उत्तराखंड में भालू का कहर: ‘देखते ही गोली’ का फरमान

पौड़ी गढ़वाल के थलीसैंण ब्लॉक में पैठाणी गांव भालू के हमलों का एपिसेंटर बन चुका है। यहां 40 मवेशी तो भालू की भेंट चढ़ चुके हैं, ऊपर से दो स्थानीयों को गंभीर चोटें भी लगीं। रातें कालिमा से भरी हैं, लोग घरों से बाहर निकलने से कतरा रहे हैं, मानो पूरे इलाके पर अनकहा कर्फ्यू लगा हो।

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नई दिल्ली। हिमालय की गोद में बसे उत्तराखंड के जंगलों से अब भालुओं का आतंक आम हो चला है। राज्य वन विभाग ने पहली बार किसी भालू को ‘आदमखोर’ करार देकर उसे तुरंत शूट करने की मंजूरी दे दी है। वजह? लगातार बढ़ते हमलों ने ग्रामीण इलाकों को दहशत में डाल दिया है, और विशेषज्ञों का मानना है कि जलवायु परिवर्तन इसका बड़ा दोषी है। गर्म होती सर्दियां भालुओं की प्राकृतिक नींद के चक्र को तोड़ रही हैं, जिससे वे भूखे और चिड़चिड़े होकर इंसानी बस्तियों की ओर लपक रहे हैं। सिर्फ तीन महीनों में 71 ऐसी घटनाएं दर्ज हो चुकी हैं, जिनमें छह ग्रामीणों की जानें गईं और 60 से ज्यादा मवेशी शिकार बने।

पैठाणी का खौफनाक मंजर: पूरा गांव कैदखाने में

पौड़ी गढ़वाल के थलीसैंण ब्लॉक में पैठाणी गांव भालू के हमलों का एपिसेंटर बन चुका है। यहां 40 मवेशी तो भालू की भेंट चढ़ चुके हैं, ऊपर से दो स्थानीयों को गंभीर चोटें भी लगीं। रातें कालिमा से भरी हैं, लोग घरों से बाहर निकलने से कतरा रहे हैं, मानो पूरे इलाके पर अनकहा कर्फ्यू लगा हो। वन विभाग ने अब हथियारबंद गार्ड तैनात कर दिए हैं, साथ ही ट्रैप्स और कैमरे भी लगाए गए हैं। लेकिन चुनौती बड़ी है: कैमरा फुटेज में एक नहीं, बल्कि कई भालू नजर आ रहे हैं, जिससे असली खतरे वाले की पहचान मुश्किल हो रही। डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर अभिमन्यु सिंह बताते हैं, चीफ वाइल्डलाइफ वॉर्डन के सख्त निर्देश हैं कि 14 नवंबर तक समस्या सुलझानी थी, लेकिन अब ट्रैंक्वलाइजर डार्ट्स से पकड़ने की कोशिश तेज हो गई है। पैठाणी की तरह ही रुद्रप्रयाग के जखोली ब्लॉक में धारकुड़ी गांव ने दर्द भुगता। घास काटने जंगल गईं सात महिलाओं पर भालू ने धावा बोल दिया, सब घायल हो गईं। गोपेश्वर, नैनीताल, पिथौरागढ़ और भवाली जैसे पर्यटन स्पॉट्स के आसपास भी भालू की सैरबारी बढ़ गई है, रातों में कचरा डंप पर उनकी मौजूदगी आम हो चली।

अनोखा फैसला: देशभर में पहली बार ‘शूट ऑन साइट’

वन्यजीव विशेषज्ञ यादवेंद्र देव झाला इसे भारत का पहला ऐसा केस बताते हैं। “पहले कभी भालुओं के लिए ‘देखते ही मारो’ वाला ऑर्डर नहीं आया। यह उत्तराखंड का ऐतिहासिक कदम है, जो मानव-वन्यजीव टकराव की गहराई दिखाता है,” वे कहते हैं। वाइल्डलाइफ प्रोटेक्शन एक्ट में प्रावधान है कि अंतिम उपाय के तौर पर एलिमिनेशन की इजाजत मिल सकती है, लेकिन यहां सर्किट्स ने इसे हरी झंडी दे दी।

ग्लोबल वार्मिंग का काला साया: क्यों बौखला रहे भालू?

वाइल्डलाइफ इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के डॉ. एस. सत्यकुमार मानते हैं कि हिमालय में बर्फीली सर्दियों का घटना भालुओं के हाइबरनेशन को छोटा कर रहा है। एशियाटिक ब्लैक बियर जो कश्मीर से अरुणाचल तक फैला है। पहले कड़ाके की ठंड में महीनों सो जाते थे, ताकि भोजन की किल्लत झेल सकें। लेकिन अब कम बर्फबारी से तापमान ऊंचा रहता है, भोजन जंगल में कम पड़ रहा है, और इंसानी कचरा आसान शिकार बन रहा। गोपेश्वर या अल्मोड़ा के 4-5 किमी दायरे में रातें भालूओं के लिए फीडिंग टाइम हो गई हैं। ऊपरी हिमालयी इलाकों में भी ये अब हाइबरनेट नहीं कर पा रहे, क्योंकि गर्मी ने सब बदल दिया। जॉय हुकिल जैसे विशेषज्ञ आबादी बूम को भी जिम्मेदार ठहराते हैं। उत्तराखंड में भालूओं की संख्या तेंदुओं या बाघों जितनी ही तेजी से बढ़ रही है। पैठाणी के ट्रैप्स में चार-पांच अलग भालू दिखे-सभी सर्दी की तैयारी में भोजन जुटा रहे। जंगलों में बेरी-फल जैसे पारंपरिक फूड सोर्स घटे हैं, खासकर भमोर फल। रिजर्व फॉरेस्ट्स से सटे गांवों में जगह और संसाधनों की मारामारी से टकराव चरम पर है। भालू सर्दियों से पहले वसा जमा करने के लिए आक्रामक हो जाते हैं, शिकार को मौके पर खाते हैं, फिर मांद में उगलकर स्टोर करते। लेकिन अब ग्रामीणों का चारा लाना भी उन्हें भड़का रहा।

आंकड़ों की मार्मिक कहानी: 25 सालों का खौफ

विभाग के रिकॉर्ड्स रोंगटे खड़े कर देते हैं। 2000 से 2025 तक भालुओं ने 1972 लोगों पर हमला बोला, 68 की जान ली। 2022: 57 घायल, 1 मौत। 2023: 53 घायल। 2024: 65 हमले, 3 मौतें। और 2025? अभी तक 71 घटनाएं, 7 जिंदगियां लील लीं। समस्या सिर्फ ‘खतरनाक जानवर’ नहीं-बढ़ती पॉपुलेशन, सिकुड़ते जंगल और क्लाइमेट शिफ्ट का घातक कॉकटेल है।

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रास्ता क्या? जागरूकता और संतुलन जरूरी

सिंह जैसे अधिकारी कहते हैं, फल-फूलों की कमी पर स्टडीज चल रही हैं। लेकिन तात्कालिक राहत के लिए एलिमिनेशन ही विकल्प बचा। समाधान? कम्युनिटीज को कचरा मैनेजमेंट सिखाना, फॉरेस्ट रिस्टोरेशन और क्लाइमेट एक्शन। हुकिल जोर देते हैं, यह द्वंद्व संसाधनों की लड़ाई है। भालू को खलनायक न बनाएं, बल्कि इंसानी दखल को कंट्रोल करें।

पौड़ी गढ़वाल के थलीसैंण ब्लॉक में पैठाणी गांव भालू के हमलों का एपिसेंटर बन चुका है। यहां 40 मवेशी तो भालू की भेंट चढ़ चुके हैं, ऊपर से दो स्थानीयों को गंभीर चोटें भी लगीं। रातें कालिमा से भरी हैं, लोग घरों से बाहर निकलने से कतरा रहे हैं, मानो पूरे इलाके पर अनकहा कर्फ्यू लगा हो।

Pooja Thakur

pt37557@gmail.com

मीडिया की दुनिया में पिछले 3 सालों से सक्रिय। वर्तमान में Newg India में बतौर कंटेंट राइटर और मल्टीमीडिया प्रोड्यूसर काम कर रही हूं, जहां हर कहानी को एक नए नजरिए से पेश करने की कोशिश करती हूं।

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