जैतून के पेड़ों से नहीं बनेगा साबुन: कैरब-अनार का अर्क लाया नई उम्मीद

स्पेन-पुर्तगाल के वैज्ञानिकों ने कैरोब की पत्तियों और अनार के छिलकों के अर्क से जैतून के खतरनाक एन्थ्रेक्नोज रोग को 35% तक कम कर दिखाया। यह पर्यावरण के लिए सुरक्षित और कचरे को खजाने में बदलने वाला नया हथियार है।

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नई दिल्ली: जैतून का फल जब पकने लगता है, तब अचानक उसकी सतह चिपचिपी और साबुन जैसी हो जाती है। किसान इसे “सोपी ऑलिव” कहते हैं। यह एन्थ्रेक्नोज नाम की फफूंद की वजह से होता है। फल सड़ने लगते हैं, समय से पहले झड़ जाते हैं और तेल की गुणवत्ता खराब हो जाती है। गंभीर मामलों में 60-80% तक फसल बर्बाद हो जाती है। अब तक इसका इलाज सिर्फ तांबे वाले केमिकल स्प्रे से होता था, लेकिन यूरोप में ये स्प्रे अब धीरे-धीरेा बंद हो रहे हैं क्योंकि ये मिट्टी और पानी को नुकसान पहुंचाते हैं।

कचरे से बना नया हथियार

स्पेन की यूनिवर्सिटी ऑफ कॉर्डोबा और पुर्तगाल के पॉलिटेक्निक इंस्टीट्यूट ऑफ ब्रागांसा के वैज्ञानिकों ने कुछ ऐसा कर दिखाया जो पहले किसी ने नहीं सोचा। उन्होंने कैरोब (खरनौब/लोकट) की पत्तियां और अनार के छिलके, जो अब तक फैक्ट्री का कचरा समझे जाते थे – से प्राकृतिक अर्क तैयार किया और जैतून के पेड़ों पर छिड़का।

फफूंद पर कैसे असर करता है यह अर्क?

यह फफूंद के बीजाणु बनने ही नहीं देते और बीजाणु अंकुरित नहीं कर पाते। ऐसे में फफूंद पौधे की सतह पर चिपक ही नहीं पाती। सबसे खास बात जैतून के पौधे की है कि वह अपनी रोग-प्रतिरोधक शक्ति जाग जाती है। कैरोब का अर्क पौधे में एंटीऑक्सीडेंट और फिनोलिक तत्व बढ़ा देता है, जिससे पौधा खुद फफूंद से लड़ने लगता है।

प्रयोगशाला में मिले शानदार नतीजे

वैज्ञानिकों ने जैतून के फल और पत्तियों पर परीक्षण किए। कैरोब के अर्क ने रोग की तीव्रता करीब 35% तक कम कर दी। तांबे वाले स्प्रे जितना तो नहीं, लेकिन बिना पर्यावरण को नुकसान पहुंचाए इतना असर बहुत बड़ी सफलता है।

कचरे को खजाना बनाने की मिसाल

अनार के छिलके और कैरोब की पत्तियां पहले कूड़े में फेंकी जाती थीं। अब इन्हीं से जैतून के पेड़ बच रहे हैं। इसे “बायो-सर्कुलर इकोनॉमी” कहते हैं यानी कचरे को दोबारा इस्तेमाल करके नया मूल्य पैदा करना। इससे न किसान को महंगे केमिकल खरीदने पड़ेंगे, न पर्यावरण को नुकसान होगा।

अब खेतों में असली परीक्षा

अभी तक यह सफलता प्रयोगशाला और ग्रीनहाउस में मिली है। अब वैज्ञानिक असली खेतों में परीक्षण करने जा रहे हैं। अगर वहां भी कामयाबी मिली तो जैतून उत्पादक देशों (स्पेन, इटली, ग्रीस, ट्यूनीशिया, मोरक्को, पुर्तगाल) में यह तकनीक तेजी से फैलेगी।

भारत के लिए भी खुशखबरी

भारत में भी राजस्थान में बड़े पैमाने पर जैतून की खेती शुरू हो चुकी है। यहां भी एन्थ्रेक्नोज की समस्या आने लगी है। कैरोब और अनार तो हमारे यहां भरपूर होते हैं। आने वाले दिनों में भारतीय किसान भी इस देसी-विदेशी नुस्खे का फायदा उठा सकते हैं। जैतून के पेड़ अब शायद साबुन बनना भूल जाएंगे।

Sakshi Pal

sakshipal8700@gmail.com

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