‘भूतिया’ कंगारू! …आस्ट्रेलिया में मिली विलुप्त प्रजाति

वॉयली देखने में एक बड़े चूहे जैसा लगता है, लेकिन इसका काम विशाल है। ये छोटे जीव सालाना टनों मिट्टी को उलट-पलट देते हैं, जिससे मिट्टी में नमी बनी रहती है।

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नई दिल्ली: ऑस्ट्रेलिया (Australia) की सूखी और रहस्यमयी भूमि के नीचे, सदियों से दबी हड्डियां अब एक अनोखी कहानी सुना रही हैं। ये हड्डियां एक छोटे से मार्सुपियल की हैं, जो कंगारू का करीबी रिश्तेदार है और जिसे ‘धरती का छोटा इंजीनियर’ कहा जाता है। यह जीव वॉयली या ब्रश-टेल्ड बेटॉन्ग के नाम से जाना जाता है, जो रात के अंधेरे में जंगलों में घूमता, मिट्टी खोदता और फंगस को फैलाता था। लेकिन अब वैज्ञानिकों ने इन हड्डियों से एक पूरी तरह नई प्रजाति की पहचान की है, जो दुर्भाग्य से पहले ही दुनिया से विदा हो चुकी है। इस खोज ने न सिर्फ जैव विविधता के रहस्यों को उजागर किया है, बल्कि संरक्षण के नए रास्ते भी खोले हैं।

वॉयली: जंगलों का गुमनाम हीरो

वॉयली देखने में एक बड़े चूहे जैसा लगता है, लेकिन इसका काम विशाल है। ये छोटे जीव सालाना टनों मिट्टी को उलट-पलट देते हैं, जिससे मिट्टी में नमी बनी रहती है, बीज उगते हैं और पूरा इकोसिस्टम जीवंत रहता है। कभी ये ऑस्ट्रेलिया के पश्चिमी हिस्सों में हर जगह मिलते थे, लेकिन यूरोपीय बसावट के साथ जंगलों की कटाई, विदेशी शिकारियों जैसे लोमड़ियों और बिल्लियों का आगमन, और बढ़ते शिकार ने इन्हें कगार पर ला खड़ा किया। आज वॉयली को गंभीर रूप से लुप्तप्राय घोषित किया जा चुका है, और ये सिर्फ कुछ संरक्षित इलाकों तक सिमट गए हैं।

गुफाओं से निकला सदियों पुराना रहस्य

यह खोज तब हुई जब कर्टिन यूनिवर्सिटी, वेस्टर्न ऑस्ट्रेलियन म्यूजियम और मर्डोक यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं ने नुलार्बोर प्लेन और दक्षिण-पश्चिम ऑस्ट्रेलिया की गुफाओं में खुदाई की। वहां मिली हजारों साल पुरानी हड्डियों का गहन विश्लेषण किया गया, खोपड़ियों की माप, दांतों की संरचना और हड्डियों की तुलना से। नतीजा चौंकाने वाला था: ये हड्डियां वॉयली की एक नई प्रजाति से जुड़ी थीं, जिसका नाम Bettongia haoucharae रखा गया। यह नाम दलाल हाउचार के सम्मान में दिया गया, जिन्होंने इस रिसर्च में महत्वपूर्ण योगदान दिया। लेकिन अफसोस, यह प्रजाति ‘भूतिया’ है, यानी यह पहले ही विलुप्त हो चुकी है, शायद मानवीय हस्तक्षेप के शुरुआती दौर में ही। जूटाक्सा जर्नल में प्रकाशित इस अध्ययन ने यह भी खुलासा किया कि मौजूदा वॉयली दरअसल दो अलग सबस्पीशीज में बंटे हैं: Bettongia ogilbyi sylvatica (जंगली वॉयली) और Bettongia ogilbyi ogilbyi (झाड़ीदार वॉयली)।

विलुप्ति का दर्दनाक सच

यह नई प्रजाति क्यों गायब हुई? शोधकर्ताओं का मानना है कि जलवायु परिवर्तन, निवास स्थलों का नुकसान और नए शिकारियों ने इसका अंत कर दिया। लेकिन इस खोज का मतलब सिर्फ एक खोए हुए जीव की कहानी नहीं है। इससे हमें समझ आता है कि ऑस्ट्रेलिया की जैव विविधता कितनी समृद्ध थी और कितनी जल्दी खो रही है। वैज्ञानिकों का कहना है कि इन हड्डियों से मिली जानकारी से हम मौजूदा वॉयली की आनुवंशिक विविधता को बेहतर समझ सकते हैं, जो पहले से ज्यादा लग रही है। यह विविधता संरक्षण कार्यक्रमों के लिए सोने जैसी है, प्रजनन और नए इलाकों में बसाने में मदद करेगी, ताकि ये जीव मजबूत आबादी बना सकें।

संरक्षण में नई उम्मीद

शोध टीम के मुताबिक, सिर्फ हड्डियों के अध्ययन से इतने राज खुल गए, तो अगर आधुनिक जेनेटिक टूल्स का इस्तेमाल करें तो और क्या-क्या पता चलेगा? यह खोज हमें याद दिलाती है कि संरक्षण में आनुवंशिक विविधता को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। साथ ही, नामकरण में स्थानीय आदिवासी समुदायों को शामिल करने की पहल सराहनीय है—वॉयली शब्द खुद नूंगार भाषा से आया है, जो इस सहयोग को और मजबूत बनाता है। यह कहानी सिर्फ एक छोटे मार्सुपियल की नहीं, बल्कि पूरी पृथ्वी की है। कितने जीव बिना पहचाने ही लुप्त हो जाते हैं? लेकिन अब, इस नई जानकारी के साथ, उम्मीद है कि इंसान वॉयली जैसे ‘इंजीनियरों’ को बचाने में ज्यादा स्मार्ट कदम उठाएंगे। अगर हमने नहीं किया, तो आने वाली पीढ़ियां सिर्फ हड्डियों से ही इनकी कहानियां सुनेंगी। क्या हम तैयार हैं इस चुनौती के लिए?

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