नई दिल्ली। विधानसभा अध्यक्ष विजेंद्र गुप्ता ने बताया कि आज से ठीक एक सौ आठ वर्ष पूर्व 28 अप्रैल 1918 को इसी चैम्बर में, जहाँ आज हम एवं आप दिल्ली की जनता के प्रतिनिधि के रूप में बैठे हैं, तत्कालीन वायसराय लॉर्ड चेम्सफोर्ड ने दिनांक 27, 28 एवं 29 अप्रैल, 1918 को एक ऐतिहासिक युद्ध-सम्मेलन का आयोजन किया था। इस सम्मेलन में देशभर से लगभग 120 प्रतिनिधि एकत्रित हुए थे, राजवाड़ों के शासक, प्रांतों के प्रतिनिधि एवं राष्ट्रीय नेता। विषय था ।
प्रथम विश्वयुद्ध में भारत की भूमिका
विजेंद्र गुप्ता ने बताया कि इस सम्मेलन का महत्व केवल इतना नहीं था कि यहाँ से भारतीय सैनिकों की भर्ती का आह्वान हुआ था बल्कि यह भी था कि महात्मा गांधी स्वयं इस सम्मेलन में उपस्थित थे और उन्होंने साम्राज्य के प्रति भारत के पूर्ण सहयोग का समर्थन किया था, इस विश्वास के साथ कि युद्ध में भारत की निष्ठा का पुरस्कार स्वराज के रूप में मिलेगा। परन्तु इतिहास गवाह है यह विश्वास छला गया। लगभग तेरह लाख भारतीय सैनिकों ने प्रथम विश्वयुद्ध में साम्राज्य की ओर से मोर्चा संभाला । फ्लैंडर्स के खूनी मैदानों से लेकर गैलीपोली एवं मेसोपोटामिया तक। चौहत्तर हजार से अधिक भारतीय वीरों ने पराए देशों की मिट्टी में अपना रक्त सींचा। परन्तु कृतज्ञता के पुरस्कार के स्थान पर इसी सदन से भारत को मिला रॉलेट एक्ट एवं जलियाँवाला बाग का नरसंहार।
दिल्ली विधानसभा भारत के संसदीय इतिहास का जन्मस्थल है
विस अध्यक्ष के अनुसार, यह सदन जिसमें हम आज बैठे हैं , 1912 में निर्मित, ई. मोन्टेग्यू थॉमस द्वारा संरचित इस ऐतिहासिक पुराना सचिवालय , केवल ईंट और पत्थर का ढाँचा नहीं है, बल्कि यह भारत के संसदीय इतिहास का जन्मस्थल है। 27 जनवरी 1913 को इसी चैम्बर में पहली बार केंद्रीय विधायी परिषद की बैठक हुई थी। गोपाल कृष्ण गोखले, विपिन चन्द्र पाल, पंडित मदन मोहन मालवीय, लाला लाजपत राय, विट्ठलभाई पटेल जैसे महान व्यक्तित्वों ने इन्हीं दीवारों के बीच अपनी वाणी गूंजाई।
75,000 अनाम भारतीय सैनिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की
अतः यह स्मरण करना हमारा कर्तव्य है, आज तक उन 75,000 अनाम भारतीय सैनिकों का, जिन्होंने दूसरों की लड़ाई में अपने प्राण न्यौछावर किए और जिन्हें इतिहास ने बहुत देर तक भुलाये रखा। एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में हम उन्हें अपनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं।
साथ ही, यह स्मरण करना भी हमारा कर्तव्य है कि इस सदन की विरासत कितनी गहरी है। जिन दीवारों ने एक समय साम्राज्यवादी वायसराय की वाणी सुनी थी, वही दीवारें आज स्वतंत्र भारत की जनता के चुने हुए प्रतिनिधियों की गूंज सुन रही हैं। यह परिवर्तन , यह यात्रा , यही हमारे स्वतंत्रता संग्राम की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
युद्ध सम्मेलन की 108 वीं वर्षगांठ पर संगोष्ठी
इस संदर्भ में 30 अप्रैल, 2026, वृहस्पतिवार, अपराह्न 3.30 बजे दिल्ली विधानसभा परिसर में युद्ध सम्मेलन की 108 वीं वर्षगांठ के अवसर पर एक संगोष्ठी का आयोजन किया गया है । इस आयोजन में जनरल वी. के. सिंह, राज्यपाल, मिजोरम, मुख्य अतिथि एवं मुख्य वक्ता होंगे । इस अवसर पर युद्ध सम्मेलन की अक्षरश: कार्यवाही की पुस्तक का विमोचन भी जनरल वी. के. सिंह, राज्यपाल, मिजोरम करेंगे।



