पटना: बिहार में चुनावी बिगुल बज चुका है। प्रचार की रफ्तार तो छह माह पहले से ही बढ़ी हुई है, लेकिन इस बीच दोनों गठबंधन एनडीए और महागठबंधन में सीट बंटवारें को लेकर घमासान मचा हुआ है। तेजस्वी और भाजपा व नीतिश दोनों को डर सता रहा है कि छोटे दल नाराज न हो जाएं। उधर यह भी कोशिश है कि इन्हें कम सीटों पर ही मना लिया जाय, लेकिन वे मानने को तैयार नहीं हैं। इन छोटे दलों को मनाने का कारण है, उम्मीदवारों के कम मतों से हार-जीत में गठबंधन की राजनीति ज्यादा मायने रखती है।
एआईएमआईएम, जन सुराज गठबंधनों में सेंध लगाने में लगे हैं
वैसे में तब जब पहले से ही एआईएमआईएम और जन सुराज दोनों ही गठबंधनों के वोट बैंक में सेंध लगाने में लगे हुए हैं। ऐसी स्थिति में जिस गठबंधन से निकलकर कोई पार्टी अकेले चुनाव लड़ने की घोषणा कर देती है, उस गठबंधन के पिछड़ने के आसार बढ़ जाएंगे। यही कारण है कि दोनों गठबंधन के शीर्षस्थ दिन-रात बैठक कर रहे हैं। कांग्रेस के नेता गुरुवार को ही दिल्ली जा रहे हैं। वहीं एनडीए के घटक दल चिराग पासवान और जीतन राम मांझी भी अपने-अपने ढंग से राग अलाप रहे हैं। चिराग ने तो गुरुवार को पार्टी पदाधिकारियों की आपात बैठक बुला दी है।
सात सीटों पर जीत-हार का अंतर सिर्फ एक हजार वोट रहे
पिछले चुनाव की देखें तो 36 सीटें ऐसी रहीं, जहां जीत-हार का अंतर 3000 से भी कम था। इनमें सात विधानसभा सीटों पर तो जीत-हार का अंतर मात्र एक हजार वोट का ही था। इनमें चनपटिया सीट पर भाजपा के प्रकाश राय ने जेडीयू के एनएन शाही को 464 मतों से हराया था। वहीं शिवहर सीट पर जेडीयू के सैफुद्दीन ने जीतनराम मांझी की पार्टी हम के उम्मीदवार लवली आनंद को 461 मत से परास्त किया। ऐसे ही झंझारपुर सीट पर आरजेडी के गुलाब यादव 834 मतों से जीते, बनमखनी विधानसभा सीट पर भाजपा के कृष्ण कुमार 708 मतों से जीते थे, बरौली विधानसभा सीट पर जीत-हार का अंतर 504 मत था, आरा सीट पर मोहम्मद नवाज आलम को 666 वोटों से जीत मिली थी। चैनपुर विधानसभा सीट भाजपा के ब्रिज किशोर बिंद ने बसपा के मोहम्मद जमा खान को 671 मतों से शिकस्त दी थी।
23 सीटों पर जीत हार का अंतर था दो हजार से कम मत
एक हजार मत से ज्यादा और दो हजार मत से कम मतों के अंतर से जीत-हार 23 सीटों पर हुई थी। तीन हजार मतों से कम मत से जीत हार 36 सीटों पर चार हजार से कम मतों से जीत-हार का अंतर 35 सीटों पर और पांच हजार से कम मतों पर जीत हार का अंतर 52 सीटों पर था। 2020 के विधानसभा चुनाव में 58.7 प्रतिशत मतदान हुआ था। तब सिर्फ 16 प्रतिशत विधायकों ने ही 50 प्रतिशत या इससे अधिक वोट पाकर जीत दर्ज की। 84 प्रतिशत विधायकों ने 50 प्रतिशत से कम वोटों से जीत दर्ज की।
जब भाजपा की 91 सीटों पर हुई थी जीत
यदि पिछले पांच चुनावों का डाटा देखें भाजपा ने 2010 में सर्वाधिक 91 सीटों पर जीत हासिल करने में सफल रही थी। हालांकि वोट प्रतिशत के हिसाब से 2015 के चुनाव में जदयू के बिना चुनाव लड़ते हुए सर्वाधिक 24.4 प्रतिशत मत हासिल किये थे। 2020 के चुनाव में भाजपा को 19.46 प्रतिशत मत मिले थे और 74 सीटों पर जीत दर्ज कर आरजेडी 75 सीटों की जीत की अपेक्षा दूसरे नंबर की पार्टी थी। वहीं 2015 में भाजपा का जदयू के साथ गठबंधन नहीं था। इसके बावजूद भाजपा ने 53 सीटों पर जीत दर्ज करते हुए 24.4 प्रतिशत मत पाये थे। 2010 के चुनाव में भाजपा ने 91 सीटों पर जीत के साथ 16.49 प्रतिशत मत पाने में सफल रही। 2005 में एक साल में ही दो बार चुनाव हुए थे। उसमें अक्टूबर में हुए चुनाव में भाजपा ने 15.65 प्रतिशत वोट के साथ 55 सीटों पर जीत हासिल की थी। वहीं फरवरी में हुए चुनाव में भाजपा को 10.97 प्रतिशत मत के साथ 37 सीटें मिली थीं।
जदयू 2010 में थी चरम पर
वहीं जदयू की स्थिति देखें तो इन पिछले पांच चुनावों में सबसे ज्यादा सीटें और मत प्रतिशत 2010 में मिला था, जब यह 22.58 प्रतिशत मत पाकर 115 सीटों पर विजय हासिल करने में सफल रही थी। पिछले चुनाव में उसे 15.39 प्रतिशत मत मिले थे और 43 सीटों पर जीत हासिल हुई थी। 2015 के चुनाव में इसे 16.8 प्रतिशत के साथ 71 सीटों पर, 2010 में 115 सीटों पर जीत के साथ 22.58 प्रतिशत, अक्टूबर 2005 में 20.46 प्रतिशत मत के साथ 88 सीटें और फरवरी 2005 में 55 सीटों के साथ 14.55 प्रतिशत मत मिले थे।
आरजेडी को पिछले चुनाव में मिले थे सर्वाधिक मत प्रतिशत
अब बात करते हैं महागठबंधन के आरजेडी की। इसे पिछले चुनाव में 23.11 प्रतिशत मत मिले थे और 75 सीटों पर जीत हासिल की थी। यह मत प्रतिशत और सीट दोनों के हिसाब से बिहार में सबसे बड़ी पार्टी थी। वहीं 2015 में भी सीट के हिसाब से सबसे बड़ी पार्टी बनी और इसे 18.4 प्रतिशत वोट के साथ 80 सीटों पर जीत हासिल की। हालांकि ज्यादा सीटों पर चुनाव लड़ने के कारण भाजपा मत प्रतिशत में सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और उसे 24.4 प्रतिशत मिले थे, लेकिन इसे सीट मात्र 53 ही मिले थे। 2010 में आरजेडी को 18.84 प्रतिशत के साथ मात्र 22 सीटों पर जीत मिली थी। अक्टूबर 2005 में इसे 23.45 प्रतिशत के साथ 54 सीटों पर और फरवरी 2005 में यह 25.07 प्रतिशत के साथ 75 सीटों पर जीत हासिल की थी।
कांग्रेस को पिछले चुनाव में मिला था 9.48 प्रतिशत मत
महागठबंधन की दूसरी बड़ी पार्टी कांग्रेस ने फरवरी 2005 में चुनाव में मात्र पांच प्रतिशत वोट के साथ 10 सीटों पर जीत दर्ज की। वहीं अक्टूबर 2005 में भी इसे 10 सीट ही मिले थे,हालांकि मत प्रतिशत बढ़कर 6.09 प्रतिशत हो गया था। 2010 के चुनाव में कांग्रेस 8.37 प्रतिशत मत के साथ मात्र चार सीटों पर जीत हासिल कर सकी थी। वहीं 2015 में कांग्रेस का मत प्रतिशत तो कम होकर 6.7 हो गया, लेकिन इसे 27 सीटों पर जीत हासिल हुई। पिछले चुनाव में सीटों पर विजय के लिहाज से 19 सीटों पर जीत हासिल कर चौथे नंबर की पार्टी बनी। इसको 9.48 प्रतिशत मत मिले थे।
205 पांच पार्टियों ने उतारे थे अपने प्रत्याशी
बिहार के पिछले विधानसभा चुनाव में चार राष्ट्रीय पार्टियों के साथ, चार राज्य पार्टी और चार दूसरे राज्यों की स्टेट पार्टी के साथ 205 रजिस्टर्ड थी, लेकिन गैरमान्यता प्राप्त पार्टी भी चुनाव लड़ रही थी। अगर डेटा देखें तो ये 205 पार्टियों ने 1 सीट से लेकर 150 सीटों तक में अपने उम्मीदवार उतारे थे। इनके 1510 कैंडिडेट थे।
सीपीआईएमएल के जीते थे 12 उम्मीदवार
तब हम पार्टी के चार, वीएसआईपी के चार और सीपीआईएमएल के 12 उम्मीदवार जीते थे, लेकिन एक भी सीट न जीतने वाली रजिस्टर्ड पार्टियों को भी 1000 से लेकर चार लाख तक भी वोट मिले। 70 लाख से ज्यादा वोट नोटा में भी गए। उन्होंने कहा कि इससे साफ है कि जिन सीटों पर कांटे का मुकाबला है वहां ये नंबर गेम समझे बिना काम नहीं चलेगा। उन्होंने कहा कि बीजेपी हर मोर्चे पर अपनी तैयारी कर रही है।
भाजपा नेता ने कहा
बिहार भाजपा संगठन के सचिव संतोष रंजन राय ने कहा कि जीत-हार की अंतर कम होने से हर पार्टी का महत्व बढ़ जाता है। ऐसे में किसी को नाराज करना ठीक नहीं होता। वैसे हमारे यहां संबंध महत्वपूर्ण होता है। हमारी पार्टी गठबंधन के सभी दलों से चर्चा कर रही है। जल्द ही परिणाम सामने होंगे।



