नई दिल्ली: बाढ़ मैदान यानी फ्लड प्लेन वह इलाका होता है जहां नदी बाढ़ आने पर पानी फैलाता है। यह नदी का प्राकृतिक हिस्सा है, जो पानी को सोखता है, भूजल बढ़ाता है और मिट्टी को उपजाऊ बनाता है। लेकिन शहरों के फैलने और अतिक्रमण से ये इलाके घरों, फैक्टरियों और खेती में बदल गए हैं। जब बाढ़ आती है तो पानी का रास्ता रुक जाता है, जिससे शहरों में ज्यादा तबाही होती है। सीमांकन का मतलब है इन इलाकों की साफ-साफ सीमा तय करना और पिलर लगाकर चिह्नित करना। इससे अतिक्रमण रोका जा सकेगा, नदी का प्राकृतिक बहाव बचेगा और बाढ़ का खतरा कम होगा। राष्ट्रीय हरित अधिकरण (एनजीटी) ने भी कई बार इसकी जरूरत पर जोर दिया है।
गंगा के लिए क्या योजना है?
उत्तर प्रदेश में गंगा नदी 13 जिलों से गुजरती है। यहां उन्नाव से बलिया तक करीब 710 किलोमीटर के हिस्से में फ्लड प्लेन की सीमा तय करने का काम चल रहा है। सिंचाई और जल संसाधन विभाग ने सभी 13 जिलों में तकनीकी मानकों के हिसाब से फ्लड प्लेन तय कर लिया है। अब जमीन पर पिलर लगाने का काम शुरू हो गया है। कुल 7,350 पिलर लगाए जाएंगे। 10 जिलों में टेंडर हो चुके हैं, बाकी तीन में जल्दी पूरा हो जाएगा। विभाग का लक्ष्य है कि 31 मार्च 2026 तक सारा काम खत्म हो जाए। नियमित निगरानी हो रही है ताकि एनजीटी के आदेश का पालन हो। दिसंबर 2025 में विभाग ने एनजीटी को रिपोर्ट दी कि काम तेजी से चल रहा है।
यमुना और अन्य सहायक नदियों का क्या?
यमुना गंगा की बड़ी सहायक नदी है और उत्तर प्रदेश में 17 जिलों से गुजरती है। यहां भी फ्लड प्लेन तय हो चुका है। परियोजना तैयार है, लागत का अनुमान लग गया है और उत्तर प्रदेश बाढ़ नियंत्रण परिषद की तकनीकी समिति से मंजूरी मिल गई है। अब स्टीयरिंग कमिटी और गंगा बाढ़ नियंत्रण आयोग से अंतिम मंजूरी का इंतजार है। मंजूरी मिलते ही काम शुरू होगा और यहां 21,582 पिलर लगाए जाएंगे। लक्ष्य भी 31 मार्च 2026 तक पूरा करने का है। अन्य सहायक नदियों जैसे रामगंगा, गोमती आदि के लिए भी अलग-अलग योजनाएं चल रही हैं, लेकिन मुख्य फोकस गंगा और यमुना पर है।
कानूनी और पर्यावरणीय पहलू
यह सारा काम गंगा (पुनरुद्धार, संरक्षण और प्रबंधन) प्राधिकरण आदेश 2016 के तहत हो रहा है। एनजीटी ने मई 2025 में आदेश दिया था कि फ्लड प्लेन की सुरक्षा के लिए क्या कदम उठाए जा रहे हैं, इसकी रिपोर्ट दें। दिसंबर 2025 में रिपोर्ट सौंपी गई। पर्यावरण के लिहाज से यह बहुत जरूरी है। अतिक्रमण से नदी संकरी हो गई है, प्रदूषण बढ़ा है और बाढ़ ज्यादा खतरनाक हो गई हैं। सीमांकन से नदी का प्राकृतिक स्वरूप बचेगा, जंगल और जीव-जंतु सुरक्षित रहेंगे। साथ ही बाढ़ में पानी फैलने की जगह मिलेगी, जिससे शहरों को नुकसान कम होगा।
चुनौतियां और आगे की राह
काम बड़ा है, इसलिए समय पर पूरा करना चुनौती है। मंजूरियां लेनी पड़ती हैं और बजट की व्यवस्था भी। कई जगह पुराने अतिक्रमण हटाने में दिक्कत आ सकती है। लेकिन सरकार गंभीर है और नियमित जांच हो रही है। विशेषज्ञ कहते हैं कि सिर्फ पिलर लगाना काफी नहीं, लोगों को जागरूक करना भी जरूरी है। नदी किनारे निर्माण पर सख्ती होनी चाहिए। अगर यह काम सफल हुआ तो उत्तर प्रदेश में बाढ़ की समस्या काफी हद तक कम हो सकती है। गंगा और उसकी सहायक नदियां फिर से स्वस्थ और सुरक्षित हो सकती हैं। यह मुहिम न सिर्फ बाढ़ से बचाव के लिए है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए नदियों को बचाने की भी है। सरकार और लोगों का साथ मिले तो 2026 तक बड़ा बदलाव दिख सकता है।



