नई दिल्ली: डल झील, जो कश्मीर की खूबसूरती का प्रतीक है, को अतिक्रमण से बचाने के लिए इसके चारों ओर बफर जोन बनाए गए हैं। नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) के निर्देश पर गठित संयुक्त समिति ने 28 अक्टूबर 2024 को डल और नागिन झील का दौरा कर स्थिति का जायजा लिया। समिति ने पाया कि झील और इसकी सहायक नहरें नैयादार और जोगीलंकर प्रदूषण के कारण ऑक्सीजन-रहित हो रही हैं, जहां जैविक प्रदूषण का स्तर 23.5 मिलीग्राम प्रति लीटर तक पहुंच चुका है। जम्मू-कश्मीर लेक कंजर्वेशन एंड मैनेजमेंट अथॉरिटी (एलसीएमए) इस संकट से निपटने के लिए कई कदम उठा रही है।
सीवेज प्रबंधन की नई रणनीति
एलसीएमए ने झील के उत्तरी किनारे पर ऑक्सिडेशन तालाब बनाए हैं, जो प्रतिदिन 8-10 मिलियन लीटर गंदे पानी को प्राकृतिक तरीके से शुद्ध करते हैं। यह अस्थायी व्यवस्था भविष्य में गुप्तगंगा में बनने वाले 30 एमएलडी क्षमता के सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट (एसटीपी) से जुड़ेगी, जिसकी लागत 305 करोड़ रुपये है। इसके अलावा, 18 नगर निगम वार्डों से रोजाना उत्पन्न होने वाले 52.4 मिलियन लीटर सीवेज को ब्रारी-नंबल, हजरतबल और अन्य एसटीपी में शुद्ध किया जा रहा है। पायलट प्रोजेक्ट के तहत 100 बायोडाइजेस्टर्स भी लगाए गए हैं, जो गंदे पानी को झील में जाने से रोकते हैं।
हाउसबोट्स से सीवेज का समाधान
डल झील में मौजूद 617 हाउसबोट्स से निकलने वाले सीवेज के लिए 9.9 करोड़ रुपये की परियोजना शुरू की गई है। इनमें से 570 हाउसबोट्स को वैज्ञानिक सीवेज नेटवर्क से जोड़ा जा चुका है। शेष 47 हाउसबोट्स के मालिकों को नोटिस जारी कर निर्देश दिए गए हैं कि वे या तो सीवर लाइन से जुड़ें या मॉड्यूलर एसटीपी स्थापित करें। हाउसबोट्स को 11 क्लस्टर्स में बांटा गया है, जहां संप-कम-पंपिंग स्टेशन के जरिए सीवेज को मुख्य लाइन तक पहुंचाया जाता है।
आगे की राह
एलसीएमए की कोशिशें डल झील को प्रदूषण और अतिक्रमण से मुक्त करने की दिशा में महत्वपूर्ण हैं। अमृत 2.0 के तहत नए एसटीपी का निर्माण और तकनीकी मूल्यांकन प्रगति पर है। ये प्रयास न केवल झील की पारिस्थितिकी को बचाएंगे, बल्कि कश्मीर की सांस्कृतिक और पर्यावरणीय धरोहर को भी संरक्षित करेंगे।



