भागलपुर: बिहार के भागलपुर का सिल्क उद्योग, जिसे “सिल्क सिटी” के नाम से जाना जाता है, इन दिनों अमेरिकी टैरिफ की मार से जूझ रहा है। अमेरिकी सरकार द्वारा कपड़ों पर लगाए गए 50% टैरिफ ने इस ऐतिहासिक कारोबार को गहरे संकट में डाल दिया है। करोड़ों रुपये का तैयार माल गोदामों में डंप पड़ा है, ऑर्डर रद्द हो रहे हैं, और बुनकरों के सामने रोजी-रोटी का संकट मंडरा रहा है। भागलपुर के तसर, कटिया, मटका, और घिचा सिल्क की मांग अमेरिका में रेडीमेड गारमेंट्स और फर्निशिंग आइटम्स के लिए थी, लेकिन अब यह कारोबार ठप होने की कगार पर है।
नाथनगर के बुनकरों की पीड़ा
नाथनगर के चंपानगर तांती बाजार के बुनकर हेमंत कुमार की आवाज में निराशा साफ झलकती है। वे बताते हैं, “आजादी के बाद से ही यहां की स्थिति दयनीय होती जा रही है। 1980 के बाद तो पलायन और बढ़ गया। अब अमेरिकी टैरिफ ने हमें और मुश्किल में डाल दिया।” उनके गोदाम में सवा करोड़ का माल पड़ा है, जिसे बड़े कारोबारी उठाने से मना कर चुके हैं। हेमंत कहते हैं, “हमारा माल महाजनों के जरिए बड़े कारोबारियों तक पहुंचता था, जो अमेरिका और अन्य देशों को जाता था। लेकिन अब ऑर्डर रुक गए हैं।”
संकट की जड़: 50% टैरिफ ने बढ़ाई लागत
बुनकर आलोक कुमार बताते हैं कि रूस-यूक्रेन युद्ध और बांग्लादेश सीमा बंद होने से पहले ही सिल्क कारोबार मंदा था। अब अमेरिकी टैरिफ ने स्थिति को और बदतर कर दिया। वे कहते हैं, “80-90 लाख का माल गोदाम में पड़ा है। पहले हम 10 रुपये का कपड़ा भेजते थे, जो अब टैरिफ के कारण 15 रुपये का हो गया। अमेरिका में अब वहां का कपड़ा ही सस्ता हो गया है।” आलोक का कहना है कि बड़े ऑर्डर रद्द होने से बुनकरों का भविष्य अंधेरे में है।
सिल्क कारोबारी भी परेशान
सिल्क कारोबारी संजीव कुमार बताते हैं कि भागलपुर का सिल्क इतना मशहूर था कि इसे “अमेरिका मेल” के नाम से जाना जाता था। शर्ट, शाल, और साड़ियों की अमेरिका में अच्छी खपत थी, लेकिन टैरिफ ने सब बदल दिया। वे कहते हैं, “पहले 7 लाख 20 हजार का माल बिना टैक्स के अमेरिका जाता था, जो वहां सस्ता पड़ता था। अब 50% टैरिफ ने लागत डेढ़ गुना बढ़ा दी। मेरा करोड़ों का माल फंसा है।” नाथनगर में दर्जनों कारोबारियों के पास 5 से 8 करोड़ का माल डंप पड़ा है।
कोरोना और अंतरराष्ट्रीय संकटों ने बढ़ाई मुश्किलें
कारोबारी तहसील सबाब के मुताबिक, कोरोना से पहले अमेरिका के साथ 200 करोड़ का सालाना कारोबार था, जो बाद में घटकर 50 करोड़ रह गया। अब टैरिफ ने इसे पूरी तरह ठप कर दिया। वे कहते हैं, “रूस-यूक्रेन युद्ध, भारत-पाक तनाव, और हवाई मार्ग बाधित होने से कारोबार पहले ही प्रभावित था। अब टैरिफ ने आखिरी कील ठोक दी।” बिहार बुनकर कल्याण समिति के पूर्व सदस्य अलीम अंसारी का अनुमान है कि जिले में 75-80 करोड़ का माल गोदामों में फंसा है।
बुनकरों और कारीगरों पर बेरोजगारी का साया
पुरैनी बुनकर समिति के अध्यक्ष अफजल आलम बताते हैं कि अमेरिका से मटका सिल्क के फर्निशिंग आइटम्स की मांग थी, लेकिन पिछले एक महीने से कोई शिपमेंट नहीं गया। इससे न केवल बुनकर, बल्कि रंगाई, प्रिंटिंग, और पैकिंग से जुड़े कारीगर भी बेरोजगारी की कगार पर हैं। पहले विदेशी व्यापारी भागलपुर आकर कपड़ा खरीदते थे, लेकिन हवाई सेवाएं बंद होने से यह सिलसिला भी रुक गया।
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क्या है रास्ता
भागलपुर के सिल्क कारोबार को बचाने के लिए विशेषज्ञ वैकल्पिक बाजारों की तलाश की सलाह दे रहे हैं। यूरोप, मध्य पूर्व, और खाड़ी देशों में निर्यात बढ़ाने की जरूरत है। साथ ही, सरकार से राहत पैकेज और सब्सिडी की मांग जोर पकड़ रही है। लेकिन जब तक ठोस कदम नहीं उठाए जाते, भागलपुर की सिल्क विरासत और बुनकरों की आजीविका खतरे में रहेगी।



