नयी दिल्ली: जब Cyrus Poonawalla ने Raja Ravi Varma की एक पेंटिंग 167 करोड़ रुपये में खरीदी, तो आम लोगों के लिए यह सिर्फ शौक और शान की खबर थी। लेकिन निवेश सलाहकारों के लिए यह एक बड़ी वित्तीय रणनीति का हिस्सा है। आज के दौर में महंगी पेंटिंग्स सिर्फ कला नहीं, बल्कि टैक्स बचत, निवेश और पीढ़ियों तक संपत्ति ट्रांसफर करने का एक मजबूत माध्यम बन चुकी हैं।
आर्ट अब सिर्फ शौक नहीं, फाइनेंशियल टूल
धनी लोग अब पेंटिंग को सिर्फ सजावट के तौर पर नहीं देखते, बल्कि इसे एक मजबूत “फाइनेंशियल इंस्ट्रूमेंट” मानते हैं। इससे उन्हें पोर्टफोलियो डाइवर्सिफिकेशन, एसेट प्रोटेक्शन और लंबी अवधि में वैल्यू बढ़ाने का फायदा मिलता है।
फ्रीपोर्ट्स: टैक्स बचाने का बड़ा तरीका
दुनिया के कई अमीर निवेशक अपनी महंगी कलाकृतियों को Freeport में रखते हैं। ये जिनेवा, सिंगापुर और लक्ज़मबर्ग जैसे शहरों में बने हाई-सिक्योरिटी वेयरहाउस होते हैं।
यहां खास बात यह है कि पेंटिंग देश में “एंटर” ही नहीं करती, लेकिन उसकी खरीद-बिक्री कई बार हो सकती है—और अक्सर टैक्स भी नहीं लगता।
भारत में आर्ट बना ‘कैपिटल एसेट’
भारतीय टैक्स कानून के अनुसार पेंटिंग और मूर्तियां अब “कैपिटल एसेट” मानी जाती हैं। अगर इन्हें 24 महीने से ज्यादा समय तक रखा जाए, तो लॉन्ग टर्म कैपिटल गेन पर सिर्फ 12.5% टैक्स लगता है, जो कई अन्य निवेश विकल्पों से कम है।
पीढ़ियों में आसान ट्रांसफर
आर्ट का एक बड़ा फायदा यह है कि इसे परिवार के सदस्यों को गिफ्ट करने पर कोई टैक्स नहीं लगता। इस तरह यह संपत्ति को एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक आसानी से पहुंचाने का जरिया बन जाती है।
शेयर बाजार जैसा उतार-चढ़ाव नहीं
आर्ट मार्केट शेयर बाजार की तरह रोज ऊपर-नीचे नहीं होता। इसकी वैल्यू कलाकार की प्रतिष्ठा, दुर्लभता (rarity) और इतिहास (provenance) पर निर्भर करती है। यही कारण है कि यह एक “लो-वोलाटाइल” और अलग तरह का निवेश माना जाता है।
धीमा लेकिन मजबूत रिटर्न
आर्ट में तुरंत पैसा नहीं मिलता। इसे बेचने में महीनों या सालों लग सकते हैं। लेकिन जो निवेशक लंबी अवधि के लिए निवेश करते हैं, उन्हें अक्सर अच्छा रिटर्न मिलता है।
कला के साथ ‘स्टेटस और पहचान’
महंगी पेंटिंग सिर्फ पैसा नहीं, बल्कि सामाजिक प्रतिष्ठा और सांस्कृतिक पहचान भी देती है। यह दिखाती है कि निवेशक की पसंद, समझ और विरासत कैसी है।
भारतीय आर्ट मार्केट का बढ़ता आकर्षण
पिछले कुछ वर्षों में भारतीय कला बाजार तेजी से बढ़ा है। आधुनिक और समकालीन भारतीय कलाकारों की पेंटिंग्स की अंतरराष्ट्रीय मांग बढ़ी है। निवेशक 5–10 साल में इनसे अच्छा मुनाफा कमा रहे हैं।
निवेश से बढ़कर ‘वेल्थ एक्सप्रेशन’
आज आर्ट खरीदना सिर्फ निवेश नहीं, बल्कि अपनी संपत्ति और व्यक्तित्व को दर्शाने का तरीका भी बन गया है। कई लोग इसे “साइलेंट वेल्थ” यानी बिना दिखावे के अपनी अमीरी दिखाने का माध्यम मानते हैं।



