नई दिल्ली: रोजाना सुबह उठते ही हम प्लास्टिक की बोतल से पानी पीते हैं, सोचते हैं कि ये सुविधा है, लेकिन क्या पता ये हमारी जान का दुश्मन बन चुकी हो? पंजाब के इंस्टीट्यूट ऑफ नैनो साइंस एंड टेक्नोलॉजी (INST) के एक्सपर्ट्स ने एक ऐसा स्टडी किया है, जो साबित करता है कि सिंगल-यूज PET बोतलों से रिसने वाले नैनोप्लास्टिक पार्टिकल्स हमारे शरीर की बुनियादी सिस्टम्स को चुपके से तबाह कर रहे हैं। ये पहली बार है जब भारत से निकला रिसर्च इतने साफ-साफ तरीके से बता रहा है कि ये माइक्रोस्कोपिक कण आंत, ब्लड और सेल्स को डायरेक्ट हिट कर रहे हैं। जर्नल ‘नैनोस्केल एडवांसेज’ में छपी इस रिपोर्ट ने पूरी दुनिया को झकझोर दिया है और हां, गूगल ट्रेंड्स पर ‘नैनोप्लास्टिक हेल्थ रिस्क’ सर्च टर्म्स 300% ऊपर चढ़ चुके हैं, खासकर भारत और यूरोप में।
अदृश्य दुश्मन जो हर कोने में घुस चुका है
कल्पना कीजिए, आपका फेवरेट मिनरल वॉटर, जो PET बोतल में आता है, वो न सिर्फ तरोताजा करता है बल्कि अंदर से जहर घोल रहा है। ये नैनोप्लास्टिक्स महज 50-850 नैनोमीटर साइज के इतने छोटे हैं कि आंखों से दिखते ही नहीं, लेकिन इतने घातक कि हवा, पानी, मिट्टी, यहां तक कि क्लाउड्स तक में फैल चुके हैं। हमारे खाने से लेकर सांस लेने तक, ये कण ब्लडस्ट्रीम में घुस जाते हैं और लिवर, किडनी, ब्रेन तक पहुंच जाते हैं। पहले के स्टडीज तो सिर्फ पर्यावरण पर फोकस्ड थे, लेकिन INST के साइंटिस्ट्स ने पहली दफा ह्यूमन बॉडी के अंदर के ड्रामा को कैमरे पर उतारा। उनका फोकस था। ये पार्टिकल्स हमारे गट माइक्रोबायोटा यानी पेट के अच्छे बैक्टीरिया को कैसे कमजोर बनाते हैं? ये बैक्टीरिया तो हमारी इम्यूनिटी, डाइजेशन, एनर्जी लेवल और यहां तक कि मूड को कंट्रोल करते हैं। अगर इन्हें ठेस पहुंचे, तो पूरा सिस्टम लड़खड़ा जाता है।
लैब में रचा गया ‘क्राइम सीन
टीम ने रियल-लाइफ सिमुलेशन किया: PET बोतलों को ग्राइंड करके नैनोप्लास्टिक्स निकाले, फिर इन्हें तीन क्रूशियल बॉडी सिस्टम्स पर टेस्ट किया। पहला टारगेट गट हेल्थ। उन्होंने लैक्टोबैसिलस रैम्नोसस जैसे बेनिफिशियल बैक्टीरिया को एक्सपोज किया। रिजल्ट? लॉन्ग-टर्म एक्सपोजर से बैक्टीरिया की ग्रोथ रुक गई, उनकी डिफेंस पावर डाउन हो गई, और स्ट्रेस हार्मोन बढ़ने से एंटीबायोटिक्स के प्रति सेंसिटिविटी चरम पर पहुंच गई। मतलब, एक छोटी-सी इन्फेक्शन भी घातक बन सकती है। दूसरा, ब्लड कम्पैटिबिलिटी चेक: रेड ब्लड सेल्स पर हाई डोज ने सेल मेम्ब्रेन को चीर दिया, शेप चेंज हो गया और हीमोलिसिस। यानी RBCs का फटना शुरू हो गया। ये तो खुला खतरा है हार्ट अटैक या एनीमिया का। तीसरा, जनरल सेल रिएक्शन के लिए ह्यूमन एपिथेलियल सेल्स (लंग्स जैसी) ली गईं। यहां डीएनए डैमेज, ऑक्सीडेटिव स्ट्रेस (फ्री रेडिकल्स का तांडव), सेल डेथ (एपोप्टोसिस), इन्फ्लेमेशन सिग्नल्स का उफान और मेटाबॉलिज्म में हेरफेर सब कुछ। Ames टेस्ट ने कन्फर्म किया कि ये पार्टिकल्स म्यूटेजेंस भी ट्रिगर कर सकते हैं, हालांकि डायरेक्ट नहीं। कुल मिलाकर, ये निष्क्रिय कचरा नहीं, बल्कि एक्टिव टॉक्सिन हैं जो चेन रिएक्शन शुरू कर देते हैं।
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स्टडी का बम-ब्लास्ट मैसेज: अब जागो, वरना पछताओगे
ये फाइंडिंग्स एक ही स्टोरी सुना रही हैं। हमारी डेली लाइफ की वो प्लास्टिक बोतलें बॉडी के अंदर घुसकर आंत को खोखला, ब्लड को कमजोर और सेल्स को विद्रोही बना रही हैं। नतीजा? क्रॉनिक इन्फ्लेमेशन से कैंसर, डायबिटीज, हार्ट डिजीज जैसी बीमारियां दस्तक दे सकती हैं। ये खतरा सिर्फ ह्यूमन हेल्थ तक नहीं रुकता है। फार्मिंग, फूड चेन और इकोसिस्टम को भी झटका लग रहा है। INST के लीड रिसर्चर डॉ. कहते हैं, ये वेक-अप कॉल है। प्लास्टिक पॉल्यूशन अब ग्लोबल हेल्थ क्राइसिस है। भारत में 2022 का सिंगल-यूज प्लास्टिक बैन तो सही दिशा में कदम था, लेकिन ये स्टडी चीख-चीखकर कह रही है: और सख्ती लाओ।
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