पटना: बिहार विधानसभा चुनाव जैसे-जैसे नजदीक आ रहे हैं, वैसे-वैसे सियासी गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म होता जा रहा है। एनडीए गठबंधन जहां एक ओर लगातार अपनी चुनावी रणनीति को धार दे रहा है, वहीं अब अंदरखाने से बड़ी खबर सामने आई है। सूत्रों के मुताबिक, इस बार एमएलसी कोटे से बार-बार मंत्री बनने वाले नेताओं का पत्ता साफ हो सकता है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के पटना दौरे और बीजेपी-जेडीयू की संयुक्त बैठकों के बाद यह रणनीति लगभग तय मानी जा रही है कि ऐसे नेताओं को टिकट देने की बजाय सीधे चुनाव मैदान में नए चेहरों को मौका दिया जाएगा।
किन नेताओं पर मंडरा रहा खतरा?
अशोक चौधरी (जेडीयू) –
बरबीघा से विधायक रह चुके हैं लेकिन 2010 के बाद से लगातार चुनाव हारते रहे। 2014 में कांग्रेस कोटे से एमएलसी बने, बाद में जेडीयू में शामिल होकर 2021 में फिर से एमएलसी चुने गए। लगातार हार की वजह से अब पार्टी उन्हें विधानसभा चुनाव से दूर रख सकती है।
जनक चमार (भाजपा) –
2014 में गोपालगंज लोकसभा सीट से सांसद चुने गए, लेकिन 2019 में टिकट नहीं मिला। 2021 में एमएलसी बने। रविदास समाज से आते हैं, लेकिन इस बार उन्हें भी दरकिनार किए जाने की चर्चा तेज है।
मंगल पांडे (भाजपा) –
स्वास्थ्य मंत्री और संगठन में बेहद मजबूत, लेकिन अब तक कभी भी सीधे विधानसभा या लोकसभा चुनाव नहीं लड़े। ब्राह्मण समाज में पकड़ रखते हैं। चर्चा है कि इस बार उन्हें भी एमएलसी कोटे से नहीं, बल्कि सीधे चुनावी मैदान में उतारा जा सकता है।
संतोष सुमन (हिंदुस्तानी अवाम मोर्चा) –
पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बेटे हैं। 2015 में चुनाव लड़े लेकिन हार गए। बाद में एमएलसी बनाए गए। इस बार इनका भी पत्ता कट सकता है।
सम्राट चौधरी (भाजपा, डिप्टी सीएम) –
2000 से 2010 तक विधायक रहे और फिर राजनीति में उतार-चढ़ाव का सामना करने के बाद दोबारा भाजपा के टिकट से सत्ता में लौटे। वर्तमान में डिप्टी सीएम हैं। खबर है कि पार्टी उन्हें भी इस बार सीधे विधानसभा चुनाव लड़वा सकती है।
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कांग्रेस और राजद में भी हलचल
यह सिर्फ एनडीए तक सीमित नहीं है। महागठबंधन के अंदर भी कई एमएलसी नेताओं का पत्ता कटने की चर्चा है।
राबड़ी देवी (राजद) –
1997 से 2005 तक बिहार की मुख्यमंत्री रहीं। चुनावी हार के बाद पार्टी ने उन्हें एमएलसी बनाकर सक्रिय रखा। लेकिन इस बार उन्हें भी चुनावी राजनीति से दूर रखने की चर्चा है।
अब्दुल बारी सिद्दीकी (राजद) –
1977 में पहली बार विधायक बने और लंबे समय तक लालू यादव के बाद पार्टी के बड़े नेताओं में गिने जाते रहे। हाल के चुनावों में हार के बाद 2024 में एमएलसी बनाए गए। अब इन्हें भी किनारे करने की तैयारी है।
कुल मिलाकर, बिहार विधानसभा चुनाव इस बार बेहद दिलचस्प होने वाला है। कई दिग्गज नेताओं का टिकट कट सकता है, वहीं नए और युवा चेहरों के लिए राजनीति में बड़ी एंट्री का दरवाज़ा खुल सकता है।



