सुल्तानगंज: सुल्तानगंज विधानसभा क्षेत्र, भागलपुर जिले का एक ऐसा स्थल है, जो अपनी धार्मिक, ऐतिहासिक और राजनीतिक पहचान के लिए जाना जाता है। प्राचीन काल में अजगैबीनाथ के नाम से प्रसिद्ध यह क्षेत्र स्वयंभू शिव मंदिर के लिए विख्यात है, जहां लाखों श्रद्धालु श्रावण मास में गंगा जल लेकर बाबा बैद्यनाथ को अर्पित करने पहुंचते हैं। गंगा नदी की चट्टानी पहाड़ी पर स्थित अजगैबीनाथ मंदिर आस्था का केंद्र है। महाभारत काल के अंग देश और वीर कर्ण से जुड़ा यह क्षेत्र गुप्तकालीन कांस्य बुद्ध प्रतिमा के लिए भी प्रसिद्ध है, जो अब ब्रिटेन में संरक्षित है। सियासी रण में भी सुल्तानगंज की अहमियत बरकरार है।सुल्तानगंज का इतिहास गौरवशाली रहा है। महाभारत में अंग देश का हिस्सा रहे इस क्षेत्र का संबंध महर्षि जह्नु से भी है, जिनके नाम पर गंगा को जाह्नवी कहा जाता है। अजगैबीनाथ मंदिर की मान्यता है कि यहां भगवान शिव स्वयं प्रकट हुए। गंगा के तट पर बनी चट्टानी पहाड़ी पर यह मंदिर न केवल धार्मिक, बल्कि पुरातात्विक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है।
सुल्तानगंज की अर्थव्यवस्था कृषि आधारित है
सुल्तानगंज गंगा के दक्षिणी तट पर बसा हुआ है. धार्मिक पर्यटन के बावजूद सुल्तानगंज की अर्थव्यवस्था मुख्यतः कृषि आधारित है। हालांकि छोटे पैमाने के उद्योग और स्थानीय व्यापार भी आर्थिक गतिविधियों में योगदान देते हैं। सुल्तानगंज विधानसभा क्षेत्र की स्थापना 1951 में हुई थी और यह बांका लोकसभा के अंदर आता है। इसमें सुल्तानगंज और शाहकुंड प्रखंड शामिल हैं।अब तक 17 चुनाव हुए है। शुरुआती दौर में कांग्रेस यहां सबसे मजबूत थी, जिसने आठ बार जीत दर्ज की, लेकिन 1985 के बाद से कांग्रेस लगातार पिछड़ता चला गया। यहां कांग्रेस को 1990 से जीत का इंतजार, जदयू का दबदबा कायम, 1990 से 2005 तक जनता दल और समता पार्टी जबकि 2010 से 2020 के चुनाव तक जदयू के उम्मीदवार जीते हैं। पीछले 2020 के विधानसभा चुनाव में जदयू ने ललित कुमार मंडल ने कांग्रेस के प्रत्याशी ललन कुमार को 10 हजार से अधिक वोटों से हराया। इस चुनाव को जीतकर लगातार चौथी बार सीट अपने नाम किया था।
आरजेडी जीत के लिए कर रही जद्दोजहद
सुल्तानगंज का चुनाव इसबार बेहद दिलचस्प होने वाली है. एनडीए प्रदेश में है और सुल्तानगंज में ही भागलपुर का एयरपोर्ट प्रस्तावित है। एयरपोर्ट मुद्दा बनेगा, इस सौगात के जरिए एनडीए अपने वोटरों को लुभाने का प्रयास करेगी। महागठबंधन में यह सीट किसके खाते में जाएगी, इसे लेकर भी तरह-तरह की चर्चा है। यहां कांग्रेस लंबे समय से वापसी के लिए जद्दोजहद कर रही है, लेकिन जीत का इंतजार लंबी हो रही है.वर्तमान में सुलतानगंज पर जेडीयू का दबदबा है,मजबूत पकड़ है।
ग्रामीण मतदाता तक करते हैं जीत- हार
2011 की जनगणना के अनुसार, सुलतानगंज की जनसंख्या 4,36,079 है, जिसमें 87.87 प्रतिशत ग्रामीण और 12.13 प्रतिशत शहरी क्षेत्र से आते हैं। वहीं 2020 के विधानसभा चुनाव में इस क्षेत्र में 3,28,314 मतदाता पंजीकृत थे, जो 2024 के लोकसभा चुनाव में बढ़कर 3,39,156 हो गए। अनुसूचित जाति की आबादी 12.97 फीसदी और अनुसूचित जनजाति की महज 0.02 फीसदी है तो 11.7% मुस्लिम मतदाता हैं, जबकि केवल 12.13% मतदाता शहरी हैं। यहां ग्रामीण मतदाता किसी भी पार्टी की जीत- हार तय करती है।
अल्प संख्यक और यादव निर्णायक भूमिका निभाते हैं
अगर जातीय समीकरण पर नजर डालें तो मुस्लिम और यादव समुदाय यहां निर्णायक भूमिका निभाते हैं। इनके अलावा भूमिहार, राजपूत, ब्राह्मण, कुर्मी, कोइरी और रविदास वोटरों की भी संख्या अच्छी खासी है। यही कारण है कि हर चुनाव में दलों को समीकरण साधने की सबसे बड़ी चुनौती इन जातीय समूहों को साधने की रहती है।
सुलतानगंज की सबसे बड़ी राजनीतिक सच्चाई यह है कि जहां कभी कांग्रेस का दबदबा था। जेडीयू ने उसे पूरी तरह पीछे छोड़ दिया है। हालांकि, कांग्रेस लगातार अपनी वापसी की कोशिश कर रही है, लेकिन पिछले तीन दशक से यहां का गणित उसके पक्ष में नहीं जा पा रहा। 2025 के चुनाव में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या जेडीयू अपने गढ़ को कायम रख पाती है या विपक्ष कोई बड़ा उलटफेर कर पाता है।
गौरतलब है कि बीजेपी और राजद, जो वर्तमान बिहार विधानसभा की दो सबसे बड़ी पार्टियां हैं। इस सीट पर अब तक कभी जीत दर्ज नहीं कर पाई हैं। यहां जदयू की पकड़ इतनी मजबूत है कि एलजेपी जैसी पार्टी, जिसने एनडीए से अलग होकर बिहार की राजनीति में कई जगहों पर हलचल मचाई थी, लेकिन यहां कोई प्रभाव नहीं छोड़ सकी। 2020 में जदयू के ललित नारायण मंडल ने कांग्रेस के ललन कुमार को 11,265 वोटों से हराया, जबकि एलजेपी को 10,222 वोट ही मिले। वहीं 2024 के लोकसभा चुनावों में भी जदयू ने सुल्तानगंज विधानसभा में 26,749 वोटों की बढ़त हासिल कर एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि यह क्षेत्र नीतीश कुमार का गढ़ बना हुआ है। ऐसा माना जा रहा है कि अगर 2025 नीतीश कुमार का अंतिम चुनाव हुआ, तो उनके प्रति लोगों की भावनात्मक जुड़ाव के चलते विपक्ष के लिए इस किले को भेदना और भी मुश्किल हो जाएगा।
यहां दावेदारों की बात करें तो राष्ट्रीय जनता दल से चंदन सिंह उर्फ राजीव पटेल मजबूत दावेदार हैं। इसके अलावा नट बिहार मंडल रामचंद्र चौधरी और भागलपुर राजद जिला अध्यक्ष चंद्रशेखर यादव टिकट के हाल में लगे हुए हैं। महागठबंधन में सुल्तानगंज सीट कांग्रेस के पाले रहा है। इस बार कांग्रेस से कुल चार दावेदार मैदान में है। जिसमें से मुंगेर के खड़कपुर के रहने वाले राजेश मिश्रा, आनंद माधव, अशोक सिंह और ललन यादव शामिल है। वही जदयू वर्तमान विधायक ललित नारायण मंडल, संजीव कुमार, जिला अध्यक्ष बिपिन बिहारी। इस बार यहां उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी लोक दल के उम्मीदवार हिमांशु पटेल भी मैदान में उतरने की तैयारी में है वह भी चुनाव प्रचार में जुटे हुए हैं। हिमांशु पटेल 2020 के चुनाव में 50000 मत लाकर सबको चौंका दिया था। वही मुकेश साहनी की पार्टी विप से अनंत कुमार उर्फ टुनटुन साह भी दावेदारों में शामिल है टुनटुन साह भागलपुर के जिला परिषद अध्यक्ष रह चुके हैं। अजीत कुमार निर्दलीय ताल ठोकने की तैयारी में है वह भी जनसंपर्क कर रहे हैं। भागलपुर मुख्यालय यहां से 25 किलोमीटर पूर्व में है, जबकि मुंगेर 55 किलोमीटर पश्चिम, बांका 60 किलोमीटर दक्षिण-पूर्व, पूर्णिया 130 किलोमीटर उत्तर-पूर्व और राज्य की राजधानी पटना 200 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में स्थित है।



