल घाटी में देवदार के जंगलों को बचाने की सलाह दी, लेकिन सामरिक जरूरतों का हवाला देकर अदालत ने पेड़ काटने की इजाजत दे दी। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, कुल 6,800 पेड़ों पर खतरा मंडरा रहा है।
बॉर्डर रोड ऑर्गनाइजेशन (बीआरओ) के एक अफसर ने नाम गोपनीय रखते हुए बताया कि गंगोत्री से उत्तरकाशी तक की सड़क को पांच हिस्सों में बांटा गया है: गंगोत्री से झाला, झाला से सुक्की टॉप को बाइपास करते हुए गंगनानी, गंगनानी से हिना, हिना से तेकला (नेताला के डूबते इलाके को छोड़कर), और तेकला से बड़ेथी चुंगी तक। इनमें से तीन हिस्सों को पहले ही मंजूरी मिल चुकी है। गंगोत्री से भैरों घाटी तक सड़क पहले से चौड़ी है, इसलिए वहां कोई पेड़ नहीं कटेंगे। लेकिन भैरों घाटी से झाला ब्रिज तक बड़े पैमाने पर कटाई होगी।
कम कटाई का वादा, ट्रांसप्लांटेशन का प्लान
बीआरओ अफसर ने जोर देकर कहा कि पेड़ों की कटाई न्यूनतम रखी जाएगी। वन विभाग ने हर पांच किलोमीटर पर दोबारा सर्वे का आदेश दिया है, ताकि जरूरत से ज्यादा न काटा जाए। अभी 6,800 पेड़ों पर निशान लगे हैं, लेकिन असल संख्या कम हो सकती है। इनमें ज्यादातर 10-20 सेंटीमीटर मोटाई वाले युवा पेड़ हैं। योजना है कि छोटे पेड़ों को दूसरी जगह ट्रांसप्लांट किया जाए। वन अधिकारियों का दावा है कि बड़े पेड़ों की जीवित रहने की दर 25 प्रतिशत होती है, जबकि छोटों की ज्यादा।
पेड़ ही रोकते हैं हिमस्खलन का कहर
दो साल पहले प्रोफेसर जुयाल ने हर्षिल का दौरा किया और अपने यूट्यूब चैनल पर वीडियो डाला, जो अब वायरल है। उन्होंने कहा, झाला-जांगला के बीच 6 किलोमीटर स्ट्रेच में ट्रैफिक बहुत है, और यहां 6,000 से ज्यादा पेड़ काटने की बात है। हम देख रहे हैं कि क्या बिना इन्हें छुए सड़क चौड़ी हो सकती है।” उन्होंने उत्तर की ओर ढलान पर ध्यान दिलाया, जहां पत्थर हिमस्खलन का कचरा हैं। सर्दियों में यहां बर्फीले तूफान आम है, लेकिन पेड़ इन्हें रोकते हैं।
हिमालय में हर निर्माण पर रोक लगे: विशेषज्ञों की राय
सिक्किम यूनिवर्सिटी के भू-विशेषज्ञ डॉ. विक्रम गुप्ता, जो पहले वाडिया इंस्टीट्यूट में काम कर चुके हैं, प्रोफेसर जुयाल से पूरी तरह सहमत हैं। वे कहते हैं कि सिर्फ पेड़ कटाई पर नहीं, बल्कि हिमालय में हर तरह के निर्माण- जैसे बांध, सुरंगें, पुल और नई सड़कें- पर पूरी रोक लगनी चाहिए। उनके 2022 के अध्ययन में पाया गया कि उत्तराखंड का आधा से ज्यादा हिस्सा भूस्खलन के हाई रिस्क जोन में है, और मानवीय दखल ने स्थिति और बिगाड़ी है।
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एलिवेटेड रोड का विकल्प: संभव या नामुमकिन?
प्रोफेसर जुयाल समझते हैं कि चीन सीमा के चलते चौड़ी सड़कें जरूरी हैं, लेकिन वे सुझाते हैं कि नदी की तरफ एलिवेटेड कॉरिडोर बनाकर पेड़ बचाए जा सकते हैं। इससे ढलान को छेड़े बिना काम हो जाएगा। लेकिन बीआरओ अफसर इससे इत्तेफाक नहीं रखते। उनका कहना है कि 90-100 मीटर ऊंचा पुल बनाना व्यावहारिक नहीं, और ऐसा कोई प्रस्ताव नहीं आया। एक समय मुखबा वाली पहाड़ी से सड़क जोड़ने का आइडिया आया था, लेकिन वहां 9-10 भूस्खलन जोन हैं, जबकि मौजूदा रूट ज्यादा सुरक्षित है।



