पटना: अक्टूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या हो गयी थी। उधर बिहार में जनता पार्टी की सरकार से लोग उब चुके थे। 1985 में नौवीं विधानसभा चुनाव होने थे। इस बार कांग्रेस के पक्ष में सहानुभूति लहर भी जबरदस्त थी। मार्च में हुए चुनाव में कई बार से पूर्ण बहुमत के लिए तरस रही कांग्रेस को 196 सीटें मिली, जो बहुमत के लिए जरूरी 163 से ज्यादा थीं। पूर्ण बहुमत के बावजूद पांच साल तक कांग्रेस अंदरूनी कलह का शिकार बनी रही। यहीं से कांग्रेस का बिहार में पतन शुरू हो गया और आज तक कभी उभर नहीं पायी। लालू यादव लोक दल का नेतृत्व कर रहे थे और उनकी पार्टी ने 46 सीटें पाकर विपक्ष की भूमिका निभायी। उन्होंने जनता की मन को टटोल लिया और अगले चुनाव में सीएम की कुर्सी तक पहुंच गये। 39.30 प्रतिशत वोट शेयर के साथ सभी 323 सीटों पर चुनाव लड़कर 196 सीटों पर जीत दर्ज करने वाली कांग्रेस के केन्द्रीय नेतृत्व को पांच साल में चार मुख्यमंत्री बदलने पड़े। पांच साल तक केंद्रीय नेतृत्व को बिहार में अंदरूनी कलह को दूर करते-करते समय निकल गये। जनता में आक्रोश बढ़ता जा रहा था और छात्र राजनीति से निकले अनेक नेताओं में से एक लालू प्रसाद ने इस समय की पहचान की और जनता की रूझान को अपने तरफ मोड़ने में कामयाब रहे।
1985 में ही लालू का शुरु हो गया था उभार
1985 में कांग्रेस को कुल 9,558,562 वोट मिले थे। वहीं लोकदल ने अपने 261 उम्मीदवार खड़े किये थे और वह 46 सीटों पर जीत दर्ज की थी। उसे कुल वोट 3,573,173 मत मिले, जो कुल मत पड़े मत का 14.69 प्रतिशत था। वहीं जनसंघ से नया रूप धारण कर चुकी भाजपा ने 234 सीटों पर चुनाव लड़कर 16 सीटों पर जीत हासिल किया था। इसके कुल 1,833,275 मत मिले थे, जो कुल पड़े मत का 7.54 प्रतिशत था। जनता पार्टी ने 13 सीट, भाकपा ने 12 सीट, झारखंड मुक्ति मोर्चा ने नौ सीट जीते थे। वहीं निर्दलीय 29 उम्मीदवारों ने जीत हासिल की थी। इसी विधानसभा में नीतिश कुमार ने भी हरनौत विधानसभा से चुनाव जीता था। इसके बाद वे हमेशा विधान परिषद से विधायक बनते रहे।
पूर्ण बहुमत के बावजूद पांच साल तक अंदरूनी कलह में उलझी रही कांग्रेस
1985 में कांग्रेस ने बिंदेश्वरी दुबे को बिहार का मुख्यमंत्री बनाया था। वे 12 मार्च 185 से 13 फरवरी 1988 तक सीएम की कुर्सी पर रहे। इसके बाद अंदरूनी कलह तेज होने पर भागवत झा 1 साल 24 दिन, फिर सत्येन्द्र नारायण सिन्हा 270 दिन, फिर जगन्नाथ मिश्र 94 दिन मुख्यमंत्री रहे। आपात काल के समय छात्र आंदोलन में भूमिका निभा चुके शंभु राय का कहना है कि लालू प्रसाद यादव हमेशा से समय की पहचान करने में आगे थे। उन्होंने समय को पहचान लिया था। यदि इंदिरा गांधी की हत्या नहीं हुई होती तो 1985 में भी सरकार की पुनर्वापसी नहीं होती।
समाजशास्त्री ने कहा, दलित व पिछड़ों के मन को समझने में कामयाब रहे लालू

समाजशास्त्री डाक्टर विकास का कहना है कि 1980 के बाद ही पिछड़ी और दलित जाति में चेतना काफी जागृत हो चुकी थी। वे अपने वर्ग के नेता को गद्दी पर बैठाने के लिए उतावले थे। इसकी पहचान लालू प्रसाद यादव ने की और उन्होंने भूराबाल (भूमिहार, राजपुत, ब्राह्मण और लाला) साफ करो का नारा दिया। इससे दलित वर्ग और पिछड़े वर्ग को ऐसा लगा कि लालू उनके अधिकारों की रक्षा करने के लिए सबसे ज्यादा उपयुक्त हैं।
पाटलीपुत्र विवि के प्राध्यापक ने कहा

पाटलीपुत्र विवि पटना के सहायक प्राध्यापक डा. विकास कुमार का कहना है कि आपात काल ही कांग्रेस का काल बना और वहीं से कांग्रेस का पतन शुरू हो गया। उसके बाद संपूर्ण क्रांति के कारण युवाओं का जत्था कांग्रेस से भग गया। फिर युवा वर्ग कभी कांग्रेस की ओर नहीं मुड़ा। लालू की शैली बिहार के आमजन की शैली थी। इससे लोगों का अपनत्व का एहसास हुआ और उनसे लोग जुड़ते चले गये।
वीपी सिंह की आंधी में उड़ गयी कांग्रेस
1989 में वी.पी. सिंह की लहर में पूरे देश में मिली जीत के बाद 1990 में बिहार का चुनाव हुआ, जिसमें जनता दल ने निर्णायक बढ़त हासिल की और पिछले चुनाव में 196 सीटों पर जीत हासिल करने वाली कांग्रेस 71 सीटों पर आकर सिमट गयी। इस चुनाव में भाजपा की भी दोगुना से ज्यादा सीट बढ़ गयी। पिछले चुनाव में भाजपा ने 16 सीटें जीती थी, वहीं 1990 में उसे 39 सीटें मिली। 122 सीटे पाने वाले जनता दल के नेता के रूप में लालू प्रसाद यादव ने मुख्यमंत्री पद की शपथ ली और यहीं से बिहार में कांग्रेस की स्थिति दयनीय हो गयी, जो आज तक कभी उभर नहीं पायी।
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फिर वैशाखी पर चलने को हो गयी मजबूर
इसके बाद के कांग्रेस की स्थिति पर गौर करें तो 1990 में 71 सीट पाने वाली कांग्रेस ने 1995 में 320 सीटों पर लड़कर मात्र 29 सीटों पर सिमट गयी। इसके बाद लगातार कांग्रेस दूसरे का सहारा लेने को मजबूर हो गयी और सिमटती चली गयी।



