प्रतिशोध की चिंगारी से निकला नारा…बेचो सोना, लोहा खरीदो

जिस रणवीर सेना ने प्रतिशोध की चिंगारी से निकले इस नारे पर हुंकार भरी, उसके लोग पहले दिन से इस बात को लेकर सतर्क दिखे कि कहीं उनको जाति विशेष का समूह न घोषित कर दिया जाए। तभी इसका पहला अध्यक्ष क्षत्रिय बना। बावजूद इसके रणवीर सेना का प्रभुत्व भूमिहारों के हाथ रहा। 'बिहार राज: आतंक के ढाई दशक' सीरीज के दूसरे अंक में रणवीर सेना के विस्तार और उसके सांगठनिक ढांचे का विश्लेषण है। वरिष्ठ पत्रकार उपेंद्र नाथ राय की विशेष रिपोर्ट....

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पटना: माओवाद के खिलाफ केंद्र सरकार का मौजूदा अभियान और उसके मनोनुकूल नतीजों ने साबित किया है कि सरकार चाह ले तो किसी भी स्तर के हिंसक प्रतिरोध को दबाया जा सकता है। साबित इससे यह भी होता है कि लोकतंत्र में बगैर राजनीतिक संरक्षण के कोई गुंडा, माफिया दिनों-दिन तरक्की नहीं कर सकता। उसको घुटने टेकने ही पड़ते हैं। या संभावना इस बात की भी बनती है कि राजनीतिक संरक्षण न मिलते हुए भी सरकार की दिलचस्पी हिंसक प्रतिरोध के खात्मे की न हो।

कुछ-कुछ यही हालात आज से तीन दशक पहले के बिहार में थे। रणवीर सेना और माले की भिड़ंत में कई क्रूर नरसंहार हुए। यह वही वक्त था कि ‘भूराबाल साफ करो’ का नारा बुलंद किया गया। उस वक्त प्रदेश में जनता दल की सरकार थी और मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव थे। यह नारा किसने और कब दिया, इस पर विवाद हो सकता है, आज राष्ट्रीय जनता दल के नेता इस नारे को गढ़ने में अपनी पार्टी या लालू प्रसाद यादव का कोई ताल्लुक होने से इंकार कर रहे हैं, लेकिन उस वक्त की सियासत को नजदीक से जानने वाले लोग बताते हैं कि जमीनी स्तर पर इसका शोर था। यह वही दौर था, जब वर्ग संघर्ष के नाम पर माले निचली जातियों में अपना जनाधार मजबूत कर चुका था। इस तरह के नारों ने माले के लोगों के हौसले और बुलंद कर दिये। तभी वह लहलहाती फसलों पर कब्जा पर लेते थे। विरोध में हिंसा आम थी।

इसी माहौल में ऊंची जातियों में यह धारणा घर करने लगी कि एकजुटता ही हिंसक हमलों की काट हो सकती है। अस्तित्वगत संकट के बीच से ही रणवीर सेना निकली। नामकरण से पहले ही अस्तित्व में आ चुकी रणवीर सेना का पांच जनवरी 1995 का गठन हुआ। हुआ यह कि बेलाउर गांव में बाबा रणवीर की पूजा होती थी। उनका मंदिर था। उन्हीं के मंदिर तक जाने के लिए बेलाउर में दलितों के साथ विवाद हुआ और उन्हीं के नाम पर रणवीर सेना का नाम पड़ा। यह कहानी पहले ही बतायी जा चुकी हैं। अब दूसरी किश्त में जानते हैं कि जिस संगठन में भूमिहारों का वर्चस्व था, उसके पहले अध्यक्ष क्षत्रिय रंग बहादुर कैसे बन गए?

इसी दौर में पलटी बिहार की सियासत

इसके लिए उस समय की राजनीति पर भी थोड़ा विचार कर लेना चाहिए। लालू प्रसाद यादव उस समय बिहार के मुख्यमंत्री थे। वह 10 मार्च 1990 में सीएम की कुर्सी पर बैठे। उन्होंने पिछड़ों की राजनीति की। इसी दौरान “भूराबाल” साफ करो का नारा भी बुलंद हुआ। इस नारे में जिन जातियों को सत्ता से हटा देने की बात थी, वह भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण और लाला (कायस्थ) थीं। वह पिछड़ी जातियों के समर्थक थे। माना जाता है कि बाद में जब रणवीर सेना की जमीन मजबूत हुई तो इसको जदयू व भाजपा के कुछ नेताओं के साथ ही ऊंची जाति के प्रशासनिक अधिकारियों ने इनको समर्थन दिया।

नामकरण और क्षत्रिय अध्यक्ष का नाम विस्मयकारी

जानकार बताते हैं कि इसी नारे की देन है कि रणवीर सेना का नामकरण, गठन और बिरादरी यह सब बहुत विस्मयकारी है। यह गौर करने वाली बात है कि बेलाउर में जिस रणवीर बाबा के नाम पर इसका नामकरण हुआ, वे खुद ही अपने जीवन में भोजपुर और डुमराव राज्य के खिलाफ युद्ध छेड़े हुए थे। इन दोनों जगहों पर राजपूत राजा ही हुआ करते थे।

बेलाउर गांव के रहने वाले मनीष चौधरी बताते हैं कि रणबीर बाबा हम लोगों के पूर्वज थे। मधुकर यादव उनके घनिष्ठ मित्र थे। उस समय क्षत्रियों का प्रभुत्व था। रणबीर बाबा सेना में थे। क्षत्रिय समाज के प्रभुत्व को दूर करने के लिए रणवीर बाबा ने अपने साथियों के साथ क्षत्रियों से युद्ध किया और उनके प्रभुत्व के लिए मरते दम तक लड़ते रहे। मधुकर यादव ने भी उनका आजीवन साथ दिया था।

1990 के दशक की हिंसा की आग नजदीकी खोपिया गांव भी पहुंची। वहां के मुखिया ब्रह्मेश्वर मुखिया थे। जब नामकरण की बात आयी तो स्वाभवत: अपने पूर्वज के नाम पर नामकरण होना था। एक युवक ने यह नाम सुझाया और सब उस पर सहमत हो गये। थोड़ी दिक्कत इस बात को लेकर थी कि रणवीर बाबा क्षत्रियों के खिलाफ युद्ध किये थे। इससे धारणा बनती कि इनके नाम की सेना क्षत्रिय विरोधी है। इससे बचने के लिए रणवीर सेना का पहला अध्यक्ष रंग बहादुर सिंह को बनाया गया। वह क्षत्रिय समाज के थे।

रंग बहादुर का निवास आरा जिले के जगदीशपुर ब्लॉक का इचरी गांव

इस सेना में भूमिहारों का ही वर्चस्व था। बेलाउर में नक्सलियों के साथ हुए संघर्ष में क्षत्रियों ने भी दिया था। बाद में नाम मात्र के क्षत्रिय और दूसरी सवर्ण जातियों के लोग संगठन से अवश्य जुड़े रहे, लेकिन कमान पूरी तरह भूमिहारों के हाथ में थी। फिर भी, बात पहले अध्यक्ष रंगबहादुर सिंह की। वह बिहार के आरा जिला स्थित जगदीशपुर ब्लॉक के इचरी गांव से थे। वह ऊंची जोत वाले व समृद्ध किसान थे। उनकी खेती लंबी चौड़ी थी। वह भी माले की हिंसक गतिविधियों से प्रताड़ित थे। बेलाउर में माले के खिलाफ संघर्ष के लिए वह भी आये थे और वहीं उन्हें अध्यक्ष बना दिया गया।

रंगबहादुर पहले अध्यक्ष भले थे, लेकिन खास अधिकार नहीं

माले और रणवीर सेना पर विशेष अध्ययन करने वाले पाटलिपुत्र विश्वविद्यालय के डॉ. विकास कुमार बताते हैं कि रंग बहादुर सिंह अध्यक्ष जरूर बने, लेकिन उनके पास खास अधिकार नहीं था। क्षत्रिय समाज से किसी को अध्यक्ष बनाकर भूमिहार समाज के लोग सरकार को यह संदेश देना चाहते थे कि यह सिर्फ एक बिरादरी का नहीं, सभी जमीदारों की एक सेना है, जो माले से लड़ने के लिए बनायी गयी है।

डॉ. विकास के मुताबिक, इससे शुरुआत में लालू सरकार भी भ्रमित रही, लेकिन माले के लोगों को कोई भ्रम नहीं था। माले के लोग शुरू से अंत तक कहते रहे कि यह सिर्फ भूमिहारों की सेना है। इसमें दूसरी बिरादरियों से बहुत कुछ लेना-देना नहीं है। डॉ. विकास का मानना है कि राजपूतों के खिलाफ रहे बाबा रणवीर के नाम पर बनी सेना का अध्यक्ष क्षत्रिय समाज से बनाने के पीछे यह संदेश भी देना था कि इसके संगठन में उस समाज की भी भूमिका है।

सेना के फाइटर थे भूमिहार-ब्राह्मण

इस सेना में जो भी लड़ाके थे, वह भूमिहार ब्राह्मण थे। इसके लिए कुछ लोग तो सेना की नौकरी छोड़कर भी आ गये थे। शुरुआत में रणवीर सेना में लाइसेंसी हथियार वालों को ही रखा गया, विस्तार के क्रम में इसमें अवैध हथियारों का जखीरा भी जमा होने लगा। याद दिला दें कि जिस वक्त रणवीर सेना बनी, उस वक्त भोजुपर के कई गांव माले ने किसानों के खिलाफ नाकेबंदी लगा रखी थी। इसमें करीब पांच हजार एकड़ जमीन परती पड़ी हुई थी।

स्थापना के बाद रणवीर सेना की अंचल, जिला और राज्य स्तर की कमेटियों का गठन किया गया। इसके संचालन के लिए बाकायदा संविधान था। इसका कोई उल्लंघन नहीं कर सकता था। सेना के अंदर एक पदानुक्रम भी स्थापित था। जमीनी स्तर पर सबसे सक्रिय अंचल कमांडर होता था। अंचल समिति के सदस्य आपस में सहमति के आधार अंचल कमांडर नियुक्त करते थे। आपसी सहमति न होने पर इनका चयन हर गांव के दो प्रतिनिधि करते थे। इन प्रतिनिधियों का चयन हर गांव वाले खुद करते थे। अंचल कमांडर मुख्य रूप से वह होता था, जो माओवादियों के हिटलिस्ट में होते थे। इस कारण उन्हें राज्य स्तर से खुली छूट होती थी कि वह नक्सल विरोधी गतिविधियों के लिए वह खुद योजना बनाएं और उसे अंजाम तक पहुंचाए।

अंचल से लेकर सेंट्रल कमेटी का था अपना संविधान

इसी तरह जिला स्तर के लिए हर अंचल से एक सदस्य और राज्य स्तर के लिए हर जिले से एक सदस्य चुना जाता था। इसके अलावा इसकी एक सेंट्रल कमेटी भी होती थी। कोई भी निर्णय औपचारिक रूप से लेने का नियम था। चाहे वह नरसंहार हो या किसी की हत्या। आत्मरक्षा के लिए की गयी कार्रवाई के लिए किसी की अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं होती थी, लेकिन बाद में इसकी जानकारी देनी जरूरी होती थी, जिससे किसी घटना की स्थिति में उस मामले से रणनीति बनाकर निपटा जा सके। जब भी कोई गुट बिना किसी अनुमति के ऐसी किसी घटना को अंजाम देता था तो उसके खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई भी होती थी।

हथियार बंद दस्ते को मिलता था मासिक वेतन

रणवीर सेना ने अपने हथियारबंद दस्ते को मासिक वेतन भी देना शुरू कर दिया था। जब भी दस्ते का कोई सदस्य मारा जाता तो उसके परिवार को यह मुआवजा भी देते थे। हर गांव से जब फसल कटती थी तो उसका एक छोटा हिस्सा उन्हें चंदा के रूप में रणवीर सेना को देना होता था। बिहार के सिस्टम में भी भूमिहार सबसे प्रभावशाली जाति थी। प्रशासन में भी भूमिहारों का बोलबाला था। इस कारण प्रशासन से लेकर राजनीति में बहुतों की रणवीर सेना के प्रति सहानुभूति थी। इससे रणवीर सेना को कभी भी पैसे की कमी नहीं हुई।

सेना ने दिया था नारा, सोना बेचो और लोहा खरीदो

रणवीर सेना ने तब एक नारा भी दिया था कि सोना बेचकर लोहा खरीदो। इसका अर्थ था अपने धन का उपयोग हथियार खरीदने में करो। जगदीश महतो का गांव इक्वारी इसका प्रमुख उदाहरण था। जगदीश ने जब भोजपुर में नक्सलवादी आंदोलन शुरु किया था तो सबसे पहले इक्वारी में ही एक-एक कर पांच सालों में 15 भूमिहारों की हत्या कराई। महतो की बाद में हत्या हो गयी, लेकिन इक्वारी की खूनी संघर्ष का सिलसिला देर तक चलता रहा।

बारह जिलों में रणवीर सेना की थी पूर्ण इकाई

रणवीर सेना का मुख्य केंद्र भोजपुर था। इसके अलावा दक्षिण बिहार का मगध और साहाबाद व अरवल इनका कार्य क्षेत्र था। इसी इलाके में माओवादियों की भी सक्रियता थी। उन्हीं के बीच रहकर उनके खिलाफ संघर्ष करना था। बाद में बिहार के 12 जिलों भोजपुर, बक्सर, पटना, रोहतास, सीवान, गया, गोपालगंज, मुजफ्फरपुर, सारण, जहानाबाद, औरंगाबाद, वैशाली में इसकी पूर्ण इकाई का गठन हुआ। इन जिलों में काफी सक्रियता रही। इसके अलावा भी बिहार के अन्य जिलों में माओवादियों के खिलाफ जमींदारों की सुरक्षा के लिए भी रणवीर सेना के लोग जाते थे।

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