Himachal High Court का बड़ा फैसला: धारा 163-ए असंवैधानिक

Court ने राज्य में सरकारी जमीन पर बढ़ते अतिक्रमण को गंभीरता से लिया है। कोर्ट ने निर्देश दिया है कि वह उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और ओडिशा की तर्ज पर आपराधिक अतिक्रमण से निपटने के लिए अपने कानूनों में संशोधन करे।

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नई दिल्ली: हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय (Himachal High Court) ने सरकारी जमीन पर अतिक्रमण को लेकर सख्त रुख अपनाते हुए हिमाचल प्रदेश भू-राजस्व अधिनियम, 1954 की धारा 163-ए को असंवैधानिक करार दिया है। यह धारा राज्य सरकार को अवैध कब्जों को नियमित करने की शक्ति प्रदान करती थी। 5 अगस्त 2025 को न्यायमूर्ति विवेक सिंह ठाकुर और न्यायमूर्ति बिपिन चंदर नेगी की खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि यह धारा मनमानी और संविधान के खिलाफ है, इसलिए इसे और इसके तहत बने सभी नियमों को रद्द किया जाता है।

अतिक्रमण हटाने का सख्त आदेश

अदालत ने राज्य में सरकारी जमीन पर बढ़ते अतिक्रमण को गंभीरता से लेते हुए सरकार को निर्देश दिया कि वह उत्तर प्रदेश, कर्नाटक और ओडिशा की तर्ज पर आपराधिक अतिक्रमण से निपटने के लिए कानून में संशोधन करे। कोर्ट ने सभी सरकारी जमीनों से अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया शुरू करने और इसे 28 फरवरी 2026 तक पूरा करने का आदेश दिया। इसके साथ ही, अतिक्रमण हटाने के खिलाफ पहले दिए गए सभी स्थगन आदेशों को अमान्य घोषित कर दिया गया है। चाहे वे आदेश 2017 के ड्राफ्ट नियमों या अन्य नियमितीकरण नीतियों के आधार पर दिए गए हों, वे अब प्रभावी नहीं होंगे। अदालत ने 8 जनवरी 2015 के अपने फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सरकारी जमीन, भवनों, सड़कों आदि पर अतिक्रमण हटाने के लिए उसी आदेश का पालन होगा।

नगर निकायों पर जिम्मेदारी

हाईकोर्ट ने हिमाचल सरकार को नगर पंचायत, नगर परिषद और नगर निगम के अधिकारियों की जिम्मेदारी तय करने के लिए कानून में संशोधन करने का निर्देश दिया। इन अधिकारियों को अतिक्रमण की जानकारी देना और उसे हटाने की कार्रवाई करना अनिवार्य होगा। ऐसा न करने पर उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकेगी। इसके अलावा, कोर्ट ने भू-राजस्व अधिनियम की धारा 163 से वह प्रावधान हटाने की सलाह दी, जो लंबे समय तक कब्जे (एडवर्स पजेशन) के आधार पर अतिक्रमणकारी को मालिकाना हक का दावा करने की अनुमति देता है।

एडवर्स पजेशन का दावा खारिज

अदालत ने स्पष्ट किया कि जिन मामलों में सड़क या सार्वजनिक उपयोग के लिए जमीन अधिग्रहित की गई हो और उसका कब्जा सरकार या अदालत को सौंप दिया गया हो, लेकिन पूर्व मालिक ने उसे खाली नहीं किया या दोबारा कब्जा कर लिया, तो ऐसे मामलों में एडवर्स पजेशन का दावा मान्य नहीं होगा। ऐसे अतिक्रमणकारियों को न केवल जमीन खाली करनी होगी, बल्कि अतिक्रमण हटाने की लागत, जमीन के उपयोग का किराया और उससे प्राप्त लाभ की भरपाई भी करनी होगी। कोर्ट ने एडवोकेट जनरल को आदेश दिया कि इस फैसले की प्रति मुख्य सचिव और सभी संबंधित अधिकारियों को भेजी जाए ताकि इसका तुरंत पालन सुनिश्चित हो। साथ ही, जिन राजस्व अधिकारियों के क्षेत्र में अतिक्रमण हुआ, उनके खिलाफ भी कार्रवाई की जाए।

मुल्लापेरियार बांध पर सुप्रीम कोर्ट का निर्देश

31 जुलाई 2025 को सुप्रीम कोर्ट में मुल्लापेरियार बांध के बेबी डैम को मजबूत करने के लिए 23 पेड़ काटने की अनुमति पर चर्चा हुई। तमिलनाडु सरकार ने बताया कि यह हिस्सा पेरियार टाइगर रिजर्व में है, और केरल सरकार ने इसके लिए पहले ही मंजूरी दे दी है। न्यायमूर्ति सूर्यकांत, दीपांकर दत्ता और एन कोटिश्वर सिंह की पीठ ने केंद्र सरकार को केरल की अनुमति की पुष्टि करने और पर्यावरणीय मंजूरी की प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया। कोर्ट को यह भी बताया गया कि डैम की ग्राउटिंग से पहले एक रिमोटली ऑपरेटेड व्हीकल स्टडी जरूरी है, जैसा कि पर्यवेक्षण समिति ने सुझाया है। इस स्टडी के बाद ही मरम्मत का काम शुरू होगा। सुप्रीम कोर्ट ने वल्लकाडाव घाट रोड की मरम्मत सितंबर-अक्टूबर 2025 में पूरी करने का आदेश दिया, जब मानसून का प्रभाव कम होगा। इस मामले की अगली सुनवाई 12 नवंबर 2025 को होगी।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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