- आजाद भारत में 17 सितंबर 1950 को एक गरीब परिवार में जन्मे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का सेवा ही संकल्प, आज नए भारत का मूल मंत्र बन गया है। राष्ट्र को परिवारजन मानकर भारत को नई दिशा देने में जुटे प्रधानमंत्री मोदी का एक ही धर्म है- राष्ट्र प्रथम। उनकी सरकार की एक ही पवित्र पुस्तक है- संविधान। एक ही भक्ति है- भारत भक्ति। एक ही शक्ति है- जन शक्ति। एक ही संस्कार है- 140 करोड़ भारतीयों की सुरक्षा व समृद्धि। उनकी सरकार का एक ही मंत्र है- सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास। सुशासन के अपने इस मंत्र को पहले गुजरात के मुख्यमंत्री के रूप में और अब 11 वर्षों से प्रधानमंत्री के रूप में बढ़ाते हुए राष्ट्र को दे रहे हैं नई दिशा… इस 17 सितंबर को उनका 75वां जन्मदिन…
बड़े फैसले लेना ही नहीं उसे परिणति तक पहुंचाना आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के व्यक्तित्व का पर्याय बन चुका है। आजाद भारत में 17 सितंबर 1950 को एक गरीब परिवार में जन्मे नरेंद्र मोदी ने चायवाले से लेकर देश के प्रधान सेवक तक का सफर तय किया तो उनका सेवा का संकल्प ही ‘नए भारत’ का मंत्र बन गया है। हर कोई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की पारिवारिक पृष्ठभूमि से वाकिफ है कि कैसे समाज के कमजोर तबके से निकले पीएम मोदी को दो वक्त का भोजन जुटाने के लिए संघर्ष करना पड़ता था। वडनगर के लगभग 40×12 फुट के आकार के कमरे में बचपन गुजारने वाले पीएम मोदी के पिता स्थानीय रेलवे स्टेशन पर चाय बेचते थे। प्रारंभिक वर्षों में पीएम मोदी भी इस चाय की दुकान पर अपने पिता का हाथ बंटाते थे। शुरुआती वर्ष के संघर्षों ने पीएम मोदी के मन पर एक मजबूत छाप छोड़ी। जीवन के आगे के चरणों में स्वामी विवेकानंद के विचारों ने उन्हें अध्यात्म की ओर ले जाना शुरू किया। फिर राष्ट्रवादी विचारों से ओतप्रोत राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सानिध्य में उस विचारधारा में पले जहां ‘राष्ट्र प्रथम’ की बात होती है। राजनीति का पाठ राष्ट्रनीति की भाषा में पढ़ाया जाता है। प्रधानमंत्री मोदी की राजनीति में भी राष्ट्रनीति सर्वोपरि है। दरअसल वे उस विचार परिवार में पले-बढ़े हैं, जिसका संस्कार ही ऐसा है, जहां राजनीति और राष्ट्रनीति में से किसी एक को स्वीकार करने की जरूरत पड़े तो राष्ट्रनीति को सबसे पहले और राजनीति को दूसरे नंबर पर रखना सिखाया जाता है।
यही गुण राजनीति और व्यक्तित्व के रूप में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को देश ही नहीं, दुनिया के अन्य नेताओं से अलग करती है। उनकी जीवन यात्रा में कई उतार-चढ़ाव आए, लेकिन राष्ट्र सर्वोपरि की उनकी सोच ने उन्हें सदैव संबल दिया। गुजरात का मुख्यमंत्री बनने के बाद उन्होंने विकास का अलग मॉडल बनाने की दिशा में काम शुरू किया, जिसके लिए खास तौर से स्कूली शिक्षा पर फोकस किया। कुछ ऐसे पल भी आए जब विरोधियों को उनके खिलाफ मोर्चा खोल दिया। लेकिन पीएम मोदी इन तीक्ष्ण हमलों से कमजोर नहीं पड़े, बल्कि मजबूती के साथ काम करते रहे।
दृढ़ संकल्प और इच्छाशक्ति मोदी जी की विशेषता है, जिसने उन्हें समकालीन नेताओं में श्रेष्ठ बनाया है। पीएम नरेंद्र मोदी की कार्यशैली को समझने के लिए उनकी सोचने के तरीके को समझना होगा। दरअसल पीएम मोदी किसी भी काम की योजना के बारे में सोचते हैं तो उसकी शुरुआत परिणाम से होती है। यानी किस नीति, कथन और योजना का असर क्या होगा, उसके बारे में जमीन पर क्रियान्वयन से सोचना शुरू करते हैं। उनके सोचने का अलग अंदाज ही उन्हें बाकी राजनेताओं से अलग करता है। उनकी इस विशिष्ट कार्यशैली का परिणाम यह निकलता है कि प्रधानमंत्री मोदी किसी भी योजना को तब बाहर लेकर आते हैं जब उसे जमीन पर उतारने की पूरी तैयारी हो जाती है। यही वजह है कि लाल किले की प्राचीर से की गई योजना शत-प्रतिशत प्रधानमंत्री मोदी की सोच के अनुरूप साकार होती है।
आज देश की रीति-नीति बदली है और नई परंपराएं उदीयमान हुई हैं तो यह प्रधानमंत्री की विशिष्ट कार्यशैली की वजह से ही है। त्वरित निर्णय, तीव्र गति से कार्रवाई, गांव-गरीब की फिक्र, तकनीक के साथ विकास और जीवन स्तर में सुधार, आज यथार्थ हो रहे हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का दृष्टिकोण इसलिए भी स्पष्ट है क्योंकि उन्हें यह मालूम है कि दुनिया का सबसे युवा देश भारत की आधी आबादी 27 साल से कम आयु की है, जिनमें आकांक्षाएं हैं और राष्ट्र को ऊंचाइयों पर ले जाने का जज्बा भी। पीएम मोदी के नए भारत के मंत्र की वजह से ही दुनिया की सोच भी बदल रही है। पहले सोच थी- भारत क्यों? लेकिन अब माहौल बदल गया है और दुनिया कहती है- भारत क्यों नहीं? यही है नया भारत जिसकी कल्पना प्रधानमंत्री के रूप में नरेंद्र मोदी ने की है। प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता और जनता के दिलों में छाने की वजह क्या है? इसको समझने के लिए खुद से भी प्रश्न करके देखिए, बदलाव साफ दिखेगा।
- क्या कभी कोई सोच सकता था कि माइनस 30 डिग्री तापमान वाले क्षेत्र लद्दाख में नल से जल मिल सकता है?
- असम में ब्रह्मपुत्र नदी पर बोगीबिल ब्रिज का निर्माण इतनी तेजी से हो सकता है?
- क्या कभी कोई सोच सकता था कि रोहतांग में मनाली-लेह राजमार्ग पर अटल टनल के निर्माण का 26 साल बाद पूरा होने वाला सपना महज 6 साल में पूरा हो सकता है?
- देश के गांव-गांव मे रसोई गैस, बिजली, सड़क की सुविधा का विस्तार चंद वर्षों में हो सकता है?
- 12 करोड़ शौचालय बनाकर देश को खुले में शौच से मुक्त कराया जा सकता है?
- 55 करोड़ से अधिक गरीबों को जन-धन से बैंक खाते खोलकर उन्हें बैंकिंग सिस्टम से जोड़ा जा सकता है?
- आयुष्मान भारत जैसी योजना से 60 करोड़ से अधिक लोगों को मुफ्त 5 लाख रु. तक इलाज देकर देश यूनिवर्सल हेल्थ केयर की सुविधा दे सकता है?
- कर्ज में डूबे किसानों को हर वर्ष 6 हजार रुपये की सम्मान निधि से कर्ज मुक्ति की ओर ले जा सकता है?
- क्या अटल इनोवेशन मिशन के जरिए स्कूल के बच्चे खेल-खेल में अनोखे इनोवेशन कर विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकते हैं?
- देश का युवा स्टार्टअप से रोजगार देने वाला बन सकता है?
- बोडो-ब्रू-रियांग जैसे समझौतों से दशकों की समस्या का समाधान हो सकता है?
- सिक्किम पहली बार भारत के एविएशन मैप पर उभर सकता है?
- जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाया जा सकता है?
- ट्रिपल तलाक जैसी सदियों की कुप्रथा का अंत हो सकता है?
- सामाजिक समरसता के साथ राम मंदिर के निर्माण का मार्ग प्रशस्त हो सकता है?
- क्या कोविड जैसी आपदा के वक्त कोई नेतृत्व आत्मनिर्भर भारत की अलख जगाकर देश के अपार जनसमूह को उससे जोड़ सकता है?
- जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 और 35 ए की समाप्ति ने इतिहास बदल दिया है तो उरी सर्जिकल स्ट्राइक, बालाकोट एयर स्ट्राइक और अब ऑपरेशन सिंदूर ने बता दिया है कि भारत अब बदल रहा है। भारत के ऑपरेशन सिंदूर ने राष्ट्र रक्षा नीति की नई लकीर खींच दी है। देश के ऐसे दर्जनों उदाहरण हैं जो न सिर्फ संभव हुआ है बल्कि बेड़ियों को तोड़ नए भारत की दशा-दिशा निर्धारित कर रही हैं।
- नई सदी में तकनीक की अहमियत का अंदाजा इससे भी लगाया जा सकता है कि देश में पहली बार हुआ कि समाज की कतार में आखिरी में खड़ा व्यक्ति सरकारी योजनाओं का सीधा लाभार्थी बना। विज्ञान और तकनीक भारत के विकास का ऐसा उपकरण बन गया है कि प्रशासनिक सुधार, बिजली, रेल सुधार, भ्रष्टाचार पर अंकुश, टैक्स पारदर्शिता, जीएसटी से एक देश-एक टैक्स, स्किल इंडिया, स्टार्टअप इंडिया, डिजिटल इंडिया, किसानों महिलाओं के हित में कदम, शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव से लेकर रक्षा आधुनिकीकरण, श्रम सुधार, कृषि सुधार और दशकों से लंबित ऐसी परियोजनाएं साकार हो रहे हैं जो पहले असंभव लगता था।
- ऐसा संभव हुआ है तो केवल मजबूत नेतृत्व की वजह से, क्योंकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी विचारधारा के उस स्कूल से आते हैं जो समस्याओं से टकराने में विश्वास रखते हैं। उन्होंने डिजिटल टेक्नोलॉजी को जिस तरह से ग्रहण किया है, अपनाया है वैसा किसी और नेता ने नहीं किया है। राजनीति और नीति में उन्होंने जिस तरह से इसका उपयोग किया है उसके कई सबूत मिल चुके हैं। नोटबंदी के कदम पर जोर डालने का नतीजा ये रहा कि देश भर में डिजिटल लेनदेन को भारी बढ़ावा मिला। उसी सिस्टम से नरेंद्र मोदी ने वह काम कर दिखाया है जो आजादी के 67 साल तक नहीं हो पाया था।
लेकिन सरकार को इस ढर्रे पर लाना आसान नहीं था। मोदी जी जब दिल्ली की राजनीति में प्रधानमंत्री बनकर आए तो उन्हें नया खिलाड़ी माना जा रहा था। प्रधानमंत्री बनने के बाद शुरुआत में ही उन्होंने नौकरशाही के साथ सीधा संवाद किया था और अपनी स्पष्ट सोच बता दी थी। उन्होंने नौकरशाही को संदेश दे दिया था कि कागजों पर चल रही योजनाएं तब तक क्रियान्वित नहीं मानी जाएगी, जब तक उस योजना को लेकर गतिविधि जमीन पर नहीं दिखने लगे। एक देश एक परीक्षा का फैसला या फिर एक देश एक राशन कार्ड का और अब नौकरशाही के लिए ‘मिशन कर्मयोगी’. निरंतर सुधार और समयबद्ध डिलीवरी का बेहतरीन उदाहरण है। कैसे लोगों के मन को टच करना है, पीएम मोदी और परदे के पीछे की उनकी टीम बखूबी जानती है। एक समय था जब सरकारें प्रतिबद्ध नौकरशाही चाहती थी ताकि उसके राजनैतिक हित पूरे हो सके। लेकिन पीएम मोदी की सोच उसी नौकरशाही को कुशल और जवाबदेह बनाने की है ताकि हर योजना को समयबद्ध तरीके से साकार किया जा सके।
पीएम मोदी की नीति के पीछे उनकी एक स्पष्ट सोच रही है। उनका स्पष्ट मानना है- “सरकारें लोगों को नये अधिकार देने का बहुत शोर मचाती हैं, लेकिन हमारे संविधान ने हमें पहले से ही बहुत सारे अधिकार प्रदान किए हैं। हमें और अधिक एक्ट्स की नहीं, बल्कि एक्शन की जरूरत है।’’ पीएम मोदी की नीति की वजह से ही सरकार के कामकाज के तरीके और संस्कृति में बदलाव दिख रहा है। अब अटकाने, लटकाने और भटकाने वाला काम नहीं होता, अब फाइलों को दबाने की संस्कृति खत्म कर दी गई है। सरकार अपने हर मिशन, हर संकल्प को जनता के सहयोग से पूरा कर रही है। लेकिन इससे दिक्कत उन लोगों को होने लगी है जो इस बदलाव को स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं। वो गरीब का सशक्त होते नहीं देख पा रहे हैं। उन्हें लगता है कि गरीब अगर मजबूत हो गया तो झूठ नहीं बोल पाएंगे, उसे बहका नहीं पाएंगे। इसलिए सड़क से लेकर संसद तक सरकार के काम के अंदर रोड़े भी अटकाए जाते हैं। लेकिन पीएम नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में देश के सामने एक ऐसी सरकार है जो जन-मन को जोड़ने के लिए काम कर रही है। एक भारत-श्रेष्ठ भारत की बात करती है, भारत जोड़ों की बात करती है।
उनकी जनसहभागिता यानी सबका साथ, सबका विकास, सबका विश्वास और सबका प्रयास का ही परिणाम है कि स्वच्छ भारत से शुरू हुआ सिलसिला, डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया से होकर आत्मनिर्भर भारत और वोकल फॉर लोकल पर पहुंच गया, जिसे लोगों ने ही जनांदोलन बना दिया। दरअसल पीएम मोदी की कार्यशैली में लोगों की जरूरत को समझना सबसे महत्वपूर्ण है। वे सरकार या राजनीति में भी कोई निर्णय लेने से पहले सीधे लोगों की सोच के साथ जुड़ने की कोशिश करते हैं। जब इस तरह का अध्ययन पूरा हो जाता है तभी वे आगे की रणनीति पर काम कर उसे साकार करते हैं। अगर हाल ही के कुछ उदाहरणों को देखें तो कोरोना काल में उन्होंने आत्मनिर्भरता की ऐसी मुहिम छेड़ी जो लोगों के दिलो-दिमाग पर छा गई क्योंकि लोग लॉकडाउन की वजह से घरों में बंद थे और ऐसे समय में हर व्यक्ति अपने सीमित संसाधनों में जिंदगी को कैसे आगे बढ़ा सकता है इसी को ध्यान में रखते हुए कोरोना के खिलाफ जंग लड़ रहा था। यह भी एक तथ्य है कि 25 मार्च 2020 से लॉकडाउन शुरू हुआ और 26 मार्च 2020 को 1.7 लाख करोड़ रु. की गरीब कल्याण योजना शुरू कर दी गई। यानी मुकम्मल रणनीति और सोच के साथ काम करने की मोदी की अपनी एक अलग शैली है।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का बचपन में सपना था कि वे सेना में भर्ती हों, लेकिन भाग्य ने उनके लिए कुछ अलग सोच रखा था। उनका सेना के प्रति प्रेम आज राष्ट्र की मजबूत सामरिक व्यवस्था का आधार है। भारत की सीमाएं आज सुरक्षित हैं तो प्राथमिकता के आधार पर सैन्य शक्ति को मजबूत करने की उनकी सोच है। प्रधानमंत्री मोदी अपनी हर दिवाली या कोई अन्य त्योहार देश के जवानों के संग मनाते हैं क्योंकि उनकी नजर में राष्ट्र ही परिवार है। प्रधानमंत्री मोदी की सादगी भी ‘स्टाइल स्टेटमेंट’ बन जाती है। संगठनात्मक राजनीति में काम करते वक्त मोदी जी अपने कपड़े खुद धोते थे, तब उन्होंने सोचा कि पूरी बांह का कुर्ता धोना अधिक कठिन है और ज्यादा समय लेता है तो उन्होंने अपने कुर्ते को काटकर आधी बांह का कर देने का फैसला किया। इस तरह मोदी कुर्ता की शुरुआत हुई। सादगी भरा जीवन और सादा सुपाच्य भोजन मोदी जी के स्वास्थ्य का रहस्य है। उनका सदैव मानना है कि यदि कोई सार्वजनिक जीवन में सक्रिय होना चाहता है, तो उसका पेट मजबूत होना चाहिए। प्रधानमंत्री मोदी को खिचड़ी बेहद पसंद है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने सार्वजनिक मंच से कई बार कहा भी है- “मैं चाहता हूं कि मेरी सेहत ऐसी हो कि वो देश के लिए बोझ न बने। अपनी अंतिम सांस तक मैं एक स्वस्थ व्यक्ति के रूप में जीना चाहता हूं।” स्वास्थ्य पहली बार किसी सरकार के एजेंडे में सर्वोच्च प्राथमिकता बना है और 60 करोड़ से अधिक लोगों को 5 लाख रुपये तक मुफ्त इलाज की सुविधा मिली है।
थकान किसी मिशन की प्राप्ति के लिए की गई मेहनत से नहीं होती, बल्कि बच गए अधूरे कार्य के बारे में सोचकर होने वाली मानसिक चिंता से होती है। यही प्रधानमंत्री की ऊर्जा का राज है। देश को आत्मनिर्भर बनाने की मुहिम को जन आंदोलन का रूप दे चुके प्रधानमंत्री मोदी के बारे में उनके विरोधी भी मानते हैं कि अवसर तो वे कतई नहीं चूकते, बल्कि देश के समक्ष आने वाली चुनौतियों को भी अवसर में बदलने का जबरदस्त माद्दा रखते हैं। ऐसे में आत्मनिर्भरता के लिए आत्मविश्वास से लबरेज प्रधानमंत्री मोदी ने भविष्य के भारत की दिशा में कदम बढ़ाया है तो इस बदलाव का साक्षी बन रहा वर्तमान सुनहरा इतिहास जरुर लिखेगा। माननीय प्रधानमंत्री जी को जन्मदिन की बहुत सारी शुभकामनाएं। उनका राष्ट्र सेवा का प्रण अनवरत जारी रहे, यही देश के नागरिकों की शुभेच्छा है।

संतोष कुमार वरिष्ठ पत्रकार हैं और वर्तमान में भारत सरकार की पत्रिका न्यू इंडिया समाचार में मुख्य सलाहकार संपादक हैं। इससे पूर्व दैनिक भास्कर, इंडिया टुडे और दैनिक नव ज्योति में काम कर चुके हैं। इन्हें रामनाथ गोयनका अवार्ड भी मिल चुका है।



