नई दिल्ली: राजधानी के घने प्रदूषण को धोने की कोशिश में क्लाउड सीडिंग का दांव उल्टा पड़ गया। IIT कानपुर के विशेषज्ञों ने साफ लफ्जों में कहा कि बादलों में नमी का लेवल इतना कम था कि कृत्रिम बारिश पैदा करने का प्लान रद्द करना पड़ा। लेकिन इस नाकामी के बीच एक सकारात्मक पहलू निकला है, प्रयोग से मिले आंकड़ों ने भविष्य के लिए कई उपयोगी सबक दिए हैं। विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों के मुताबिक, 28 अक्टूबर को शुरू होने वाला यह टेस्ट रन नमी की कमी (केवल 15-20%) की वजह से अधर में लटक गया। क्लाउड सीडिंग जैसी विधि मौसम की सटीक स्थितियों पर टिकी होती है, जहां बादल भारी और नम होने चाहिए। फिर भी, दिल्ली के विभिन्न कोनों में लगे सेंसरों ने हवा की गुणवत्ता में छोटे-मोटे बदलाव कैद किए। डेटा बता रहा है कि PM2.5 और PM10 जैसे प्रदूषक कणों में 6-10% की गिरावट आई, जो साबित करता है कि कम नमी वाले हालात में भी यह तरीका हवा साफ करने में थोड़ी मदद कर सकता है।
ये निष्कर्ष आगे की राह दिखाएंगे
IIT के बयान में जोर दिया गया कि ऐसे ट्रायल से मिली जानकारियां आने वाले प्रयासों को मजबूत बनाएंगी। इससे पता चलता है कि कब और कैसे इस तकनीक को सबसे बेहतर इस्तेमाल किया जाए। कुल मिलाकर, यह एक सीखने का मौका है, जो प्रदूषण से जूझती दिल्ली के लिए उम्मीद की किरण जगा सकता है। क्लाउड सीडिंग क्या है? सरल शब्दों में, यह मौसम को आर्टिफिशियल तरीके से झटका देने की कवायद है। इसमें हवाई जहाज या ग्राउंड मशीनों से सिल्वर आयोडाइड, नमक के कण या छोटी बर्फ के टुकड़े बादलों में डाले जाते हैं, ताकि वे बारिश के रूप में बरसें। दुनिया भर में यह सूखे को हरा करने, फसलें बचाने और पानी की तंगी मिटाने के लिए आजमाई जाती है।
वैश्विक मिसालें: जहां यह चमत्कार कर चुकी है
देखिए, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) में तो क्लाउड सीडिंग को रेगिस्तानी गर्मी से निपटने का हथियार बनाया गया है। वहां बारिश बढ़ाने और तापमान कंट्रोल करने के लिए सालाना सैकड़ों उड़ानें भरी जाती हैं। चीन में नदियां और बांध भरने के लिए यह रूटीन हो गया है, जबकि अमेरिका के कैलिफोर्निया और टेक्सास जैसे इलाकों में सूखे की मार से बचाव के लिए इसका सहारा लिया जाता है। लेकिन भारत में फोकस अब हवा की जहरीली परत को चीरने पर है। कई एक्सपर्ट्स को इसमें शक है, उनका मानना है कि यह प्राकृतिक बारिश की जगह नहीं ले सकती। असर बादलों की मोटाई, हवा की दिशा और नमी पर निर्भर करता है। ऊपर से, सिल्वर आयोडाइड जैसे केमिकल्स का पर्यावरण पर असर, दूर के इलाकों में बारिश की रुकावट और नैतिक सवाल भी बहस का विषय बने हुए हैं।
भारत में 60 साल पुरानी कोशिश: शुरुआती प्रयोग से आज तक
देश में बादल बीज बोने की कहानी 1950 के आखिर से शुरू हुई। भारतीय मौसम विभाग (IMD) ने दिल्ली के आसपास टेस्टिंग की, जहां मानसून के दिनों में नमक के कणों से बारिश उकसाने की कोशिश हुई। 1960 के एक स्टडी में पाया गया कि नमी और हवा की ऊंचाई वाली स्थितियों में ही यह कामयाब होती है। 1964 के एक कंट्रोल्ड एक्सपेरिमेंट ने दिखाया कि सीडिंग वाले जोन में बारिश का झुकाव तो बढ़ा, लेकिन आंकड़े पक्के सबूत न दे सके। 1970s में यह ऑपरेशनल लेवल पर पहुंचा। उत्तर-पूर्व के रिहंद बेसिन में 1973 के टेस्ट से 17% ज्यादा बारिश हुई, हालांकि वैज्ञानिकों ने इसे ‘सशर्त सफल’ ही कहा। आजादी के बाद से ये प्रयास जारी हैं, लेकिन प्रदूषण कंट्रोल के लिए यह पहली बड़ी कोशिश है।
चुनौतियां: नीति और पर्यावरण के जाल में फंसी तकनीक
वैज्ञानिक जर्नल्स जैसे एटमॉस्फेरिक रिसर्च में छपी रिपोर्ट्स चेतावनी देती हैं कि एक जगह बारिश बढ़ाने से पड़ोसी इलाके सूख सकते हैं, इसे ‘डाउनविंड इफेक्ट’ कहते हैं। पर्यावरण संस्थानों की सलाह है कि इससे पहले जनता से बातचीत और मॉनिटरिंग जरूरी। वरना, पानी के बंटवारे और मौसम के बैलेंस पर बवाल मच सकता है।



