नई दिल्ली। विश्व एड्स दिवस के अवसर पर विशेषज्ञों ने एचआईवी संक्रमण को अब एक प्रबंधनीय स्वास्थ्य समस्या के रूप में चित्रित किया है। उन्नत दवाओं और समयबद्ध उपचार प्रोटोकॉल के दम पर मां से नवजात शिशु तक वायरस संक्रमण का जोखिम लगभग न के बराबर रह गया है। स्वास्थ्य मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार, पिछले पांच सालों में चिकित्सा तकनीकों के विकास ने वायरल लोड को न्यूनतम स्तर तक नियंत्रित कर लिया है, जिससे गर्भावस्था के दौरान बच्चे को संक्रमण फैलने की आशंका नगण्य हो चुकी है। इसके साथ ही, 2017 के एचआईवी-एड्स (संरक्षण और रोकथाम) कानून ने संक्रमित व्यक्तियों को सामाजिक कलंक से मुक्ति दिलाई है, जिससे वे सामान्य जीवन जीने में सक्षम हो पाए हैं।
राम मनोहर लोहिया अस्पताल के एआरटी केंद्र के वरिष्ठ चिकित्सा अधिकारी डॉ. अतुल आनंद ने बताया कि पहले जहां एड्स को एक घातक और कलंकित रोग माना जाता था, जो पीड़ितों को अलग-थलग कर देता था, वहीं आज जागरूकता अभियानों और मुफ्त एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (एआरटी) की उपलब्धता ने परिदृश्य बदल दिया है। संक्रमित महिलाएं अब सुरक्षित प्रसव कर रही हैं, और उनके बच्चे जन्म के समय ही नकारात्मक रिपोर्ट पा रहे हैं। “हमारी क्लिनिक में करीब 5,000 रोगी मुफ्त दवाओं का लाभ उठा रहे हैं। पहले मां से बच्चे को संक्रमण की दर 35-40 फीसदी तक थी, लेकिन अब आधुनिक प्रोटोकॉल से इसे जीरो के करीब ला दिया गया है।
उपचार में क्रांति: शुरुआती हस्तक्षेप से वायरस पर काबू
विशेषज्ञों के मुताबिक, एचआईवी की पुष्टि होते ही तत्काल इलाज आरंभ करने की नई नीति ने रोगियों की इम्यून सिस्टम को मजबूत बनाया है। पुराने समय में उपचार सीडी4 काउंट 350-500 तक गिरने पर शुरू होता था, लेकिन अब संक्रमण की पहचान के साथ ही दवाएं दी जाती हैं। इससे टीबी, फंगल इंफेक्शन और अन्य जटिलताओं का खतरा 70 फीसदी तक कम हो गया है। नई पीढ़ी की दवाओं के साइड इफेक्ट भी न्यूनतम हैं, और शुरुआती चरण में तीन महीनों के अंदर वायरस के प्रसार को पूरी तरह रोका जा सकता है। “यह बदलाव न केवल वर्तमान पीढ़ी को सुरक्षित कर रहा है, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों में एड्स के प्रसार को जड़ से समाप्त करने की दिशा में एक मील का पत्थर है,” कहते हैं एक प्रमुख महामारी विशेषज्ञ।
जागरूकता का जादू: संक्रमण दर में भारी गिरावट
लोगों में बढ़ती सतर्कता ने एचआईवी मामलों को नियंत्रित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। सुरक्षित संभोग, कंडोम का उपयोग, नियमित स्क्रीनिंग और चिकित्सा उपकरणों की नसबंदी जैसे उपायों से नई संक्रमणों की संख्या में उल्लेखनीय कमी आई है। स्वास्थ्य संगठनों के अनुसार, ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में जागरूकता शिविरों ने लाखों लोगों तक पहुंच बनाई है, जिससे रोगी अब खुलकर इलाज करा रहे हैं। नियमित जांच और दवा अनुपालन से एचआईवी अब एक सामान्य क्रॉनिक कंडीशन बन गया है, जो कैंसर या डायबिटीज की तरह प्रबंध्य है, एक स्वास्थ्य कार्यकर्ता ने टिप्पणी की।
संभावित जटिलताएं और बचाव के उपाय
हालांकि प्रगति उल्लेखनीय है, एचआईवी पीड़ितों को अवसरवादी बीमारियों से सावधान रहना पड़ता है। इनमें निमोनिया, मेनिन्जाइटिस, कैंडिडिआसिस, टोक्सोप्लाजमोसिस और कापोसी सार्कोमा जैसे कैंसर शामिल हैं। इसके अलावा, साइटोमेगालो वायरस संक्रमण और मस्तिष्क संबंधी विकार भी जोखिम पैदा कर सकते हैं। विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि समय पर निगरानी और स्वस्थ आदतें अपनाकर इन जोखिमों को कम किया जा सकता है। बचाव के लिए सुझावों में शामिल हैं:-
- धूम्रपान और शराब से पूर्ण परहेज।
- दैनिक योग और शारीरिक गतिविधियां।
- निर्धारित दवाओं का कड़ाई से पालन।
- संरक्षित यौन संबंध बनाए रखना।
- पौष्टिक भोजन और संतुलित जीवनशैली।
एड्स के प्रमुख प्रसार स्रोतों में संक्रमित सुइयों का साझा उपयोग, असुरक्षित यौन संपर्क, मां से शिशु संक्रमण, दूषित अंग प्रत्यारोपण और गंदे चिकित्सा उपकरण प्रमुख हैं। इनसे बचाव ही सर्वोत्तम उपाय है।
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2017 अधिनियम: संक्रमितों के अधिकारों का कवच
भारत सरकार द्वारा 10 सितंबर 2018 से लागू एचआईवी और एड्स (प्रिवेंशन एंड कंट्रोल) एक्ट ने पीड़ितों को मजबूत कानूनी ढाल प्रदान की है। यह कानून भेदभाव और सामाजिक बहिष्कार को प्रतिबंधित करता है, साथ ही मुफ्त जांच, उपचार और शिकायत निवारण तंत्र सुनिश्चित करता है। अधिनियम के प्रभाव से हजारों प्रभावितों ने अपनी आवाज बुलंद की है, और इलाज पहुंच में वृद्धि हुई है। विश्व एड्स दिवस इस प्रगति को रेखांकित करता है, जहां वैश्विक स्तर पर लाखों जिंदगियां बचाई जा रही हैं। भारत जैसे विकासशील देश में यह सफलता आशा की किरण है, जो बताती है कि विज्ञान और संवेदनशीलता मिलकर असंभव को संभव बना सकते हैं।



